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Basic concept of physics | Lec 5 विमीय व...

Basic concept of physics | Lec 5 विमीय विश्लेषण पर आधारित NEET मे पूछे गए प्रश्न | 11th Physics

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दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'कुहरा' किसका प्रतीक है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'मुट्ठियों में जुगनू दबाना' का आशय है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'दिनकर' किसका पर्यायवाची है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। यह कविता क्या प्रेरणा देती है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'सूरज' किसका प्रतीक है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'अमावस' किसका प्रतीक है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 5 रवि जग में शोभा सरसाता सोम सुधा बरसाता। सब है लगे कर्म में कोई निष्क्रिय दृष्टि न आता। है उद्देश्य नितान्त तुच्छ तृण के भी लघु जीवन का। उसी पूर्ति में वह करता है अन्त कर्ममय तन का।। तुम मनुष्य हो, अमित बुद्धि-बल विलसित जन्म तुम्हारा। क्या उद्देश्य रहित हो जग में, तुमने कभी विचारा? बुरा न मानों एक बार सोचो तुम अपने मन में क्या कर्तव्य समाप्त कर लिया तुमने निज जीवन में? जिस पर गिरकर उदर-दरी से तुमने जन्म लिया है, जिसका खाकर अन्न सुधासम नीर, समीर पिया है वही स्नेह की मूर्ति दयामय माता तुल्य मही है उसके प्रति कर्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है? यह कविता क्या प्रेरणा देती है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 5 रवि जग में शोभा सरसाता सोम सुधा बरसाता। सब है लगे कर्म में कोई निष्क्रिय दृष्टि न आता। है उद्देश्य नितान्त तुच्छ तृण के भी लघु जीवन का। उसी पूर्ति में वह करता है अन्त कर्ममय तन का।। तुम मनुष्य हो, अमित बुद्धि-बल विलसित जन्म तुम्हारा। क्या उद्देश्य रहित हो जग में, तुमने कभी विचारा? बुरा न मानों एक बार सोचो तुम अपने मन में क्या कर्तव्य समाप्त कर लिया तुमने निज जीवन में? जिस पर गिरकर उदर-दरी से तुमने जन्म लिया है, जिसका खाकर अन्न सुधासम नीर, समीर पिया है वही स्नेह की मूर्ति दयामय माता तुल्य मही है उसके प्रति कर्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है? 'सोम' शब्द का पर्यायवाची है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 5 रवि जग में शोभा सरसाता सोम सुधा बरसाता। सब है लगे कर्म में कोई निष्क्रिय दृष्टि न आता। है उद्देश्य नितान्त तुच्छ तृण के भी लघु जीवन का। उसी पूर्ति में वह करता है अन्त कर्ममय तन का।। तुम मनुष्य हो, अमित बुद्धि-बल विलसित जन्म तुम्हारा। क्या उद्देश्य रहित हो जग में, तुमने कभी विचारा? बुरा न मानों एक बार सोचो तुम अपने मन में क्या कर्तव्य समाप्त कर लिया तुमने निज जीवन में? जिस पर गिरकर उदर-दरी से तुमने जन्म लिया है, जिसका खाकर अन्न सुधासम नीर, समीर पिया है वही स्नेह की मूर्ति दयामय माता तुल्य मही है उसके प्रति कर्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है? 'निष्क्रिय' शब्द का विपरीतार्थक लिखिए