08 इलेक्ट्रोनिक सेटिंग | जीरो लेवल बेसिक केमिस्ट्री |11वीं, 12वीं/एनईईटी केमिस्ट्री के लिए |संदेह
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The average of twelve numbers is 55.5. The average of the first four numbers is 53.4 and that of the next four numbers is 54.6. The 10th number is greater than the 9th number by 3 but lesser than the 11th and 12th numbers by 2 and 3, respectively. What is the average of the 10th and the 12th numbers? बारह संख्याओं का औसत 55.5 है | पहली चार संख्याओं का औसत 53.4 है तथा अगली चार संख्याओं का औसत 54.6 है | 10वीं संख्या 9वीं संख्या से 3 अधिक है लेकिन 11वीं और 12वीं संख्याओं से क्रमशः 2 और 3 कम है | 10वीं और 12वीं संख्याओं का औसत ज्ञात करें |
The given bar graph represents the pass percentage of the 10th and 12th classes of a school during the consecutive four year period 2016-19. दिया गया दंड आरेख 2016-19 की अवधि में चार लगातार वर्षों के दौरान एक स्कूल की 10वीं और 12वीं कक्षाओं की उत्तीर्णता प्रतिशत को प्रदर्शित करता है। What is the average of the pass percentage of the 10th class for all four years? सभी चार वर्षों के लिए 10वीं कक्षा की उत्तीर्णता प्रतिशत का औसत कया है?
The average of thirteen numbers is 80. The average of the first five numbers is 74.5 and that of the next five numbers is 82.5. The 11th number is 6 more than the 12th number and the 12th number is 6 less than the 13th number. What is the average of the 11th and the 13th numbers? तेरह संख्याओं का औसत 80 है | पहली पांच संख्याओं का औसत 74.5 और अगली पांच संख्याओं का औसत 82.5 है | 11वीं संख्या 12वीं संख्या से 6 अधिक है तथा 12वीं संख्या 13वीं संख्या से 6 कम है | 11वीं तथा 13वीं संख्याओं का औसत ज्ञात करें |
The average of twelve numbers is 45.5. The average of the first four numbers is 41.5 and that of the next five numbers is 48. The 10th number is 4 more than the 11th number and 9 more than the 12th number. What is the average of the 10th and 12th numbers? बारह संख्याओं का औसत 45.5 है | पहली चार संख्याओं का औसत 41.5 है तथा अगली पाँच संख्याओं का औसत 48 है | 10वीं संख्या, 11वीं संख्या से 4 अधिक तथा 12वीं संख्या से 9 अधिक है | 10वीं तथा 12वीं संख्याओं का औसत कितना है ?
The average of thirteen numbers is 47. The average of the first three numbers is 39 and that of the next seven numbers is 49. The 11th number is two times the 12th number and 12th number is 3 less than the 13th number. What is the average of 11th and 13th numbers? तेरह संख्याओं का औसत 47 है | पहली तीन संख्याओं का औसत 39 है तथा अगली सात संख्याओं का औसत 49 है | 11वीं संख्या 12वीं संख्या से दोगुनी है तथा 12वीं संख्या 13वीं संख्या से 3 कम है | 11वीं और 13वीं संख्याओं का औसत ज्ञात करें |
The average of eleven numbers is 54. The average of the first four numbers is 48 and that of the next four numbers is 25% more than the average of the first four. The ninth number is 8 greater than the 11th number and the tenth number is 4 greater than the 11th number. What is the average of the 9th and the 10th numbers? 11 संख्याओं का औसत 54 है | पहली चार संख्याओं का औसत 48 है तथा अगली चार संख्याओं का औसत पहली चार संख्याओं के औसत से 25% अधिक है | 9वीं संख्या 11वीं संख्या से 8 अधिक है तथा दसवीं संख्या 11वीं संख्या से 4 अधिक है | 9वीं और 10वीं संख्याओं का औसत ज्ञात करें |
A certain sum is lent at 4% p.a for 3 years 8% p.a for next 4 years and 12 % p.a beyond 7 years. If for a period of 11 years the simple interest obtained is ₹ 27,600, then the sum is (in ₹ ): एक निश्चित राशि 3 वर्षों के लिए 4% प्रति वर्ष, अगले 4 वर्षों के लिए 8% प्रति वर्ष तथा 7 वर्षों के बाद 12% प्रति वर्ष की दर से उधार दी जाती है। यदि 11 वर्षों की अवधि के लिए साधारण ब्याज 27,600 रुपये प्राप्त होता है, तो यह राशि (रुपये में) कितनी है?
वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" 'गोदान' के पात्र हैं
वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" 1914 तक देश के औद्योगिक विकास धीमा रहने का मुख्य कारण क्या हो सकता है?
वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" गाँवों के लोगों का शोषण कौन कर रहा था?
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