यदि कुछ बड़ा करना है तो ये बातें याद रखना | best inspirational video by Mahendra Dogney #shorts
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यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की संभावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परंतु वार्तालाप हम भूलते नहीं है। सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह-सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को 'भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जा रही है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र बीस प्रतिशत ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल दस प्रतिशत ही याद रहा है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। यह जड़ी-बूटी तो आज बड़ी ____ है। वाक्य के रिक्त स्थान पर शब्द आएगा
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की संभावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परंतु वार्तालाप हम भूलते नहीं है। सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं। कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जा रही है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र बीस प्रतिशत ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल दस प्रतिशत ही याद रहता है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। यह जड़ी-बूटी तो आज बड़ी_____है। वाक्य के रिक्त स्थान पर शब्द आएगा।
निर्देशः गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की संभावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परंतु वार्तालाप हम भूलते नहीं है। सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने . वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जा रही है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र बीस प्रतिशत ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल दस प्रतिशत ही याद रहता है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। यह जड़ी-बूटी तो आज बड़ी__ है। वाक्य के रिक्त स्थान पर शब्द आएगा
यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की संभावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परंतु वार्तालाप हम भूलते नहीं है। सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह-सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को 'भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जा रही है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र बीस प्रतिशत ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल दस प्रतिशत ही याद रहा है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। 'सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है।' वाक्य है
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की संभावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परंतु वार्तालाप हम भूलते नहीं है। सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं। कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जा रही है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र बीस प्रतिशत ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल दस प्रतिशत ही याद रहता है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। 'सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है।' वाक्य है
निर्देशः गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की संभावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परंतु वार्तालाप हम भूलते नहीं है। सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने . वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जा रही है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र बीस प्रतिशत ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल दस प्रतिशत ही याद रहता है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। "सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है।' वाक्य है
यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की संभावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परंतु वार्तालाप हम भूलते नहीं है। सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह-सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को 'भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जा रही है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र बीस प्रतिशत ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल दस प्रतिशत ही याद रहा है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। लेखक के अनुसार क्या महत्वपूर्ण है?
यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की संभावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परंतु वार्तालाप हम भूलते नहीं है। सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह-सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को 'भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जा रही है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र बीस प्रतिशत ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल दस प्रतिशत ही याद रहा है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। 'पूर्वाग्रह' का संधि-विच्छेद है
यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की संभावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परंतु वार्तालाप हम भूलते नहीं है। सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह-सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को 'भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जा रही है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र बीस प्रतिशत ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल दस प्रतिशत ही याद रहा है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। इस गद्यांश में बुद्धि की कौन-सी महत्त्वपूर्ण शक्ति का उल्लेख है?
यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की संभावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परंतु वार्तालाप हम भूलते नहीं है। सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह-सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को 'भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जा रही है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र बीस प्रतिशत ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल दस प्रतिशत ही याद रहा है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। भाषण और वार्तालाप में क्या अंतर है?
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