जैन दर्शन
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Sanskara (संस्कार)|Vivah (विवाह)|Vedic Period Philosophy (वैदिक कालीन दर्शन)|Vedic Literature (वैदिक साहित्य)|Summary
'किसी को देखने के लिए आँख की नहीं, दृष्टि की आवश्यकता होती है" - स्वामी विवेकानंद का यह कथन इस महिला के जीवन का दर्शन बन गया है। इसी जीवन दर्शन के सहारे उन्होंने एक ओर कठिनाइयों का सामना किया तो दूसरी ओर सफलता का मार्ग ढूँढा और उस पर निर्भयता से बढ़ चली। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मुंबई की रेवती रॉय की। रेवती रॉय वह महिला हैं जिन्होंने महिलाओं की कठिनाइयों -को-ध्यान में रख केवल उन्हीं की सुविधा के लिए 'फॉरशी' नामक से कैब-सेवा प्रारंभ की। उद्देश्य स्पष्ट था- कामकाजी और जरूरतमंद - महिलाओं को अपने शहर में सुरक्षित सफर का भरोसा देना। यह सेवा उन महिलाओं के लिए वरदान साबित हुई जिन्हें महानगरों में मुँह बाए बैठे अपराधी तत्त्वों या परपीड़ा में आनंद लेने वालों से प्रायः रोज ही जाना पड़ता है। खतरों और आशंकाओं से भी सड़क परिवहन की जिंदगी में कदम रखने का निर्णय लेना रेवती के लिए सरल नहीं था। लेकिन ए कभी-कभी विवशता भी प्रेरणा देती है। ऐसे ही अवसरों पर 'आँख नहीं, दृष्टि' वाला दर्शन प्रेरक होता है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे । पति के इलाज में सारी जमापूँजी चुक जाने के बाद रेवती को अपने अस्तित्व के लिए कुछ-न-कुछ करना था। सो उन्होंने एकदम नया रास्ता, चुना/- कैब के द्वारा महिलाओं को सुरक्षित यात्रा का आश्वासन | गद्यांश के प्रारंभ में उद्धृत कथन किसके जीवन का दर्शन बना?
निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। "किसी को देखने के लिए आँख की नहीं, दृष्टि की आवश्यकता होती है" ... स्वामी विवेकानंद का यह कथन इस महिला के जीवन का दर्शन बन गया है। इसी जीवन दर्शन के सहारे उन्होंने एक ओर कठिनाइयों का सामना किया तो दूसरी ओर सफलता का मार्ग ढूँढ़ा और उस पर निर्भयता से बढ़ चली। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मुंबई की रेवती रॉय की। रेवती रॉय वह महिला हैं जिन्होंने महिलाओं की कठिनाइयों को ध्यान में रख केवल उन्हीं की सुविधा के लिए 'फॉरशी' नामक से कैब-सेवा प्रारंभ की। उद्देश्य स्पष्ट था- कामकाजी और जरूरतमंद महिलाओं को अपने शहर में सुरक्षित सफर का भरोसा देना। यह सेवा उन महिलाओं के लिए वरदान साबित हुई जिन्हें महानगरों में मुँह बाए बैठे अपराधी तत्त्वों या परपीड़ा में आनंद लेने वालों से प्रायः रोज ही जाना पड़ता है। खतरों और आशंकाओं से भी सड़क परिवहन की जिंदगी में कदम रखने का निर्णय लेना रेवती के लिए सरल नहीं था। लेकिन कभी-कभी विवशता भी प्रेरणा देती है। ऐसे ही अवसरों पर 'आँख नहीं, दृष्टि' वाला दर्शन प्रेरक होता है! गंभीर बीमारी से जूझ रहे पति के इलाज में सारी जमापूँजी चुक जाने के बाद रेवती को अपने अस्तित्व के लिए कुछ-न-कुछ करना था। सो उन्होंने एकदम नया रास्ता चुना - कैब के द्वारा महिलाओं को सुरक्षित यात्रा का आश्वासन। गद्यांश के प्रारंभ में उद्धत कथन किसके जीवन का दर्शन बना ?