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चुंबक|परिभाषाएँ|भू-चुंबकत्व या पार्थिव च...

चुंबक|परिभाषाएँ|भू-चुंबकत्व या पार्थिव चुम्बकत्व|चुंबकीकरण तथा चुंबकीय तीव्रता

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दोहरान |परिचय |चुंबक |चुंबक की खोज |चुंबक के प्रकार |चुंबक के प्रभाव |चुंबकीय तथा अचुंबकीय पदार्थ |सारांश

स्थाई चुंबक (चुंबकीय द्विध्रुव तथा द्विध्रुव आघूर्ण) तथा विद्युत चुंबक |परिभ्रमण करते इलेक्ट्रॉन का चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण |चुंबकीय द्विध्रुव (छड़ चुंबक) के कारण चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता |एकसमान चुंबकीय क्षेत्र मे चुंबकीय द्विध्रुव (छड़ चुंबक) पर बल आघूर्ण |पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र और चुंबकीय अवयव |दोलन चुम्बकत्वमापी |Summary

चुंबक तथा चुम्बकत्व|चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ तथा गुण|ऑरेसटेड का प्रयोग|सीधी धारावाही चालक तार में चुंबकीय क्षेत्र |दाहिने हाथ के अंगूठे का नियम|परिनालिका|विद्युत चुंबक|धारावाही चालक पर लगने वाला बल|फ्लेमिंग का वाम हस्त नियम|विद्युत मोटर के मुख्य भाग|वैद्युत

भू चुम्बकत्व (डॉ. विलियम गिल्बर्ट द्वारा)|महत्वपूर्ण परिभाषाएं |पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के मुख्य अवयव |पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक |दोलन चुंबकत्वमापी |OMR|Summary

भू चुम्बकत्व (डॉ. विलियम गिल्बर्ट द्वारा)|महत्वपूर्ण परिभाषाएं |पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के मुख्य अवयव |पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक |दोलन चुंबकत्वमापी |OMR|Summary

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उत्प्रेरकीय गुणधर्म |मिश्र धातु |परमाणु आकार या परमाणु तथा आयनी त्रिज्या |आयनन ऊर्जा |चुंबकीय गुणधर्म |दुर्बल क्षारीय या उदासीन माध्यम में |Summary

निम्नलिखित पद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मानव के लिए विचार तथा अनुभव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उदात्त है व इसका अथवा उसका नहीं है जातिगत अथवा देशगत नहीं है, वह सबका है, सारे विश्व का है। समस्त ज्ञान, विज्ञान और सभ्यता, सारी मानवता की विरासत है। पूर्व और पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के भेद, अक्षांश और देशान्तर का भेद तथा जलवायु और भौगोलिक सीमा के भेद सर्वथा निराधार हैं। सम्प्रदाय, समुदाय और जाति के नाम पर आदशौं, मूल्यों की स्थापना करना, संकीर्णता के वातावरण में मानवता के दम घोंटना-सा है। जो कुछ भी उपलब्धि है, वह चाहे जिस भू-भाग की उपज हो। महापुरुष विरोधी नहीं होते, एक-दूसरे के पूरक होते हैं। महापुरुष में अपने देश की विशेषता होती है। विवेकशील मनुष्य नम्रतापूर्वक महापुरुषों से शिक्षा ग्रहरण कर अपने जीवन को प्रकाशित करने का प्रयत्न करता है। समस्त मानवता उसके प्रति कृतज्ञ है। किन्तु अब हमें उनसे आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि ज्ञान की इतिश्री नहीं होती। संसार एक खुली पाठशाला है, जीवन एक खुली पुस्तक है, विकास की क्रिया के मूल में मानव की पूर्ण बनने की अपनी प्रेरणा है। विकास के लिए समन्वय का भाव होना परम आवश्यक है। यदि हम विभिन्न विचारधाराओं एवं उनके जन्मदाता महापुरुषों का पूर्ण खण्डन करें तो विकास अवरुद्ध हो जायेगा। किसी धर्म विशेष या मान्यता के खूटे के साथ संकीर्ण भाव से बंधकर तथा परम्पराओं और रूढ़ियों से जकड़े हुए हम आगे नहीं बढ़ सकते। मानव को मानव रूप में सम्मानित करके ही हम जातीयता, प्रान्तीयता, क्षुद्र राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता के भेद को तोड़ सकते हैं। आज मानव, मानव से दूर हटता जा रहा है। वह भूल चुका है कि देश, धर्म और जाति के भिन्न होते हुए भी हम सर्वप्रथम मानव हैं और समान हैं तथा सभी की भावनाएं और लक्ष्य एक ही हैं। सत्ताधारी मनुष्य दूसरों को कुचलकर सुख- सुवध ाओं पर एकाधिकार कर लेना चाहता है लेकिन एक आकाश के नीचे रहने वाले इन्सान तो सब एक हैं भले ही कोई कुदाल लेकर श्रमिका का कार्य करता हो, कोई कलम लेकर दफ्तर का, किन्तु लक्ष्य एक है- समाज का अभ्युदय। मानव का नाता श्रेष्ठ नाता है। नौकर कहकर पुकारना मानो मानव का अपमान है। सहयोगी, सहायक अथवा सस्नेह उसके नाम से सम्बोधित करना मधुर है। जेल और फांसी का विध र मानवता का कलंक है। एक सीमा एक दण्ड भी आवश्यक होता है, लेकिन दण्ड का आतंक समाज को पंगु बना देता है। हमें अपराध वृत्ति का शमन करके अपराधी को शिष्ट एवं सभ्य मानव बनाना चाहिए। दया मानवता का सार है। दया छोड़कर सत्य भी सत्य नहीं है। दया प्रेरित असत्य भी व्यावहारिक सत्य नहीं है। दया धर्म मानवधर्म हैं। . प्रस्तुत गद्यांश मुख्यतः किस भावना से ओतप्रोत है?