श्याम नारायण पाण्डेय जी का जीवन परिचय|साहित्यिक परिचय, भाषा शैली|श्याम नारायण पाण्डेय जी की कृतियाँ|हिन्दी साहित्य में स्थान और पुरस्कार|OMR
श्याम नारायण पाण्डेय जी का जीवन परिचय|साहित्यिक परिचय, भाषा शैली|श्याम नारायण पाण्डेय जी की कृतियाँ|हिन्दी साहित्य में स्थान और पुरस्कार|OMR
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संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। भारतीय भाषाओं के साहित्य के प्रति समाज के किस वर्ग में अरुचि की भावना है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए अपनी भाषा पढ़कर जैसे हम अपनी संस्कृति से परिचित होते है , वैसे ही अन्य भाषा पढ़कर उस संस्कृति का हमें परिचय मिलता है। साथ ही अपनी भाषा पढ़कर जैसे हम अपने भाषा - भाषी लोगो से जुड़ते है , हमारे व्यक्तित्व का समाजीकरण होता है और हमारी दृष्टि की संकीर्णता कम हो जाते है उसी प्रकार अन्य भाषा पढ़कर हम अपने से ऊपर उठकर बाहर से जुड़ते है हमारे व्यक्तित्व का अंतराष्ट्रीयकरण होता है और हमारी दृष्टि और भी मुक्त हो जाती है। इस तरह ,जैसे मातृभाषा - शिक्षण का महत्तम उदेशय व्यक्ति के व्यक्तित्व को 'स्व ' से उठाकर पुरे मातृभाषी समाज के उपयुक्त बनाना होता है वैसे ही अन्य भाषा -शिक्षण का महत्तम उदेश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व को अंतराष्ट्रीय स्तर देना है जिस व्यक्ति ने जितनी अधिक अन्य भाषाएँ सच्चे अर्थो में सीखी होंगी , उसके व्यक्तित्व में यह मुक्तता और अंतराष्ट्रीय उतनी ही अधिक होगी। अन्य भाषा पढ़कर में
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए अपनी भाषा पढ़कर जैसे हम अपनी संस्कृति से परिचित होते है , वैसे ही अन्य भाषा पढ़कर उस संस्कृति का हमें परिचय मिलता है। साथ ही अपनी भाषा पढ़कर जैसे हम अपने भाषा - भाषी लोगो से जुड़ते है , हमारे व्यक्तित्व का समाजीकरण होता है और हमारी दृष्टि की संकीर्णता कम हो जाते है उसी प्रकार अन्य भाषा पढ़कर हम अपने से ऊपर उठकर बाहर से जुड़ते है हमारे व्यक्तित्व का अंतराष्ट्रीयकरण होता है और हमारी दृष्टि और भी मुक्त हो जाती है। इस तरह ,जैसे मातृभाषा - शिक्षण का महत्तम उदेशय व्यक्ति के व्यक्तित्व को 'स्व ' से उठाकर पुरे मातृभाषी समाज के उपयुक्त बनाना होता है वैसे ही अन्य भाषा -शिक्षण का महत्तम उदेश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व को अंतराष्ट्रीय स्तर देना है जिस व्यक्ति ने जितनी अधिक अन्य भाषाएँ सच्चे अर्थो में सीखी होंगी , उसके व्यक्तित्व में यह मुक्तता और अंतराष्ट्रीय उतनी ही अधिक होगी। व्यक्तितत्व का अंतराष्ट्रीयकरण कब होता है ?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए अपनी भाषा पढ़कर जैसे हम अपनी संस्कृति से परिचित होते है , वैसे ही अन्य भाषा पढ़कर उस संस्कृति का हमें परिचय मिलता है। साथ ही अपनी भाषा पढ़कर जैसे हम अपने भाषा - भाषी लोगो से जुड़ते है , हमारे व्यक्तित्व का समाजीकरण होता है और हमारी दृष्टि की संकीर्णता कम हो जाते है उसी प्रकार अन्य भाषा पढ़कर हम अपने से ऊपर उठकर बाहर से जुड़ते है हमारे व्यक्तित्व का अंतराष्ट्रीयकरण होता है और हमारी दृष्टि और भी मुक्त हो जाती है। इस तरह ,जैसे मातृभाषा - शिक्षण का महत्तम उदेशय व्यक्ति के व्यक्तित्व को 'स्व ' से उठाकर पुरे मातृभाषी समाज के उपयुक्त बनाना होता है वैसे ही अन्य भाषा -शिक्षण का महत्तम उदेश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व को अंतराष्ट्रीय स्तर देना है जिस व्यक्ति ने जितनी अधिक अन्य भाषाएँ सच्चे अर्थो में सीखी होंगी , उसके व्यक्तित्व में यह मुक्तता और अंतराष्ट्रीय उतनी ही अधिक होगी। मातृभाषा शिक्षण का महत्तम उदेश्य क्या है ?