तुम जीतोगे ||
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दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 9 मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ तुम मत मेरी मंजिल आसान करो! हैं फूल रोकते, काँटे मुझे चलाते मरुस्थल, पहाड़ चलने की चाह बढ़ाते सच कहता हूँ मुश्किलें न जब होती हैं फूलों से मग आसान नहीं होता है रुकने से पग गतिवान नहीं होता है अवरोध नहीं, तो सम्भव नहीं प्रगति भी मेरे पग तब चलने में भी शरमाते मेरे संग चलने लगें हवाएँ जिससे तुम पथ के कण-कण को तूफान करो। में तूफानों में चलने का आदी हूँ तुम मत मेरी मंजिल आसान करो। है नाश जहाँ निर्माण वहीं होता है। मैं बसा सकूँ नव स्वर्ग धरा पर जिससे तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो। कवि को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 9 मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ तुम मत मेरी मंजिल आसान करो! हैं फूल रोकते, काँटे मुझे चलाते मरुस्थल, पहाड़ चलने की चाह बढ़ाते सच कहता हूँ मुश्किलें न जब होती हैं फूलों से मग आसान नहीं होता है रुकने से पग गतिवान नहीं होता है अवरोध नहीं, तो सम्भव नहीं प्रगति भी मेरे पग तब चलने में भी शरमाते मेरे संग चलने लगें हवाएँ जिससे तुम पथ के कण-कण को तूफान करो। में तूफानों में चलने का आदी हूँ तुम मत मेरी मंजिल आसान करो। है नाश जहाँ निर्माण वहीं होता है। मैं बसा सकूँ नव स्वर्ग धरा पर जिससे तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो। यदि मार्ग में बाधाएँ नहीं आती तो
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 9 मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ तुम मत मेरी मंजिल आसान करो! हैं फूल रोकते, काँटे मुझे चलाते मरुस्थल, पहाड़ चलने की चाह बढ़ाते सच कहता हूँ मुश्किलें न जब होती हैं फूलों से मग आसान नहीं होता है रुकने से पग गतिवान नहीं होता है अवरोध नहीं, तो सम्भव नहीं प्रगति भी मेरे पग तब चलने में भी शरमाते मेरे संग चलने लगें हवाएँ जिससे तुम पथ के कण-कण को तूफान करो। में तूफानों में चलने का आदी हूँ तुम मत मेरी मंजिल आसान करो। है नाश जहाँ निर्माण वहीं होता है। मैं बसा सकूँ नव स्वर्ग धरा पर जिससे तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो। कवि धरती पर क्या बसाना चाहता है?
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 9 मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ तुम मत मेरी मंजिल आसान करो! हैं फूल रोकते, काँटे मुझे चलाते मरुस्थल, पहाड़ चलने की चाह बढ़ाते सच कहता हूँ मुश्किलें न जब होती हैं फूलों से मग आसान नहीं होता है रुकने से पग गतिवान नहीं होता है अवरोध नहीं, तो सम्भव नहीं प्रगति भी मेरे पग तब चलने में भी शरमाते मेरे संग चलने लगें हवाएँ जिससे तुम पथ के कण-कण को तूफान करो। में तूफानों में चलने का आदी हूँ तुम मत मेरी मंजिल आसान करो। है नाश जहाँ निर्माण वहीं होता है। मैं बसा सकूँ नव स्वर्ग धरा पर जिससे तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो। कवि दुनिया से क्या प्रार्थना कर रहा है?
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 9 मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ तुम मत मेरी मंजिल आसान करो! हैं फूल रोकते, काँटे मुझे चलाते मरुस्थल, पहाड़ चलने की चाह बढ़ाते सच कहता हूँ मुश्किलें न जब होती हैं फूलों से मग आसान नहीं होता है रुकने से पग गतिवान नहीं होता है अवरोध नहीं, तो सम्भव नहीं प्रगति भी मेरे पग तब चलने में भी शरमाते मेरे संग चलने लगें हवाएँ जिससे तुम पथ के कण-कण को तूफान करो। में तूफानों में चलने का आदी हूँ तुम मत मेरी मंजिल आसान करो। है नाश जहाँ निर्माण वहीं होता है। मैं बसा सकूँ नव स्वर्ग धरा पर जिससे तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो। 'अवरोध' शब्द का समानार्थक है