हैरान ? रह जायेंगे आप इन South Actors की कमाई जानकर ? #Shorts #SouthMovies #Networth
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बाल-मस्तिष्क की प्रकृति की यह माँग होती है कि बच्चे का बौद्धिक विकास विचारों के स्रोत के पास हो। दूसरे शब्दों में, यह ठोस, वास्तविक बिम्बों के बीच और सर्वप्रथम प्रकृति की गोद में हो, जहाँ बच्चा ठोस बिम्ब को देखे, सुने और फिर उसका विचार इस बिम्ब के बारे में प्राप्त सूचना के 'संसाधन' के काम में लगे। जब बच्चे को प्रकृति से दूर रखा जाता है, जब बच्चा पढ़ाई के पहले दिन से ही केवल शब्दों के रूप में सारा ज्ञान और बोध पाता है, तो उसके मस्तिष्क की कोशिकाएं जल्दी ही थक जाती है और अध्यापक द्वारा प्रस्तुत काम को निभा नहीं पाती और इन कोशिकाओं को तो अभी विकसित, सशक्त, सुदृढ़ होना है। यही पर उस बात का कारण छिपा है, जो प्राथमिक कक्षाओं में अक्सर देखने में आती है-बच्चा चुपचाप बैठा अध्यापक की आँखों में आँखें डाले देखता है, मानो बड़े ध्यान से सुन रहा हो, लेकिन वास्तव में वह एक शब्द भी नहीं समझ पाता, क्योक बच्चे को नियमों पर सोच-विचार करना पड़ता है, और ये सब अमूर्त सामान्यीकृत बातें होती हैं। इस गद्यांश के आधार पर आप अपनी कक्षा में क्या करेंगे?
हेवल घाटी के गाँववासियों ने चीड़ के पेड़ों के हो रहे विनाश के विरुद्ध जुलूस निकाले। घास-चारा लेने जा रही महिलाओं ने इन पेड़ों से लीसा टपकाने के लिए लगाए गए लोहे निकाल दिए व उनके स्थान पर मिट्टी की मरहम-पट्टी कर दी। महिलाओं ने पेड़ों का रक्षा-बंधन भी किया। आरंभ से ही लगा कि वृक्ष बचाने में महिलाएं आगे आएँगी। वन कटने का सबसे अधिक कष्ट उन्हीं को उठाना पड़ता है, क्योंकि घास-चारा लाने के लिए उन्हें और दूर जाना पड़ता है। कठिन स्थानों से घास-चारा एकत्र करने में कई बार उन्हें बहुत चोट लग जाती है। वैसे भी पहाड़ी रास्तों पर घास-चारा का बोझ लेकर पाँच-दस किमी या उससे भी ज्यादा चलना बहत कठिनावही जाता है। इस आंदोलन की बात ऊँचे अधिकारियों तक पहुंची तो । उन्हें लीसा प्राप्त करने के तौर-तरीकों की जाँच करवानी पड़ी। जाँच से स्पष्ट हो गया कि बहुत अधिक लीसा निकलने के लालच में चीड़ के पेड़ों को बहुत नुकसान हुआ है। इन अनुचित तरीकों पर रोक लगी। चीड़ के घायल पेड़ों को आराम मिला एक नया जीवन मिला। पर तभी खबर मिली कि इस इलाके के बहुत से पेड़ों को.कटाई के लिए नीलाम किया जा रहा है। लोगों ने पहले तो अधि' व कारियों को ज्ञापन दिया कि जहाँ पहले से ही घास-चारे का संकट है, वहाँ और व्यापारिक कटान न किया जाए। जब अधिकारियों ने दु गाँववासियों की मांग पर ध्यान न देते हुए नरेन्द्रनगर में नीलामी की ग घोषणा कर दी, तो गाँववासी जुलूस बनाकर वहाँ नीलामी का विरोध करते हुए पहुँच गए। वहां एकत्र ठेकेदारों से/ हवेल घाटी की . महिलाओं ने कहा, ''आप इन पेड़ों को काटकर हमारी रोजी-रोटी मत छीनो। पेड़ कटने से यहां बाढ़ व भू-स्खलन का खतरा भी बढ़ जाएगा।" कुछ ठेकेदारों ने तो वास्तव में वह बात मानी पर कुछ अन्य ठेकेदारों ने अद्वानी और सलेत के जंगल. खरीद लिए। महिलाओं ने पेड़ों का रक्षा-बंधन क्यों किया?
