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अर्धवार्षिक परीक्षा 2022-23 के लिए 5 टिप...

अर्धवार्षिक परीक्षा 2022-23 के लिए 5 टिप्स | टिप्स और ट्रिक्स | अर्धवार्षिक पढ़ाई कैसे करें | आशु सर

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₹ 4,000 is given at 5% per annum for one year and interest is compounded half yearly. ₹2000 is given at 40% per annum compounded quarterly for 1 year. The total interest received is nearest to: 4000 रुपये 5% प्रतिवर्ष की दर से एक वर्ष के लिए दिए जाते हैं तथा ब्याज की चक्रवृद्धि अर्धवार्षिक है। 2000 रुपये 1 वर्ष के लिए 40% प्रतिवर्ष की दर से दिए जाते हैं तथा ब्याज की चक्रवृद्धि त्रैमासिक है। प्राप्त होने वाला कुल ब्याज लगभग कितना है?

A sum of Rs 12,000 is invested for 15 months at 10% per annum compounded half yearly. What is the percentage gain, at 12000 रुपये की एक राशि 15 माह के लिए 10% प्रति वर्ष अर्धवार्षिक चक्रवृद्धि पर निवेश की जाती है| प्रतिशत लाभ ज्ञात करें |

For an examination of a practical based subject, the total marks is 100. The break-up for theory, practical, project and viva voce is 40%, 30%, 20%, 10%. A candidate scored 80% in theory, 70% in practical, 60% in project and 50% in viva voce. What was her aggregate percentage ? प्रैक्टिकल आधारित विषय की एक परीक्षा के लिए कुल अंक 100 हैं | थ्योरी, प्रैक्टिकल, प्रोजेक्ट और वाइवा के लिए इसमें से 40%, 30% , 20% और 10% तय किये गए हैं | एक छात्र को थ्योरी में 80%, प्रेक्टिकल में 70%, प्रोजेक्ट में 60% और वाइवा में 50% अंक आए | उसका कुल प्रतिशत ज्ञात करें |

A sum of Rs 18,000 is invested for 16 months at 8% per annum compounded half-yearly. What is the percentage gain at 18000 रुपये की राशि 8% प्रति वर्ष अर्धवार्षिक चक्रवृद्धि पर 16 महीनों के लिए निवेश की जाती है | प्रतिशत लाभ ज्ञात करें |

A sum of Rs 10,000 is invested for 17 months at 8% per annum compounded half yearly. What is the percentage gain at the end of 17 month, nearest to one decimal place? 10,000 रुपये की एक राशि को 17 माह के लिए 8% प्रति वर्ष अर्धवार्षिक चक्रवृद्धि पर निवेश किया जाता है | 17 माह के अंत में लाभ प्रतिशत ज्ञात करें |

आपको किसी महत्त्वपूर्ण परीक्षा की तैयारी में क्या कठिनाई हो रही है? क्याऐसा करने में समय की कमी महसूस हो रही है? अगर आपका जवाब हाँ है, तो आपको समय प्रबन्धन सीखने की जरूरत है। समय प्रबन्धन किसी भी परीक्षा की तैयारी का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है। बहुत से परीक्षार्थी ऐसे है, जो परीक्षाओं की तैयारी देर से और बेहतरीन ढंग से शुरू करते हैं, जिससे उन्हें समयाभाव सबसे बड़े शत्रु की तरह दिखने लगता है। बिना समय प्रबन्धन के उस अनुपात में फायदा नहीं हो पाता, जिस अनुपात में आप मेहनत करते हैं। वास्तव में समय की गति को या उसके स्वभाव को मैनेज नहीं किया जा सकता, क्योकि न तो इसे धीमा किया जा सकता है और न ही रोका जा सकता है। आप स्वयं को मैनेज करते हुए सिर्फ इसका सही उपयोग. कर सकते हैं। वास्तविकता यही है। सबसे पहले आप यह निर्धारित करें कि आपका वर्तमान समय कैसे व्यतीत हो रहा है। आप पिछले एक सप्ताह के अपने कार्यकलाप को एक पेपर पर । लिखकर देखिए कि आपने टाइमटेबल का कितना और कैसा अनुसरण किया है। पूरे सप्ताह में कितने घण्टे सेल्फ-स्टडी की है और आपका निर्धारित सिलेबस का कितना हिस्सा नहीं हो पाया है। एक बार पूरा विश्लेषण करने के बाद आप स्वयं को समय के हिसाब से बदलना शुरू कर सकते हैं। समा बचाने के लिए किसी विशेषज्ञ की टिप्स काम आ सकती है, परन्तु सबसे ' अधिक प्रभाव आपके निश्चय, समर्पण और समय नियोजन का रहेगा। समयप्रबन्धन आपके आत्मविश्वास को बढ़ाएगा और यह सफलता की दिशा में निर्णायक होगा। समय का अभाव उन्हें शत्रु जैसा लगता है, जो

