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NEET 2022 | ऐल्कोहॉल, फीनॉल एवं ईथर | जा...

NEET 2022 | ऐल्कोहॉल, फीनॉल एवं ईथर | जाने क्या है ऐलिफैटिक ईथर की कहानी Vipin Sir की जुबानी

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ऐल्कोहॉल|फिनॉल |वर्गीकरण |बेंजाइलिक ऐल्कोहॉल (विनाइलिक , फ़ीनॉल)|निर्माण की विधियाँ (ऐल्कोहॉल तथा ईथर )|निर्माण की विधियाँ (अम्ल उत्प्रेरित जलयोजन द्वारा)|योगात्मक अभिक्रिया का उदाहरण (क्रियाविधि)|कार्बधनायन का निर्माण (क्रियाविधि)|मार्कोनीकॉव का नियम |हाइ

भाषा के लिखित एवं मौखिक स्वरूप को सीखने में व्याकरण की क्या भूमिका है?

A cylindrical roller made up of iron is 1.2m long. Its internal radius is 24cm and thickness of the iron sheet used in making the roller is15 cm. What is mass the(in kg ) of the roller, if 1 cm^3 of the iron has 8 g mass? लोहे से बना एक बेलनाकार रोलर 1.2 मीटर लंबा है। इसकी आंतरिक त्रिज्या 24 सेमी है और रोलर बनाने में उपयोग की जाने वाली लोहे की शीट की मोटाई 15 सेमी है। रोलर का वजन (किलो में क्या है, यदि 1 cm^3 लोहे का द्रव्यमान 8 ग्राम है ?

हैरानी की बात यह है कि मेरी दलील मित्रों के हलक से नहीं उतरती थी, तब मैं उनसे कहता था-'साहित्य की हर विधा को, हर तरह की लेखनी को मैं बतौर चुनौती स्वीकार करता हूँ। आम आदमी से लेकर खास आदमी तक के हृदय को छूना कोई मामूली बात नहीं होती। यह तो आप भी स्वीकार करेंगे, क्योंकि यह काम सिर्फ रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थ ही कर पाते है। मेरी यह दलील रामबाण सिद्ध होती थी, वे सारे मित्र सोच में पड़ जाते थे, क्योंकि वे केवल किसी भी एक वर्ग के लिए लिख पाते थे- 'मास' के लिए या 'क्लास' के लिए। उनके दायरे सीमित थे लेकिन मैं दायरों के बाहर का शख्स हूँ। शायद इसी कारण मैं आपसे खुलकर अन्तरंग बातें भी कर सकता हूँ। बात कहानी की रचना-प्रक्रिया से आरम्भ की थी। तब मैं 'ओ. हेनरी' की एक कहानी पढ़ता था और भीतर दो नई कहानियों के बीज अपने आप पड़ जाते थे। न कोई मशक्कत, न कोई गहरी सोचा यह प्रोसेस मेरे लिए उतना ही आसान था जितना कि कैरम का खेल। फिर भी ये रचनाएँ कहानी के शिल्प में कहानी विधा के अन्तर्गत लिखी गई पुख्ता किस्सागोई हैं। पर यह किस्सागोई जिन्दगी से अलग नहीं हो सकती। लेखक के लेखन की क्या खास बात है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। हैरानी की बात यह है कि मेरी दलील मित्रों के हलक से नहीं उतरती थी, तब मैं उनसे कहता था- 'साहित्य की हर विधा को हर तरह की लेखनी को मैं बतौर चुनौती स्वीकार करता हूँ। आम आदमी से लेकर खास आदमी तक के हृदय को छूना कोई मामूली बात नहीं होती। यह तो आप भी स्वीकार करेंगे, क्योंकि यह काम सिर्फ रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ ही कर पाते हैं।' मेरी यह दलील रामबाण सिद्ध होती थी, वे सारे मित्र सोच में पड़ जाते थे, क्योंकि वे केवल किसी भी एक वर्ग के लिख पाते थे- 'मास' के लिए 'क्लास' के लिए। उनके दायरे सौमित थे। लेकिन मैं दायरों के बाहर का शख्स हूँ। शायद इसी कारण मैं आपसे खुलकर अंतरंग बातें भी कर सकता हूँ। बात कहानी की रचना-प्रक्रिया से आरंभ की थी। तब मैं 'ओ.हेनरी' की एक कहानी पढ़ता था और भीतर दो नई कहानियों के बीज अपने आप पड़ जाते थे। न कोई मशक्कत, न कोई गहरी सोच। यह प्रोसेस मेरे लिए उतना ही आसान था जितना कि कैरम का खेल। फिर भी ये रचनाएँ कहानी के शिल्प में कहानी विधा के अंतर्गत लिखी गई पुख्ता किस्सागोई हैं। पर यह किस्सागोई जिंदगी से अलग नहीं हो सकती। लेखक के लेखन की क्या खास बात है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए काव्य कला के बारे में अपने वाल्मीकि की कथा सुनी है क्रोंच वध से फूटे हुए कविता के अजस्त्र निर्झर की बात आप अवश्य जानते है। वह कहानी सुन्दर है और उसके द्वारा कविता के स्वभाव की और जो संकेत होता है। की कविता मानव की आत्मा के आर्त्त -चीत्कार का सार्थक रूप है उसकी कई व्याख्याएँ की जा सकती है और की गयी है लेकिन हम इसे एक सुन्दर कल्पना से अधिक कुछ नहीं मानते। बल्कि हम कहेंगे की हम इससे अधिक कुछ मानना चाहते ही नहीं। क्योंकि हम यह नहीं मानना चाहते की कविता ने प्रकट होने के लिए इतनी देर तक प्रतीक्षा की। वाल्मीकि और रामचंद्र का काल और अयोध्या जैसी नगरी का काल , भारतीय सस्कृति की चरमोत्कर्ष का काल चाहे न भी रहा हो , यह स्पष्ट है की यह संस्कृति की एक पर्याप्त विकसित अवस्था का काल था , और हम यह नहीं मान सकते , नहीं मानना चाहते है की मौलिक ललित कलाओ में से कोई एक भी ऐसी थी जो इतने समय तक प्रकट हुए बिना ही रह गयी थी। अतएव हम जिस अवस्था की कल्पना करना चाहते है वह वाल्मीकि से बहुत पहले की अवस्था है। वैज्ञानिक मुहावरे की शरण लेकर कहे की वह नागरिक सभ्यता से पहले की अवस्था होनी चाहिए , वह खेतिहर सभ्यता से और चरवाहा से भी पहले की अवस्था होनी चाहिए। वह अवस्था जब मानव करारो में कंदराएँ खोदकर रहता था , और घास -पात या कभी पत्थर या ताम्बे के फरसों से आखेट करके मांस खाता था। गद्यांश के अनुसार हम कविता को क्या मानते है ?