हेवल घाटी के गाँववासियों ने चीड़ के पेड़ों के हो रहे विनाश के विरुद्ध जुलूस निकाले। घास-चारा लेने जा रही महिलाओं ने इन पेड़ों से लीसा टपकाने के लिए लगाए गए लोहे निकाल दिए व उनके स्थान पर मिट्टी की मरहम-पट्टी कर दी। महिलाओं ने पेड़ों का रक्षा-बंधन भी किया। आरंभ से ही लगा कि वृक्ष बचाने में महिलाएं आगे आएँगी। वन कटने का सबसे अधिक कष्ट उन्हीं को उठाना पड़ता है, क्योंकि घास-चारा लाने के लिए उन्हें और दूर जाना पड़ता है। कठिन स्थानों से घास-चारा एकत्र करने में कई बार उन्हें बहुत चोट लग जाती है। वैसे भी पहाड़ी रास्तों पर घास-चारा का बोझ लेकर पाँच-दस किमी या उससे भी ज्यादा चलना बहत कठिनावही जाता है। इस आंदोलन की बात ऊँचे अधिकारियों तक पहुंची तो । उन्हें लीसा प्राप्त करने के तौर-तरीकों की जाँच करवानी पड़ी। जाँच से स्पष्ट हो गया कि बहुत अधिक लीसा निकलने के लालच में चीड़ के पेड़ों को बहुत नुकसान हुआ है। इन अनुचित तरीकों पर रोक लगी। चीड़ के घायल पेड़ों को आराम मिला एक नया जीवन मिला। पर तभी खबर मिली कि इस इलाके के बहुत से पेड़ों को.कटाई के लिए नीलाम किया जा रहा है। लोगों ने पहले तो अधि' व कारियों को ज्ञापन दिया कि जहाँ पहले से ही घास-चारे का संकट है, वहाँ और व्यापारिक कटान न किया जाए। जब अधिकारियों ने दु गाँववासियों की मांग पर ध्यान न देते हुए नरेन्द्रनगर में नीलामी की ग घोषणा कर दी, तो गाँववासी जुलूस बनाकर वहाँ नीलामी का विरोध 2करते हुए पहुँच गए। वहां एकत्र ठेकेदारों से/ हवेल घाटी की . महिलाओं ने कहा, ''आप इन पेड़ों को काटकर हमारी रोजी-रोटी मत छीनो। पेड़ कटने से यहां बाढ़ व भू-स्खलन का खतरा भी बढ़ जाएगा।" कुछ ठेकेदारों ने तो वास्तव में वह बात मानी पर कुछ अन्य ठेकेदारों ने अद्वानी और सलेत के जंगल. खरीद लिए। हेवल घाटी में किन पेड़ों के होने वाले विनाश के . विरुद्ध जुलूस निकाले गए?
हेवल घाटी के गाँववासियों ने चीड़ के पेड़ों के हो रहे विनाश के विरुद्ध जुलूस निकाले। घास-चारा लेने जा रही महिलाओं ने इन पेड़ों से लीसा टपकाने के लिए लगाए गए लोहे निकाल दिए व उनके स्थान पर मिट्टी की मरहम-पट्टी कर दी। महिलाओं ने पेड़ों का रक्षा-बंधन भी किया। आरंभ से ही लगा कि वृक्ष बचाने में महिलाएं आगे आएँगी। वन कटने का सबसे अधिक कष्ट उन्हीं को उठाना पड़ता है, क्योंकि घास-चारा लाने के लिए उन्हें और दूर जाना पड़ता है। कठिन स्थानों से घास-चारा एकत्र करने में कई बार उन्हें बहुत चोट लग जाती है। वैसे भी पहाड़ी रास्तों पर घास-चारा का बोझ लेकर पाँच-दस किमी या उससे भी ज्यादा चलना बहत कठिनावही जाता है। इस आंदोलन की बात ऊँचे अधिकारियों तक पहुंची तो । उन्हें लीसा प्राप्त करने के तौर-तरीकों की जाँच करवानी पड़ी। जाँच से स्पष्ट हो गया कि बहुत अधिक लीसा निकलने के लालच में चीड़ के पेड़ों को बहुत नुकसान हुआ है। इन अनुचित तरीकों पर रोक लगी। चीड़ के घायल पेड़ों को आराम मिला एक नया जीवन मिला। पर तभी खबर मिली कि इस इलाके के बहुत से पेड़ों को.