A sum of Rs. 20,000 is invested for 15 months at the interest of 10% per annum compounded half yearly. What is the percentage gain, correct to one decimal place, at the end of 15 months? 20,000 रुपये की एक राशि 15 माह के लिए 10% प्रति वर्ष अर्धवार्षिक चक्रवृद्धि पर निवेश की जाती है | 15 माह के अंत में एक दशमलव स्थान तक लाभ प्रतिशत ज्ञात करें |

The taxi charges in a city contain fixed charges and additional charge per km. The fixed charge is for a distance of upto 5 km and additional charge/km there after. The charge for a distance of 10 km is ₹350 and for 25 km is ₹800. The charge for a distance of 30 km is :- एक शहर में टैक्सी का एक निश्चित किराया है और प्रति किमी अतिरिक्त शुल्क है। निश्चित किराया 5 किमी की दूरी के लिए है तथा उसके बाद प्रति किमी के लिए अतिरिक्त किराया है। 10 किमी दूरी का किराया ₹350 है तथा 25 किमी दूरी का किराया ₹800 है तो 30 किमी की दूरी का किराया ज्ञात करें।

राष्ट्रीय पर्वो और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ। कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल, और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ। बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगें, खुद तुकबंदियाँ करने लगें, रचने लगें, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वे उस राह से भटक जाएँगे जिस राह पर वे उन्हें चलाना चाहते हैं। जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुँचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वे वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं। उनके भीतर बच्चे के स्वतंत्रतापूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत-कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबके लिए समय कहाँ है। यह पाठ्यपुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते हैं शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें। दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगहें थी वे जगहें लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, वे अवसर ही गीत-कविताओं को गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इस सबके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगहें थी। खेलने-कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच से स्वतः ही नये खेलों, तुकबंदियों और खेलगीतों और बालगीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थीं, जबान पर चढ़ जाती थीं और सालों-साल उनकी टोलियों -के-बीच बनी रहती थी। समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी। शिक्षा-व्यवस्था गीत-कविता को किस दृष्टि से दखता है?

राष्ट्रीय पर्वो और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ। कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल, और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ। बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगें, खुद तुकबंदियाँ करने लगें, रचने लगें, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वे उस राह से भटक जाएँगे जिस राह पर वे उन्हें चलाना चाहते हैं। जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुँचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वे वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं। उनके भीतर बच्चे के स्वतंत्रतापूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत-कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबके लिए समय कहाँ है। यह पाठ्यपुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते हैं शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें। दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगहें थी वे जगहें लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, वे अवसर ही गीत-कविताओं को गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इस सबके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगहें थी। खेलने-कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच से स्वतः ही नये खेलों, तुकबंदियों और खेलगीतों और बालगीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थीं, जबान पर चढ़ जाती थीं और सालों-साल उनकी टोलियों -के-बीच बनी रहती थी। समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी। 'कविताएँ सुनी-सुनायी जाएँ' में क्रिया है