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए अपनी भाषा पढ़कर जैसे हम अपनी संस्कृति से परिचित होते है , वैसे ही अन्य भाषा पढ़कर उस संस्कृति का हमें परिचय मिलता है। साथ ही अपनी भाषा पढ़कर जैसे हम अपने भाषा - भाषी लोगो से जुड़ते है , हमारे व्यक्तित्व का समाजीकरण होता है और हमारी दृष्टि की संकीर्णता कम हो जाते है उसी प्रकार अन्य भाषा पढ़कर हम अपने से ऊपर उठकर बाहर से जुड़ते है हमारे व्यक्तित्व का अंतराष्ट्रीयकरण होता है और हमारी दृष्टि और भी मुक्त हो जाती है। इस तरह ,जैसे मातृभाषा - शिक्षण का महत्तम उदेशय व्यक्ति के व्यक्तित्व को 'स्व ' से उठाकर पुरे मातृभाषी समाज के उपयुक्त बनाना होता है वैसे ही अन्य भाषा -शिक्षण का महत्तम उदेश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व को अंतराष्ट्रीय स्तर देना है जिस व्यक्ति ने जितनी अधिक अन्य भाषाएँ सच्चे अर्थो में सीखी होंगी , उसके व्यक्तित्व में यह मुक्तता और अंतराष्ट्रीय उतनी ही अधिक होगी। समाजीकरण से तात्पर्य है
सभ्यता के पुराने दस्तावेज के रूप में खण्डहरों व भूमिगत सामग्रियों को देखा जाता है। जब व्यक्ति अपने आपको सामाजिक जीवन में ढालने लगा, तब से वह समय एकता में प्रदर्शित होता है। इस प्रदर्शन की सीमा को हड़प्पा व मोहनजोदडो से प्राप्त वस्तुओं से जान सकते हैं उनकी अभिव्यक्ति रहन-सहन, मोहरों, सिक्कों एवं बने-बनाए पक्के व अधपके खिलौनों से जान सकते हैं। उनकी धार्मिक भावना के रूप में कुण्ड की प्राप्ति हुई है, जिससे उनकी धार्मिक संवेदनाओं को जान सकते हैं। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं में ढहती सभ्यताओं की कहानी, जमीन में धंसे समय के काल को खोद कर देख सकते हैं। इससे इतिहास की टूटी कड़ियों का पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि कैसे नगरीय सभ्यता के स्थान पर ग्रामीण सभ्यता का विकास होता है। यह वैदिक युग में हुआ और इसी सभ्यता में भाषा की उपलब्धि हासिल हुई, जिसको संस्कृत के रूप में जाना जाता है। वैदिक युग में मानव ने जंगल से निकल ग्रामीण संस्कृति का निर्माण किया तथा समाज ने प्राकृतिक रूपों को ही अपने इष्ट के रूप में स्वीकारा, जिसकी अभिव्यक्ति ऋग्वेद के रूप में मिलती है। भाषा की यह वृत्ति केवल भारतभूमि पर ही सम्भव नहीं हुई, बल्कि विश्व के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलती है। संस्कृत भाषा की प्राथमिक जीवित रचना के रूप में ऋग्वेद का शास्त्रीय संस्कृत भाषा का सम्बन्ध है। संस्कृत भाषा अपनी समस्त स्थितियों में प्रयुक्त बहुल भाषा है, परन्तु वेदों में जो रूप प्रयुक्त हुए हैं, उनमें बाद के दिनों से अन्तर है। यही कारण है कि वैदिक भाषा का प्रभाव बाद के दिनों में अन्य भाषाओं में देखने को मिलता है, क्योंकि संस्कृत ही इन भाषाओं की जननी है। वर्तमान में भारतीय संविधान में संगृहीत सभी भाषाओं का प्रभाव देखा जाता है। किस युग में मानव ने ग्रामीण संस्कृति का निर्माण किया?