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। "किसी को देखने के लिए आँख की नहीं, दृष्टि की आवश्यकता होती है" - स्वामी विवेकानंद का यह कथन इस महिला के जीवन का दर्शन बन गया है। इसी जीवन दर्शन के सहारे उन्होंने एक ओर कठिनाइयों का सामना किया तो दूसरी ओर सफलता का मार्ग ढूँढा और उस पर निर्भयता से बढ़ चली। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मुबई की रेवती रॉय की। रेवती रॉय वह महिला हैं जिन्होंने महिलाओं की कठिनाइयों को ध्यान में रख केवल उन्हीं की सुविधा के लिए 'फॉरशी' नामक से कैब-सेवा प्रारंभ की। उद्देश्य स्पष्ट था- कामकाजी और जरूरतमंद महिलाओं को अपने शहर में सुरक्षित सफर का भरोसा देना। यह सेवा उन महिलाओं के लिए वरदान साबित हुई जिन्हें महानगरों में मुँह बाए बैठे अपराधी तत्त्वों या परपीड़ा में आनंद लेने वालों से प्रायः रोज ही जुझना पड़ता है। खतरों और आशंकाओं से भी सड़क-परिवहन की जिंदगी में कदम रखने का निर्णय लेना रेवती के लिए सरल नहीं था। लेकिन कभी-कभी विवशता भी प्रेरणा देती है। ऐसे ही अवसरों पर 'आँख नहीं, दृष्टि' वाला दर्शन प्रेरक होता है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे पति के इलाज में सारी जमापूँजी चुक जाने के बाद रेवती को अपने अस्तित्व के लिए कुछ-न-कुछ करना था। सो उन्होंने एकदम नया रास्ता चुना-कैब के द्वारा महिलाओं को सुरक्षित यात्रा का आश्वासन। गद्यांश के प्रारंभ में उद्धृत कथन किसके जीवन का दर्शन बना?
'किसी को देखने के लिए आँख की नहीं, दृष्टि की आवश्यकता होती है" - स्वामी विवेकानंद का यह कथन इस महिला के जीवन का दर्शन बन गया है। इसी जीवन दर्शन के सहारे उन्होंने एक ओर कठिनाइयों का सामना किया तो दूसरी ओर सफलता का मार्ग ढूँढा और उस पर निर्भयता से बढ़ चली। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मुंबई की रेवती रॉय की। रेवती रॉय वह महिला हैं जिन्होंने महिलाओं की कठिनाइयों -को-ध्यान में रख केवल उन्हीं की सुविधा के लिए 'फॉरशी' नामक से कैब-सेवा प्रारंभ की। उद्देश्य स्पष्ट था- कामकाजी और जरूरतमंद - महिलाओं को अपने शहर में सुरक्षित सफर का भरोसा देना। यह सेवा उन महिलाओं के लिए वरदान साबित हुई जिन्हें महानगरों में मुँह बाए बैठे अपराधी तत्त्वों या परपीड़ा में आनंद लेने वालों से प्रायः रोज ही जाना पड़ता है। खतरों और आशंकाओं से भी सड़क परिवहन की जिंदगी में कदम रखने का निर्णय लेना रेवती के लिए सरल नहीं था। लेकिन ए कभी-कभी विवशता भी प्रेरणा देती है। ऐसे ही अवसरों पर 'आँख नहीं, दृष्टि' वाला दर्शन प्रेरक होता है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे । पति के इलाज में सारी जमापूँजी चुक जाने के बाद रेवती को अपने अस्तित्व के लिए कुछ-न-कुछ करना था। सो उन्होंने एकदम नया रास्ता, चुना/- कैब के द्वारा महिलाओं को सुरक्षित यात्रा का आश्वासन | रेवती रॉय की कैब सेवा मूलतः किसके लिए है?