कटाई के लिए नीलाम किया जा रहा है। लोगों ने पहले तो अधि' व कारियों को ज्ञापन दिया कि जहाँ पहले से ही घास-चारे का संकट है, वहाँ और व्यापारिक कटान न किया जाए। जब अधिकारियों ने दु गाँववासियों की मांग पर ध्यान न देते हुए नरेन्द्रनगर में नीलामी की ग घोषणा कर दी, तो गाँववासी जुलूस बनाकर वहाँ नीलामी का विरोध करते हुए पहुँच गए। वहां एकत्र ठेकेदारों से/ हवेल घाटी की . महिलाओं ने कहा, ''आप इन पेड़ों को काटकर हमारी रोजी-रोटी मत छीनो। पेड़ कटने से यहां बाढ़ व भू-स्खलन का खतरा भी बढ़ जाएगा।" कुछ ठेकेदारों ने तो वास्तव में वह बात मानी पर कुछ अन्य ठेकेदारों ने अद्वानी और सलेत के जंगल. खरीद लिए। वन काटने का सबसे अधिक कष्ट महिलाओं को क्यों उठाना पड़ता है?
हेवल घाटी के गाँववासियों ने चीड़ के पेड़ों के हो रहे विनाश के विरुद्ध जुलूस निकाले। घास-चारा लेने जा रही महिलाओं ने इन पेड़ों से लीसा टपकाने के लिए लगाए गए लोहे निकाल दिए व उनके स्थान पर मिट्टी की मरहम-पट्टी कर दी। महिलाओं ने पेड़ों का रक्षा-बंधन भी किया। आरंभ से ही लगा कि वृक्ष बचाने में महिलाएं आगे आएँगी। वन कटने का सबसे अधिक कष्ट उन्हीं को उठाना पड़ता है, क्योंकि घास-चारा लाने के लिए उन्हें और दूर जाना पड़ता है। कठिन स्थानों से घास-चारा एकत्र करने में कई बार उन्हें बहुत चोट लग जाती है। वैसे भी पहाड़ी रास्तों पर घास-चारा का बोझ लेकर पाँच-दस किमी या उससे भी ज्यादा चलना बहत कठिनावही जाता है। इस आंदोलन की बात ऊँचे अधिकारियों तक पहुंची तो । उन्हें लीसा प्राप्त करने के तौर-तरीकों की जाँच करवानी पड़ी। जाँच से स्पष्ट हो गया कि बहुत अधिक लीसा निकलने के लालच में चीड़ के पेड़ों को बहुत नुकसान हुआ है। इन अनुचित तरीकों पर रोक लगी। चीड़ के घायल पेड़ों को आराम मिला एक नया जीवन मिला। पर तभी खबर मिली कि इस इलाके के बहुत से पेड़ों को.कटाई के लिए नीलाम किया जा रहा है। लोगों ने पहले तो अधि' व कारियों को ज्ञापन दिया कि जहाँ पहले से ही घास-चारे का संकट है, वहाँ और व्यापारिक कटान न किया जाए। जब अधिकारियों ने दु गाँववासियों की मांग पर ध्यान न देते हुए नरेन्द्रनगर में नीलामी की ग घोषणा कर दी, तो गाँववासी जुलूस बनाकर वहाँ नीलामी का विरोध करते हुए पहुँच गए। वहां एकत्र ठेकेदारों से/ हवेल घाटी की . महिलाओं ने कहा, ''आप इन पेड़ों को काटकर हमारी रोजी-रोटी मत छीनो। पेड़ कटने से यहां बाढ़ व भू-स्खलन का खतरा भी बढ़ जाएगा।" कुछ ठेकेदारों ने तो वास्तव में वह बात मानी पर कुछ अन्य ठेकेदारों ने अद्वानी और सलेत के जंगल. खरीद लिए। चीड़ के पेड़ों को किससे बहुत नुकसान हो रहा था?
