लोकतंत्र की चुनौतियाँ पूर्ण अध्याय कक्षा 10 नागरिक शास्त्र अध्याय 8 ?रिवाइज⚪भारत?बोर्ड परीक्षा की तैयारी
लोकतंत्र की चुनौतियाँ पूर्ण अध्याय कक्षा 10 नागरिक शास्त्र अध्याय 8 ?रिवाइज⚪भारत?बोर्ड परीक्षा की तैयारी
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The graph shows the result of 10th class students of a school for 4 years. Study the graph and answer the questions: The number of students appeared for the 10th class exam in the year 2002 is. निम्नलिखित दण्ड आरेख 10 वीं कक्षा के छात्रों का 4 वर्ष का परीक्षा परिणाम दर्शाता है। आरेख का अध्ययन कीजिए और निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दीजिए : छात्रों की संख्या वर्ष 2002 में 10 वीं कक्षा की परीक्षा में शामिल छात्रों की संख्या बताइए:
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। प्रस्तुत गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से क्या हो सकता है?
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। वैदिक काल में निम्नलिखित में से किस विषय की शिक्षा दी जाती थी?
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। वेदत्रयी के अन्तर्गत निम्नलिखित में से किसे शामिल नहीं किया जाता है?
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। वायु पुराण में निम्नलिखित में से किस विषय को शामिल नहीं किया गया है?
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। मनु के अनुसार वैश्यों को निम्नलिखित में से किस विषय की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए?
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। प्रस्तुत गद्यांश में निम्नलिखित में से किस विषय का उल्लेख नहीं किया गया है?
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। काव्यशास्त्र में कौन-सा समास है?
The total number of students in section A and B of a class is 110. The number of students in section A is 10 more than that of section B. The average score of the students in B, in a test, is 20% more than that of students in A. If the average score of all the students in the class is 72, then what is the average score of the students in A? किसी कक्षा के खंड A और खंड B के छात्रों की कुल संख्या 110 है | खंड A में छात्रों की संख्या खंड 9 के छात्रों की संख्या से 10 अधिक है| किसी परीक्षा में B के छात्रों का औसत प्राप्तंक A के छात्रों के औसत प्राप्तंक से 20% अधिक है | यदि सभी छात्रों का औसत प्राप्तांक 72 है, तो A के छात्रों का औसत प्राप्तांक ज्ञात करें |
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