सभ्यता के पुराने दस्तावेज के रूप में खण्डहरों व भूमिगत सामग्रियों को देखा जाता है। जब व्यक्ति अपने आपको सामाजिक जीवन में ढालने लगा, तब से वह समय एकता में प्रदर्शित होता है। इस प्रदर्शन की सीमा को हड़प्पा व मोहनजोदडो से प्राप्त वस्तुओं से जान सकते हैं उनकी अभिव्यक्ति रहन-सहन, मोहरों, सिक्कों एवं बने-बनाए पक्के व अधपके खिलौनों से जान सकते हैं। उनकी धार्मिक भावना के रूप में कुण्ड की प्राप्ति हुई है, जिससे उनकी धार्मिक संवेदनाओं को जान सकते हैं। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं में ढहती सभ्यताओं की कहानी, जमीन में धंसे समय के काल को खोद कर देख सकते हैं। इससे इतिहास की टूटी कड़ियों का पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि कैसे नगरीय सभ्यता के स्थान पर ग्रामीण सभ्यता का विकास होता है। यह वैदिक युग में हुआ और इसी सभ्यता में भाषा की उपलब्धि हासिल हुई, जिसको संस्कृत के रूप में जाना जाता है। वैदिक युग में मानव ने जंगल से निकल ग्रामीण संस्कृति का निर्माण किया तथा समाज ने प्राकृतिक रूपों को ही अपने इष्ट के रूप में स्वीकारा, जिसकी अभिव्यक्ति ऋग्वेद के रूप में मिलती है। भाषा की यह वृत्ति केवल भारतभूमि पर ही सम्भव नहीं हुई, बल्कि विश्व के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलती है। संस्कृत भाषा की प्राथमिक जीवित रचना के रूप में ऋग्वेद का शास्त्रीय संस्कृत भाषा का सम्बन्ध है। संस्कृत भाषा अपनी समस्त स्थितियों में प्रयुक्त बहुल भाषा है, परन्तु वेदों में जो रूप प्रयुक्त हुए हैं, उनमें बाद के दिनों से अन्तर है। यही कारण है कि वैदिक भाषा का प्रभाव बाद के दिनों में अन्य भाषाओं में देखने को मिलता है, क्योंकि संस्कृत ही इन भाषाओं की जननी है। वर्तमान में भारतीय संविधान में संगृहीत सभी भाषाओं का प्रभाव देखा जाता है। निम्नलिखित में से कौन-सी विश्व की पहली साहित्यिक रचमा मानी जाती है
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति में बहुत-सी अच्छी बातें होते हुए भी वह मूलतः अधिकार प्रधान, भोग प्रधान है, उसमें अपने सुख की प्रवृत्ति प्रधान है। इसलिए यहाँ प्रधान शरीर-सुख-भोग तथा उसके निमित्त अगणित साधन जुटाने को और है जबकि भारतीय संस्कृति अनेक बुराइयों के होते हुए भी मुख्यतः धर्म प्रधान, कर्तव्य प्रधान, त्याग और तपस्या प्रवृत्ति-मूलक संस्कृति है। विश्व-मानव या विश्व-मानवता एवं संस्कृति का निर्माण तभी सम्भव है जब मनुष्य अपने शरीर का विचार इस सीमा तक न करे कि उस प्रयत्न में वह आत्मा, वह प्राण ज्योति ही तिरोहित हो जाए जिससे मानव, मानव है। स्पष्टतः भारतीय संस्कृति में, अहिंसक जीवन निर्माण की, दूसरों के लिए जीने की सम्भावनाएँ अधिक होने से गाँधी जी को श्रद्धा थी कि भारतीय संस्कृति ही हमारे जीवन का दीप है और वही विश्व-संस्कृति या विश्व-मानवता की आध रिशिला बन सकती है। पाश्चात्य संस्कृति के सम्बन्ध में सत्य है
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति में बहुत-सी अच्छी बातें होते हुए भी वह मूलतः अधिकार प्रधान, भोग प्रधान है, उसमें अपने सुख की प्रवृत्ति प्रधान है। इसलिए यहाँ प्रधान शरीर-सुख-भोग तथा उसके निमित्त अगणित साधन जुटाने को और है जबकि भारतीय संस्कृति अनेक बुराइयों के होते हुए भी मुख्यतः धर्म प्रधान, कर्तव्य प्रधान, त्याग और तपस्या प्रवृत्ति-मूलक संस्कृति है। विश्व-मानव या विश्व-मानवता एवं संस्कृति का निर्माण तभी सम्भव है जब मनुष्य अपने शरीर का विचार इस सीमा तक न करे कि उस प्रयत्न में वह आत्मा, वह प्राण ज्योति ही तिरोहित हो जाए जिससे मानव, मानव है। स्पष्टतः भारतीय संस्कृति में, अहिंसक जीवन निर्माण की, दूसरों के लिए जीने की सम्भावनाएँ अधिक होने से गाँधी जी को श्रद्धा थी कि भारतीय संस्कृति ही हमारे जीवन का दीप है और वही विश्व-संस्कृति या विश्व-मानवता की आध रिशिला बन सकती है। उपर्युक्त गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक है
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