न अवरोध कोई, न बाधा कहीं हैं.न संदेह कोई, न व्यवधान कोईबहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलातीनहीं पथ-डगर ...
न अवरोध कोई, न बाधा कहीं हैं.न संदेह कोई, न व्यवधान कोईबहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलातीनहीं पथ-डगर ...
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न अवरोध कोई, न बाधा कहीं हैं. न संदेह कोई, न व्यवधान कोई बहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलाती नहीं पथ-डगर आज अनजान कोई दिशाएँ निमंत्रण मुझे दे रही हैं दिगंतर खुला सिर्फ मेरे लिए है नहीं कुछ यहां राह जो रोक पाए न कोई यहाँ जो मुझे टोक पाए अजानी हवा में उड़ा जा रहा हूँ विजय गीत मेरा गगन मस्त गाए हृदय में कहीं कह रहा बात कोई, धरा और गगन सिर्फ तेरे लिए है। अर्थ की दृष्टि से शेष से भिन्न शब्द छाँटिए।
न अवरोध कोई, न बाधा कहीं हैं. न संदेह कोई, न व्यवधान कोई बहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलाती नहीं पथ-डगर आज अनजान कोई दिशाएँ निमंत्रण मुझे दे रही हैं दिगंतर खुला सिर्फ मेरे लिए है नहीं कुछ यहां राह जो रोक पाए न कोई यहाँ जो मुझे टोक पाए अजानी हवा में उड़ा जा रहा हूँ विजय गीत मेरा गगन मस्त गाए हृदय में कहीं कह रहा बात कोई, धरा और गगन सिर्फ तेरे लिए है। कवि को कोई कह रहा है कि
कविता को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प का चयन कीजिए। न अवरोध कोई, न बाधा कहीं है न संदेह कोई, न व्यवधान कोई बहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलाती नहीं पथ-डगर आज अनजान कोई दिशाएँ निमंत्रण मुझे दे रही हैं, दिगंतर खुला सिर्फ मेरे लिए है। नहीं कुछ यहां राह जो रोक पाए न कोई यहाँ जो मुझे टोक पाए अजानी हवा में उड़ा जा रहा हूँ विजय गीत मेरा गगन मस्त गाए हृदय में कहीं कह रहा बात कोई, धरा और गगन सिर्फ तेरे लिए है। कविता में दो समानार्थी शब्द एक ही वाक्य में आए हैं। वह वाक्य कौन-सा है?
कविता को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प का चयन कीजिए। न अवरोध कोई, न बाधा कहीं है न संदेह कोई, न व्यवधान कोई बहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलाती नहीं पथ-डगर आज अनजान कोई दिशाएँ निमंत्रण मुझे दे रही हैं, दिगंतर खुला सिर्फ मेरे लिए है। नहीं कुछ यहां राह जो रोक पाए न कोई यहाँ जो मुझे टोक पाए अजानी हवा में उड़ा जा रहा हूँ विजय गीत मेरा गगन मस्त गाए हृदय में कहीं कह रहा बात कोई, धरा और गगन सिर्फ तेरे लिए है। कवि को कोई कह रहा है कि
निर्देश: कविता को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प का चयन कीजिए। न अवरोध कोई, न बाधा कहीं है न संदेह कोई, न व्यवधान को बहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलातीं नहीं पथ-डगर आज अनजान कोई दिशाएँ निमंत्रण मुझे दे रही हैं, दिगंतर खुला सिर्फ मेरे लिए है। नहीं कुछ यहां राह जो रोक पाए न कोई यहाँ जो मुझे टोक पाए अजानी हवा में उड़ा जा रहा हूँ विजय गीत मेरा गगन मस्त गाए हृदय में कहीं कह रहा बात कोई, धरा और गगन सिर्फ तेरे लिए है। अर्थ की दृष्टि से शेष से भिन्न शब्द छाँटिए|
निर्देश: कविता को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प का चयन कीजिए। न अवरोध कोई, न बाधा कहीं है न संदेह कोई, न व्यवधान को बहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलातीं नहीं पथ-डगर आज अनजान कोई दिशाएँ निमंत्रण मुझे दे रही हैं, दिगंतर खुला सिर्फ मेरे लिए है। नहीं कुछ यहां राह जो रोक पाए न कोई यहाँ जो मुझे टोक पाए अजानी हवा में उड़ा जा रहा हूँ विजय गीत मेरा गगन मस्त गाए हृदय में कहीं कह रहा बात कोई, धरा और गगन सिर्फ तेरे लिए है। कविता में दो समानार्थी शब्द एक ही वाक्य में आए हैं। वह वाक्य कौन-सा है ?
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 34 न अवरोध कोई न बाधा कहीं है न संदेह कोई, न व्यवधान कोई बहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलाती नहीं पथ-डगर आज अनजान कोई दिशाएँ निमन्त्रण मुझे दे रही है, दिगन्तर खुला सिर्फ मेरे लिए है। नहीं कुछ यहाँ राह जो रोक पाए न कोई यहाँ जो मुझे टोक पाए अजानी हवा में उड़ा जा रहा हूँ विजय गीत मेरा गगन मस्त गाए हृदय में कहीं कह रहा बात कोई, धरा और गगन सिर्फ तेरे लिए है। 'कोई' शब्द व्याकरण की दृष्टि से है
निर्देश: कविता को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प का चयन कीजिए। न अवरोध कोई, न बाधा कहीं है न संदेह कोई, न व्यवधान को बहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलातीं नहीं पथ-डगर आज अनजान कोई दिशाएँ निमंत्रण मुझे दे रही हैं, दिगंतर खुला सिर्फ मेरे लिए है। नहीं कुछ यहां राह जो रोक पाए न कोई यहाँ जो मुझे टोक पाए अजानी हवा में उड़ा जा रहा हूँ विजय गीत मेरा गगन मस्त गाए हृदय में कहीं कह रहा बात कोई, धरा और गगन सिर्फ तेरे लिए है। कवि को कौन निमंत्रण दे रहा है ?
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 34 न अवरोध कोई न बाधा कहीं है न संदेह कोई, न व्यवधान कोई बहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलाती नहीं पथ-डगर आज अनजान कोई दिशाएँ निमन्त्रण मुझे दे रही है, दिगन्तर खुला सिर्फ मेरे लिए है। नहीं कुछ यहाँ राह जो रोक पाए न कोई यहाँ जो मुझे टोक पाए अजानी हवा में उड़ा जा रहा हूँ विजय गीत मेरा गगन मस्त गाए हृदय में कहीं कह रहा बात कोई, धरा और गगन सिर्फ तेरे लिए है। कवि का विजय गीत कौन गा रहा है?