'किसी को देखने के लिए आँख की नहीं, दृष्टि की आवश्यकता होती है" - स्वामी विवेकानंद का यह कथन इस महिला के जीवन का दर्शन बन गया है। इसी जीवन दर्शन के सहारे उन्होंने एक ओर कठिनाइयों का सामना किया तो दूसरी ओर सफलता का मार्ग ढूँढा और उस पर निर्भयता से बढ़ चली। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मुंबई की रेवती रॉय की। रेवती रॉय वह महिला हैं जिन्होंने महिलाओं की कठिनाइयों -को-ध्यान में रख केवल उन्हीं की सुविधा के लिए 'फॉरशी' नामक से कैब-सेवा प्रारंभ की। उद्देश्य स्पष्ट था- कामकाजी और जरूरतमंद - महिलाओं को अपने शहर में सुरक्षित सफर का भरोसा देना। यह सेवा उन महिलाओं के लिए वरदान साबित हुई जिन्हें महानगरों में मुँह बाए बैठे अपराधी तत्त्वों या परपीड़ा में आनंद लेने वालों से प्रायः रोज ही जाना पड़ता है। खतरों और आशंकाओं से भी सड़क परिवहन की जिंदगी में कदम रखने का निर्णय लेना रेवती के लिए सरल नहीं था। लेकिन ए कभी-कभी विवशता भी प्रेरणा देती है। ऐसे ही अवसरों पर 'आँख नहीं, दृष्टि' वाला दर्शन प्रेरक होता है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे । पति के इलाज में सारी जमापूँजी चुक जाने के बाद रेवती को अपने अस्तित्व के लिए कुछ-न-कुछ करना था। सो उन्होंने एकदम नया रास्ता, चुना/- कैब के द्वारा महिलाओं को सुरक्षित यात्रा का आश्वासन | कैब सेवा प्रारंभ करने के पीछे कारण था
'किसी को देखने के लिए आँख की नहीं, दृष्टि की आवश्यकता होती है" - स्वामी विवेकानंद का यह कथन इस महिला के जीवन का दर्शन बन गया है। इसी जीवन दर्शन के सहारे उन्होंने एक ओर कठिनाइयों का सामना किया तो दूसरी ओर सफलता का मार्ग ढूँढा और उस पर निर्भयता से बढ़ चली। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मुंबई की रेवती रॉय की। रेवती रॉय वह महिला हैं जिन्होंने महिलाओं की कठिनाइयों -को-ध्यान में रख केवल उन्हीं की सुविधा के लिए 'फॉरशी' नामक से कैब-सेवा प्रारंभ की। उद्देश्य स्पष्ट था- कामकाजी और जरूरतमंद - महिलाओं को अपने शहर में सुरक्षित सफर का भरोसा देना। यह सेवा उन महिलाओं के लिए वरदान साबित हुई जिन्हें महानगरों में मुँह बाए बैठे अपराधी तत्त्वों या परपीड़ा में आनंद लेने वालों से प्रायः रोज ही जाना पड़ता है। खतरों और आशंकाओं से भी सड़क परिवहन की जिंदगी में कदम रखने का निर्णय लेना रेवती के लिए सरल नहीं था। लेकिन ए कभी-कभी विवशता भी प्रेरणा देती है। ऐसे ही अवसरों पर 'आँख नहीं, दृष्टि' वाला दर्शन प्रेरक होता है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे । पति के इलाज में सारी जमापूँजी चुक जाने के बाद रेवती को अपने अस्तित्व के लिए कुछ-न-कुछ करना था। सो उन्होंने एकदम नया रास्ता, चुना/- कैब के द्वारा महिलाओं को सुरक्षित यात्रा का आश्वासन | रेवती रॉय ने एकदम नया रास्ता चुना
'किसी को देखने के लिए आँख की नहीं, दृष्टि की आवश्यकता होती है" - स्वामी विवेकानंद का यह कथन इस महिला के जीवन का दर्शन बन गया है। इसी जीवन दर्शन के सहारे उन्होंने एक ओर कठिनाइयों का सामना किया तो दूसरी ओर सफलता का मार्ग ढूँढा और उस पर निर्भयता से बढ़ चली। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मुंबई की रेवती रॉय की। रेवती रॉय वह महिला हैं जिन्होंने महिलाओं की कठिनाइयों -को-ध्यान में रख केवल उन्हीं की सुविधा के लिए 'फॉरशी' नामक से कैब-सेवा प्रारंभ की। उद्देश्य स्पष्ट था- कामकाजी और जरूरतमंद - महिलाओं को अपने शहर में सुरक्षित सफर का भरोसा देना। यह सेवा उन महिलाओं के लिए वरदान साबित हुई जिन्हें महानगरों में मुँह बाए बैठे अपराधी तत्त्वों या परपीड़ा में आनंद लेने वालों से प्रायः रोज ही जाना पड़ता है। खतरों और आशंकाओं से भी सड़क परिवहन की जिंदगी में कदम रखने का निर्णय लेना रेवती के लिए सरल नहीं था। लेकिन ए कभी-कभी विवशता भी प्रेरणा देती है। ऐसे ही अवसरों पर 'आँख नहीं, दृष्टि' वाला दर्शन प्रेरक होता है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे । पति के इलाज में सारी जमापूँजी चुक जाने के बाद रेवती को अपने अस्तित्व के लिए कुछ-न-कुछ करना था। सो उन्होंने एकदम नया रास्ता, चुना/- कैब के द्वारा महिलाओं को सुरक्षित यात्रा का आश्वासन | कौन-सा विकल्प गद्यांश के मुख्य भाव के सबसे निकट है?
