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यूक्लिड की ज्यामिति का परिचय | प्लेफेयर ...

यूक्लिड की ज्यामिति का परिचय | प्लेफेयर की अभिगृहीत | Class 9 NCERT गणित (Ganit)|Chapter 5 |Amit Sir

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यूक्लिड की ज्यामिति का परिचय - भूमिका |ठोस |पृष्ठ |यूक्लिड की परिभाषाएँ |यूक्लिड की अभिगृहीत |यूक्लिड की अभिधारणाएं |प्रश्न |सारांश

यूक्लिड की अभिग्रहीत |यूक्लिड की अभिधारणाएं |अभ्यास कार्य |प्रमेय 5.1|NCERT प्रश्नावली |सारांश

first graph shows the number of students (boys and girls in thousands) in Grade 1 to Grade 5. पहला आरेख ग्रेड 1 से लेकर ग्रेड 5 तक छात्रों की संख्या (लड़के और लड़कियाँ, हज़ार में) को दर्शाता है। And the bar graph below shows the percentage share of five schools in the total students studying in that class. और नीचे दिया गया दंड आरेख उस कक्षा में पढ़ रहे कुल छात्रों में पाँच विद्यालयों की प्रतिशत हिस्सेदारी को दर्शाता है। Based on the information, if the boys to girls ratio in school D is 3:1, then the number of boys studying in school D is: दी गयी जानकारी के आधार पर, यदि विद्यालय D में लड़कों और लड़कियों की संख्या का अनुपात 3:1 है, तो विद्यालय D में पढ़ने वाले लड़कों की | संख्या कितनी है?

The ratio of the number of boys to the number of girls in a school of 640 students is 5:3. If 30 more girls are admitted in the school, then how many more boys should be admitted so that the ratio of boys to that of the girls, becomes 14:9 640 छात्रों वाले एक विद्यालय में लड़कों की संख्या तथा लड़कियों की संख्या में 5 : 3 का अनुपात है | यदि इस विद्यालय में 30 और लड़कियों का नामांकन हो जाता है, तो कितने अतिरिक्त लड़कों का नामांकन होना चाहिए ताकि लड़कों और लड़कियों की संख्या का अनुपात 14 : 9 हो जाए |

The ratio of boys to girls in a class is 2 : 3 and the average score of all the students in the class in maths is 54. The average score of boys is 50% more than that of girls. What is the average score of girls ? एक कक्षा में लड़के और लड़कियों की संख्या का अनुपात 2 : 3 है और कक्षा में सभी छात्रों के गणित में औसत प्राप्तांक 54 है | लड़कों का औसत प्राप्तांक लड़कियों के औसत प्राप्तंक से 50% अधिक है | लड़कियों का औसत प्राप्तांक कितना है ?

There are 96 students in a class, out of which the number of girls is 40% more than that of the boys. The average score in mathematics of the boys is 40% more than the average score of girls. If the average score in mathematics of all the students is 63, then what is the average score of the girls in mathematics? एक कक्षा में 96 छात्र हैं, जिनमें से लड़कियों की संख्या लड़कों की संख्या से 40% अधिक है | लड़कों का गणित में औसत प्राप्तांक लड़कियों के औसत प्राप्तांक से 40% अधिक है | यदि गणित में सभी छात्रों का औसत प्राप्तांक 63 है, तो गणित में लड़कियों का औसत प्राप्तांक ज्ञात करें |

In an examination, the success to failure ratio was 5 : 2. Had the number of failures been 14 more, then the success to failure ratio would have been 9 :5. The total number of candidates who appeared for the examination was : एक परीक्षा में, सफलता और असफलता का जनुपात 5 : 2 था | यदि असफल अभ्यर्थी की संख्या 14 अधिक होती , तो सफलता और असफलता का अनुपात 9 : 5 होता | इस परीक्षा में कुल कितने अभ्यर्थी शामिल हुए थे ?

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में जीवन के तत्त्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके किया। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतन्त्र शिक्षा पद्धति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी। बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था 'पब्बज्जा' तथा दूसरा उपसम्पदा पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी। दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी 1 1। पारिवारिक जीवन 2। ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी न हो 3। अशुद्ध आचरण 4। झूठ बोलना 5। मादक द्रव्यों का सेवन 6। असमय भोजन 7। नृत्य-गायन 8। पुष्प माला, इत्र, गहने आदि का प्रयोग 9। उच्च आसन का प्रयोग 10। सोना एवं चाँदी की प्राप्ति संरक्षक की अनुमति किसके लिए आवश्यक थी?

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में जीवन के तत्त्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके किया। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतन्त्र शिक्षा पद्धति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी। बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था 'पब्बज्जा' तथा दूसरा उपसम्पदा पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी। दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी 1 1। पारिवारिक जीवन 2। ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी न हो 3। अशुद्ध आचरण 4। झूठ बोलना 5। मादक द्रव्यों का सेवन 6। असमय भोजन 7। नृत्य-गायन 8। पुष्प माला, इत्र, गहने आदि का प्रयोग 9। उच्च आसन का प्रयोग 10। सोना एवं चाँदी की प्राप्ति ब्राह्मणों में शिक्षा का प्रारम्भ किस संस्कार से होता था?

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में जीवन के तत्त्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके किया। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतन्त्र शिक्षा पद्धति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी। बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था 'पब्बज्जा' तथा दूसरा उपसम्पदा पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी। दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी 1 1। पारिवारिक जीवन 2। ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी न हो 3। अशुद्ध आचरण 4। झूठ बोलना 5। मादक द्रव्यों का सेवन 6। असमय भोजन 7। नृत्य-गायन 8। पुष्प माला, इत्र, गहने आदि का प्रयोग 9। उच्च आसन का प्रयोग 10। सोना एवं चाँदी की प्राप्ति प्रस्तुत गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से क्या हो सकता है?

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