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जैसे ही बैठक (ए)/समाप्त होने वाली थी (बी...

जैसे ही बैठक (ए)/समाप्त होने वाली थी (बी)/ उसने कई प्रश्न पूछने पर जोर दिया। ©/ कोई त्रुटि नहीं (डी) ...

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निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। कुछ कहा जा रहा हो, उससे कही महत्त्वपूर्ण होता है अपनी बात कहने का तरीका। आप कितनों को जरूरी बात क्यों न कहें, अगर आपकी बात कोई सुने नहीं, महसूस ही न करे, तो उसे कहने का फायदा ही क्या? किसी की कहे को सुनने के लिए उसे महसूस करने के लिए. पूरा ध्यान केंद्रित करने की जरूरत होती है और वही मिलता था मुझे उस महान संगीतज्ञ बीथोवन के स्वरों द्वारा- 'पूरा ध्यान। आप पूछ सकते हैं कि "आवाजाही और बातचीत के शोर से भरे किसी कमरे के दूसरे छोर पर बैठा कोई बच्चा उन आठ कोमल स्वरों को भला कैसे सुनता होगा?" इस सवाल का जवाब तो कोई भी शिक्षक दे सकता है। ये स्वर सुन तो वे बच्चे ही पाते थे जो पियानो के बिलकुल पास खड़े हों, और तब उनका स्पर्श दूसरों को आगाह करता था। पर कुछ ही क्षणों में तेजी से फैलती वह ख़ामोशी ही बोलने लगती थी और जब तक आखिरी स्वर की गूंज खत्म होती, सभी बच्चे शांत हो चुके होते थे। वे खामोशियाँ, वे सन्नाटे याद रहेंगे मुझे ...... सात क्या उसके भी कई-कई सालों बाद भी। 'इस सवाल का जवाब तो कोई भी शिक्षक दे सकता है।' वाक्य में आए 'भी', 'तो' शब्द हैं

सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने अपनी एक रचना में कहा है: जैसे हो आघात रे वैसा बजे सितार तेरी ही आवाज़ की प्रतिध्वनि है संसार हम वाद्ययंत्रों पर जैसा आघात करते हैं वैसी ही ध्वनि उनसे निकलती है। यदि कठोरता से आघात करते हैं तो कठोर ध्वनि उत्पन्न होती है, लेकिन यदि कोमलता से आघात करते हैं तो कर्णप्रिय कोमल ध्वनि उत्पन्न होती है। यदि हम किसी वाद्ययंत्र को नियमपूर्वक ठीक से बजाते हैं तो सही राग उत्पन्न होता है, अन्यथा सही राग उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता है | सही राग उत्पन्न न होने के स्थिति में गुणीजन हमारे गायन अथवा वादन की ओर आकर्षित ही नहीं होंगे। हमारे जीवन रूपी सितार की भी यही स्थिति होती है। यदि हम अनुशासन में रहते हुए प्रत्येक कार्य नियमानुसार करते हैं तो जीवन रूपी सितार से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राग रूपी कार्य हमें सार्थकता और आनंद ही प्रदान करेगा। इस संसार में हम जो कुछ सोचते, कहते अथवा करते हैं वही हमारे पास लौटकर आता है। न कम, न अधिका जब हम किसी खंडहर अथवा यादी में कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही अच्छा शब्द या वाक्य गूंजता हुआ हमें सुनाई पड़ता है और यदि हम कोई बुरा, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही बुर, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य हमें सुनाई पड़ता है। यदि हम सुरीली आवाज निकालते हैं तो वैसी ही सुरीली आवाज लौटकर हमारे पास आती है, लेकिन यदि हम डरावनी आवाज निकालते हैं तो वैसी ही डरावनी आवाज लौटकर आती है। हम जैसा एक बार बोलते हैं वैसा ही कई बार सुनने को अभिशप्त होते हैं। पर यह बात अनुभव करते हुए भी इसका आशय हम समझते नहीं। चूंकि आवाज के लौटकर आने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए हम उसे स्वतंत्र घटना मान लेते हैं। यह अहसास नहीं कर पाते कि हमारे ही किए हुए काज, हमारे ही सोचे हुए भाव अलग दिशा में हमारे पास आते दिख रहे हैं। 'कर्णप्रिय ध्वनि का आशय है?

सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने अपनी एक रचना में कहा है: जैसे हो आघात रे वैसा बजे सितार तेरी ही आवाज़ की प्रतिध्वनि है संसार हम वाद्ययंत्रों पर जैसा आघात करते हैं वैसी ही ध्वनि उनसे निकलती है। यदि कठोरता से आघात करते हैं तो कठोर ध्वनि उत्पन्न होती है, लेकिन यदि कोमलता से आघात करते हैं तो कर्णप्रिय कोमल ध्वनि उत्पन्न होती है। यदि हम किसी वाद्ययंत्र को नियमपूर्वक ठीक से बजाते हैं तो सही राग उत्पन्न होता है, अन्यथा सही राग उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता है | सही राग उत्पन्न न होने के स्थिति में गुणीजन हमारे गायन अथवा वादन की ओर आकर्षित ही नहीं होंगे। हमारे जीवन रूपी सितार की भी यही स्थिति होती है। यदि हम अनुशासन में रहते हुए प्रत्येक कार्य नियमानुसार करते हैं तो जीवन रूपी सितार से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राग रूपी कार्य हमें सार्थकता और आनंद ही प्रदान करेगा। इस संसार में हम जो कुछ सोचते, कहते अथवा करते हैं वही हमारे पास लौटकर आता है। न कम, न अधिका जब हम किसी खंडहर अथवा यादी में कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही अच्छा शब्द या वाक्य गूंजता हुआ हमें सुनाई पड़ता है और यदि हम कोई बुरा, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही बुर, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य हमें सुनाई पड़ता है। यदि हम सुरीली आवाज निकालते हैं तो वैसी ही सुरीली आवाज लौटकर हमारे पास आती है, लेकिन यदि हम डरावनी आवाज निकालते हैं तो वैसी ही डरावनी आवाज लौटकर आती है। हम जैसा एक बार बोलते हैं वैसा ही कई बार सुनने को अभिशप्त होते हैं। पर यह बात अनुभव करते हुए भी इसका आशय हम समझते नहीं। चूंकि आवाज के लौटकर आने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए हम उसे स्वतंत्र घटना मान लेते हैं। यह अहसास नहीं कर पाते कि हमारे ही किए हुए काज, हमारे ही सोचे हुए भाव अलग दिशा में हमारे पास आते दिख रहे हैं। जीवन के साथ सितार की तुलना किसलिए की गई है?

सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने अपनी एक रचना में कहा है: जैसे हो आघात रे वैसा बजे सितार तेरी ही आवाज़ की प्रतिध्वनि है संसार हम वाद्ययंत्रों पर जैसा आघात करते हैं वैसी ही ध्वनि उनसे निकलती है। यदि कठोरता से आघात करते हैं तो कठोर ध्वनि उत्पन्न होती है, लेकिन यदि कोमलता से आघात करते हैं तो कर्णप्रिय कोमल ध्वनि उत्पन्न होती है। यदि हम किसी वाद्ययंत्र को नियमपूर्वक ठीक से बजाते हैं तो सही राग उत्पन्न होता है, अन्यथा सही राग उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता है | सही राग उत्पन्न न होने के स्थिति में गुणीजन हमारे गायन अथवा वादन की ओर आकर्षित ही नहीं होंगे। हमारे जीवन रूपी सितार की भी यही स्थिति होती है। यदि हम अनुशासन में रहते हुए प्रत्येक कार्य नियमानुसार करते हैं तो जीवन रूपी सितार से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राग रूपी कार्य हमें सार्थकता और आनंद ही प्रदान करेगा। इस संसार में हम जो कुछ सोचते, कहते अथवा करते हैं वही हमारे पास लौटकर आता है। न कम, न अधिका जब हम किसी खंडहर अथवा यादी में कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही अच्छा शब्द या वाक्य गूंजता हुआ हमें सुनाई पड़ता है और यदि हम कोई बुरा, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही बुर, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य हमें सुनाई पड़ता है। यदि हम सुरीली आवाज निकालते हैं तो वैसी ही सुरीली आवाज लौटकर हमारे पास आती है, लेकिन यदि हम डरावनी आवाज निकालते हैं तो वैसी ही डरावनी आवाज लौटकर आती है। हम जैसा एक बार बोलते हैं वैसा ही कई बार सुनने को अभिशप्त होते हैं। पर यह बात अनुभव करते हुए भी इसका आशय हम समझते नहीं। चूंकि आवाज के लौटकर आने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए हम उसे स्वतंत्र घटना मान लेते हैं। यह अहसास नहीं कर पाते कि हमारे ही किए हुए काज, हमारे ही सोचे हुए भाव अलग दिशा में हमारे पास आते दिख रहे हैं। प्रत्यय की दृष्टि से उस शब्द को पहचानिए जो शेष शब्दों से भिन्न हो।

सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने अपनी एक रचना में कहा है: जैसे हो आघात रे वैसा बजे सितार तेरी ही आवाज़ की प्रतिध्वनि है संसार हम वाद्ययंत्रों पर जैसा आघात करते हैं वैसी ही ध्वनि उनसे निकलती है। यदि कठोरता से आघात करते हैं तो कठोर ध्वनि उत्पन्न होती है, लेकिन यदि कोमलता से आघात करते हैं तो कर्णप्रिय कोमल ध्वनि उत्पन्न होती है। यदि हम किसी वाद्ययंत्र को नियमपूर्वक ठीक से बजाते हैं तो सही राग उत्पन्न होता है, अन्यथा सही राग उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता है | सही राग उत्पन्न न होने के स्थिति में गुणीजन हमारे गायन अथवा वादन की ओर आकर्षित ही नहीं होंगे। हमारे जीवन रूपी सितार की भी यही स्थिति होती है। यदि हम अनुशासन में रहते हुए प्रत्येक कार्य नियमानुसार करते हैं तो जीवन रूपी सितार से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राग रूपी कार्य हमें सार्थकता और आनंद ही प्रदान करेगा। इस संसार में हम जो कुछ सोचते, कहते अथवा करते हैं वही हमारे पास लौटकर आता है। न कम, न अधिका जब हम किसी खंडहर अथवा यादी में कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही अच्छा शब्द या वाक्य गूंजता हुआ हमें सुनाई पड़ता है और यदि हम कोई बुरा, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही बुर, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य हमें सुनाई पड़ता है। यदि हम सुरीली आवाज निकालते हैं तो वैसी ही सुरीली आवाज लौटकर हमारे पास आती है, लेकिन यदि हम डरावनी आवाज निकालते हैं तो वैसी ही डरावनी आवाज लौटकर आती है। हम जैसा एक बार बोलते हैं वैसा ही कई बार सुनने को अभिशप्त होते हैं। पर यह बात अनुभव करते हुए भी इसका आशय हम समझते नहीं। चूंकि आवाज के लौटकर आने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए हम उसे स्वतंत्र घटना मान लेते हैं। यह अहसास नहीं कर पाते कि हमारे ही किए हुए काज, हमारे ही सोचे हुए भाव अलग दिशा में हमारे पास आते दिख रहे हैं। 'यदि कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो...' की कर्मवाच्य में रचना होगी

सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने अपनी एक रचना में कहा है: जैसे हो आघात रे वैसा बजे सितार तेरी ही आवाज़ की प्रतिध्वनि है संसार हम वाद्ययंत्रों पर जैसा आघात करते हैं वैसी ही ध्वनि उनसे निकलती है। यदि कठोरता से आघात करते हैं तो कठोर ध्वनि उत्पन्न होती है, लेकिन यदि कोमलता से आघात करते हैं तो कर्णप्रिय कोमल ध्वनि उत्पन्न होती है। यदि हम किसी वाद्ययंत्र को नियमपूर्वक ठीक से बजाते हैं तो सही राग उत्पन्न होता है, अन्यथा सही राग उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता है | सही राग उत्पन्न न होने के स्थिति में गुणीजन हमारे गायन अथवा वादन की ओर आकर्षित ही नहीं होंगे। हमारे जीवन रूपी सितार की भी यही स्थिति होती है। यदि हम अनुशासन में रहते हुए प्रत्येक कार्य नियमानुसार करते हैं तो जीवन रूपी सितार से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राग रूपी कार्य हमें सार्थकता और आनंद ही प्रदान करेगा। इस संसार में हम जो कुछ सोचते, कहते अथवा करते हैं वही हमारे पास लौटकर आता है। न कम, न अधिका जब हम किसी खंडहर अथवा यादी में कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही अच्छा शब्द या वाक्य गूंजता हुआ हमें सुनाई पड़ता है और यदि हम कोई बुरा, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही बुर, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य हमें सुनाई पड़ता है। यदि हम सुरीली आवाज निकालते हैं तो वैसी ही सुरीली आवाज लौटकर हमारे पास आती है, लेकिन यदि हम डरावनी आवाज निकालते हैं तो वैसी ही डरावनी आवाज लौटकर आती है। हम जैसा एक बार बोलते हैं वैसा ही कई बार सुनने को अभिशप्त होते हैं। पर यह बात अनुभव करते हुए भी इसका आशय हम समझते नहीं। चूंकि आवाज के लौटकर आने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए हम उसे स्वतंत्र घटना मान लेते हैं। यह अहसास नहीं कर पाते कि हमारे ही किए हुए काज, हमारे ही सोचे हुए भाव अलग दिशा में हमारे पास आते दिख रहे हैं। 'घृणास्पद' का संधि-विच्छेद होगा

सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने अपनी एक रचना में कहा है: जैसे हो आघात रे वैसा बजे सितार तेरी ही आवाज़ की प्रतिध्वनि है संसार हम वाद्ययंत्रों पर जैसा आघात करते हैं वैसी ही ध्वनि उनसे निकलती है। यदि कठोरता से आघात करते हैं तो कठोर ध्वनि उत्पन्न होती है, लेकिन यदि कोमलता से आघात करते हैं तो कर्णप्रिय कोमल ध्वनि उत्पन्न होती है। यदि हम किसी वाद्ययंत्र को नियमपूर्वक ठीक से बजाते हैं तो सही राग उत्पन्न होता है, अन्यथा सही राग उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता है | सही राग उत्पन्न न होने के स्थिति में गुणीजन हमारे गायन अथवा वादन की ओर आकर्षित ही नहीं होंगे। हमारे जीवन रूपी सितार की भी यही स्थिति होती है। यदि हम अनुशासन में रहते हुए प्रत्येक कार्य नियमानुसार करते हैं तो जीवन रूपी सितार से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राग रूपी कार्य हमें सार्थकता और आनंद ही प्रदान करेगा। इस संसार में हम जो कुछ सोचते, कहते अथवा करते हैं वही हमारे पास लौटकर आता है। न कम, न अधिका जब हम किसी खंडहर अथवा यादी में कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही अच्छा शब्द या वाक्य गूंजता हुआ हमें सुनाई पड़ता है और यदि हम कोई बुरा, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही बुर, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य हमें सुनाई पड़ता है। यदि हम सुरीली आवाज निकालते हैं तो वैसी ही सुरीली आवाज लौटकर हमारे पास आती है, लेकिन यदि हम डरावनी आवाज निकालते हैं तो वैसी ही डरावनी आवाज लौटकर आती है। हम जैसा एक बार बोलते हैं वैसा ही कई बार सुनने को अभिशप्त होते हैं। पर यह बात अनुभव करते हुए भी इसका आशय हम समझते नहीं। चूंकि आवाज के लौटकर आने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए हम उसे स्वतंत्र घटना मान लेते हैं। यह अहसास नहीं कर पाते कि हमारे ही किए हुए काज, हमारे ही सोचे हुए भाव अलग दिशा में हमारे पास आते दिख रहे हैं। एक ही वाद्ययंत्र से कोमल और कठोर ध्वनि निकलना किस पर निर्भर होता है?

सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने अपनी एक रचना में कहा है: जैसे हो आघात रे वैसा बजे सितार तेरी ही आवाज़ की प्रतिध्वनि है संसार हम वाद्ययंत्रों पर जैसा आघात करते हैं वैसी ही ध्वनि उनसे निकलती है। यदि कठोरता से आघात करते हैं तो कठोर ध्वनि उत्पन्न होती है, लेकिन यदि कोमलता से आघात करते हैं तो कर्णप्रिय कोमल ध्वनि उत्पन्न होती है। यदि हम किसी वाद्ययंत्र को नियमपूर्वक ठीक से बजाते हैं तो सही राग उत्पन्न होता है, अन्यथा सही राग उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता है | सही राग उत्पन्न न होने के स्थिति में गुणीजन हमारे गायन अथवा वादन की ओर आकर्षित ही नहीं होंगे। हमारे जीवन रूपी सितार की भी यही स्थिति होती है। यदि हम अनुशासन में रहते हुए प्रत्येक कार्य नियमानुसार करते हैं तो जीवन रूपी सितार से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राग रूपी कार्य हमें सार्थकता और आनंद ही प्रदान करेगा। इस संसार में हम जो कुछ सोचते, कहते अथवा करते हैं वही हमारे पास लौटकर आता है। न कम, न अधिका जब हम किसी खंडहर अथवा यादी में कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही अच्छा शब्द या वाक्य गूंजता हुआ हमें सुनाई पड़ता है और यदि हम कोई बुरा, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही बुर, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य हमें सुनाई पड़ता है। यदि हम सुरीली आवाज निकालते हैं तो वैसी ही सुरीली आवाज लौटकर हमारे पास आती है, लेकिन यदि हम डरावनी आवाज निकालते हैं तो वैसी ही डरावनी आवाज लौटकर आती है। हम जैसा एक बार बोलते हैं वैसा ही कई बार सुनने को अभिशप्त होते हैं। पर यह बात अनुभव करते हुए भी इसका आशय हम समझते नहीं। चूंकि आवाज के लौटकर आने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए हम उसे स्वतंत्र घटना मान लेते हैं। यह अहसास नहीं कर पाते कि हमारे ही किए हुए काज, हमारे ही सोचे हुए भाव अलग दिशा में हमारे पास आते दिख रहे हैं। 'हम' जैसा करते हैं वैसा पाते हैं -यह समझाने के लिए लेखक ने किसका उदाहरण दिया है?