'किसी को देखने के लिए आँख की नहीं, दृष्टि की आवश्यकता होती है" - स्वामी विवेकानंद का यह कथन इस महिला के जीवन का दर्शन बन गया है। इसी जीवन दर्शन के सहारे उन्होंने एक ओर कठिनाइयों का सामना किया तो दूसरी ओर सफलता का मार्ग ढूँढा और उस पर निर्भयता से बढ़ चली। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मुंबई की रेवती रॉय की। रेवती रॉय वह महिला हैं जिन्होंने महिलाओं की कठिनाइयों -को-ध्यान में रख केवल उन्हीं की सुविधा के लिए 'फॉरशी' नामक से कैब-सेवा प्रारंभ की। उद्देश्य स्पष्ट था- कामकाजी और जरूरतमंद - महिलाओं को अपने शहर में सुरक्षित सफर का भरोसा देना। यह सेवा उन महिलाओं के लिए वरदान साबित हुई जिन्हें महानगरों में मुँह बाए बैठे अपराधी तत्त्वों या परपीड़ा में आनंद लेने वालों से प्रायः रोज ही जाना पड़ता है। खतरों और आशंकाओं से भी सड़क परिवहन की जिंदगी में कदम रखने का निर्णय लेना रेवती के लिए सरल नहीं था। लेकिन ए कभी-कभी विवशता भी प्रेरणा देती है। ऐसे ही अवसरों पर 'आँख नहीं, दृष्टि' वाला दर्शन प्रेरक होता है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे । पति के इलाज में सारी जमापूँजी चुक जाने के बाद रेवती को अपने अस्तित्व के लिए कुछ-न-कुछ करना था। सो उन्होंने एकदम नया रास्ता, चुना/- कैब के द्वारा महिलाओं को सुरक्षित यात्रा का आश्वासन | किस जिंदगी को खतरों और आशंकार से ब्रा माना गया है?
'किसी को देखने के लिए आँख की नहीं, दृष्टि की आवश्यकता होती है" - स्वामी विवेकानंद का यह कथन इस महिला के जीवन का दर्शन बन गया है। इसी जीवन दर्शन के सहारे उन्होंने एक ओर कठिनाइयों का सामना किया तो दूसरी ओर सफलता का मार्ग ढूँढा और उस पर निर्भयता से बढ़ चली। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मुंबई की रेवती रॉय की। रेवती रॉय वह महिला हैं जिन्होंने महिलाओं की कठिनाइयों -को-ध्यान में रख केवल उन्हीं की सुविधा के लिए 'फॉरशी' नामक से कैब-सेवा प्रारंभ की। उद्देश्य स्पष्ट था- कामकाजी और जरूरतमंद - महिलाओं को अपने शहर में सुरक्षित सफर का भरोसा देना। यह सेवा उन महिलाओं के लिए वरदान साबित हुई जिन्हें महानगरों में मुँह बाए बैठे अपराधी तत्त्वों या परपीड़ा में आनंद लेने वालों से प्रायः रोज ही जाना पड़ता है। खतरों और आशंकाओं से भी सड़क परिवहन की जिंदगी में कदम रखने का निर्णय लेना रेवती के लिए सरल नहीं था। लेकिन ए कभी-कभी विवशता भी प्रेरणा देती है। ऐसे ही अवसरों पर 'आँख नहीं, दृष्टि' वाला दर्शन प्रेरक होता है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे । पति के इलाज में सारी जमापूँजी चुक जाने के बाद रेवती को अपने अस्तित्व के लिए कुछ-न-कुछ करना था। सो उन्होंने एकदम नया रास्ता, चुना/- कैब के द्वारा महिलाओं को सुरक्षित यात्रा का आश्वासन | किस शब्द में उपसर्ग और प्रत्यय दोनों हैं?