हेवल घाटी के गाँववासियों ने चीड़ के पेड़ों के हो रहे विनाश के विरुद्ध जुलूस निकाले। घास-चारा लेने जा रही महिलाओं ने इन पेड़ों से लीसा टपकाने के लिए लगाए गए लोहे निकाल दिए व उनके स्थान पर मिट्टी की मरहम-पट्टी कर दी। महिलाओं ने पेड़ों का रक्षा-बंधन भी किया। आरंभ से ही लगा कि वृक्ष बचाने में महिलाएं आगे आएँगी। वन कटने का सबसे अधिक कष्ट उन्हीं को उठाना पड़ता है, क्योंकि घास-चारा लाने के लिए उन्हें और दूर जाना पड़ता है। कठिन स्थानों से घास-चारा एकत्र करने में कई बार उन्हें बहुत चोट लग जाती है। वैसे भी पहाड़ी रास्तों पर घास-चारा का बोझ लेकर पाँच-दस किमी या उससे भी ज्यादा चलना बहत कठिनावही जाता है। इस आंदोलन की बात ऊँचे अधिकारियों तक पहुंची तो । उन्हें लीसा प्राप्त करने के तौर-तरीकों की जाँच करवानी पड़ी। जाँच से स्पष्ट हो गया कि बहुत अधिक लीसा निकलने के लालच में चीड़ के पेड़ों को बहुत नुकसान हुआ है। इन अनुचित तरीकों पर रोक लगी। चीड़ के घायल पेड़ों को आराम मिला एक नया जीवन मिला। पर तभी खबर मिली कि इस इलाके के बहुत से पेड़ों को.कटाई के लिए नीलाम किया जा रहा है। लोगों ने पहले तो अधि' व कारियों को ज्ञापन दिया कि जहाँ पहले से ही घास-चारे का संकट है, वहाँ और व्यापारिक कटान न किया जाए। जब अधिकारियों ने दु गाँववासियों की मांग पर ध्यान न देते हुए नरेन्द्रनगर में नीलामी की ग घोषणा कर दी, तो गाँववासी जुलूस बनाकर वहाँ नीलामी का विरोध करते हुए पहुँच गए। वहां एकत्र ठेकेदारों से/ हवेल घाटी की . महिलाओं ने कहा, ''आप इन पेड़ों को काटकर हमारी रोजी-रोटी मत छीनो। पेड़ कटने से यहां बाढ़ व भू-स्खलन का खतरा भी बढ़ जाएगा।" कुछ ठेकेदारों ने तो वास्तव में वह बात मानी पर कुछ अन्य ठेकेदारों ने अद्वानी और सलेत के जंगल. खरीद लिए। पेड़ कटने से किसका खतरा बढ़ जाएगा?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। बाल-मस्तिष्क की प्रकृति की यह मांग होती है कि बच्चे का बौद्धिक विकास विचारों के प्रोच के पास हो। दूसरे शब्दों में, यह तोस, वास्तविक बिषों के बीच और सर्वप्रथम प्रकृति की गोद में हो. जहाँ बच्चा ठोस बिंब को देखें, सुने और फिर उसका विचार इस बिंब के बारे में प्राप्त सूचना के संसाधन के काम में लगे। जब बच्चे को प्रकृति से दूर रखा जाता है. अब बच्चा पढ़ाई के पहले दिन से ही केवल शब्दों के रूप में सारा ज्ञान और बोध पाता है, तो उसके मस्तिष्क की कोशिकाएँ जल्दी ही थक जाती हैं और अध्यापक द्वारा प्रस्तुत काम को निभा नहीं पाती और इन कोशिकाओं को तो अभी विकसित, सशक्त, सुबुढ़ होना है। यहीं पर उस बात का कारण छिपा है, जो प्राथमिक कक्षाओं में अक्सर देखने में आती है-बच्चा चुपचाप बैठा अध्यापक की आँखों में आँखें डाले देखता है, मानों बड़े ध्यान से सुन रहा हो, लेकिन वास्तव में वह एक शब्द भी नहीं समझ पाता, क्योंकि बच्चे को नियमों पर सोच विचार करना पड़ता है, और ये सब अमूर्त सामान्यीकृत बातें होती है। इस गद्यांश के आधार पर आप अपनी कक्षा में क्या करेंगे?
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