परावैद्युत संधारित्र और परावैद्युत भरा हुआ संधारित्र व परावैद्युत नहीं भरा हुआ संधारित्र में उष्मा का क्षय
जब नहीं था इंसान धरती पर थे जंगल जंगली जानवर, परिंदे इन्हीं सबके बीच उतरा इन्सान और घटने लगे जंगल जंगली जानवर, परिंदे इन्सान बढ़ने लगा बेतहाशा अब कहाँ जाते जंगल, जंगली जानवर, परिंदे प्रकृति किसी के साथ नहीं करती जाइन्साफी सभी के लिए बनाती है जगह सो अब इन्सनों के भीतर उतरने लगे हैं जंगल, जंगली जानवर और परिंदे 'अब कहाँ जाते जंगल' का भाव है कि