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किशोरावस्था व्यक्ति में नाटकीय शारीरिक औ...

किशोरावस्था व्यक्ति में नाटकीय शारीरिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों की अवधि है। एक किशोर...

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बच्चे की किशोरावस्था शिक्षा-शास्त्रियों और कला-शिक्षकों के लिए अपने आप में एक अलग ही विषय है। यह उन एक समस्या की उम्र कही गई है। कुछ विशेषज्ञ तो इसे 'संकट का समय' मानते हैं। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि बच्चे के लिए यह अवस्था एक नया अनुभव होता है। दुनिया बदल जाती है। हो सकता है कि इस मानसिक परिवर्तन का कारण उसका अपना शारीरिक विकास भी हो। आज तक शरीर, जो एक तरीके से बढ़ रहा था, उसमें तब्दीली होने लगती है। उसके लिए यह एक ऐसा अनुभव होता है जो उसका मन अधिक-से-अधिक घेरे रहता है। समाज की परंपरा की वजह से वह इस समस्या को संकोच की वजह से प्रकाशित नहीं करता। उसे इसका खुलासा नहीं मिलता। मन की अवस्था बदल जाती है। मन दूसरी बातों से हटकर इधर-उधर भटकने लगता है। एकाग्रता नहीं रहती। शारीरिक विकास तो एक ढंग से हो जाता है। उसकी शारीरिक प्रवतियां भी सयानों की-सी होने लगती हैं। लेकिन मानस इतना विकसित अभी तक नहीं हो पाता, जिससे वह अपने आप को ठीक-ठीक समझ सके। किशोर की सबसे बड़ी चिंता का विषय है

बच्चे की किशोरावस्था शिक्षा-शास्त्रियों और कला-शिक्षकों के लिए अपने आप में एक अलग ही विषय है। यह उन एक समस्या की उम्र कही गई है। कुछ विशेषज्ञ तो इसे 'संकट का समय' मानते हैं। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि बच्चे के लिए यह अवस्था एक नया अनुभव होता है। दुनिया बदल जाती है। हो सकता है कि इस मानसिक परिवर्तन का कारण उसका अपना शारीरिक विकास भी हो। आज तक शरीर, जो एक तरीके से बढ़ रहा था, उसमें तब्दीली होने लगती है। उसके लिए यह एक ऐसा अनुभव होता है जो उसका मन अधिक-से-अधिक घेरे रहता है। समाज की परंपरा की वजह से वह इस समस्या को संकोच की वजह से प्रकाशित नहीं करता। उसे इसका खुलासा नहीं मिलता। मन की अवस्था बदल जाती है। मन दूसरी बातों से हटकर इधर-उधर भटकने लगता है। एकाग्रता नहीं रहती। शारीरिक विकास तो एक ढंग से हो जाता है। उसकी शारीरिक प्रवतियां भी सयानों की-सी होने लगती हैं। लेकिन मानस इतना विकसित अभी तक नहीं हो पाता, जिससे वह अपने आप को ठीक-ठीक समझ सके। किशोरावस्था को संकट का समय' माना जाता है क्योंकि

बच्चे की किशोरावस्था शिक्षा-शास्त्रियों और कला-शिक्षकों के लिए अपने आप में एक अलग ही विषय है। यह उन एक समस्या की उम्र कही गई है। कुछ विशेषज्ञ तो इसे 'संकट का समय' मानते हैं। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि बच्चे के लिए यह अवस्था एक नया अनुभव होता है। दुनिया बदल जाती है। हो सकता है कि इस मानसिक परिवर्तन का कारण उसका अपना शारीरिक विकास भी हो। आज तक शरीर, जो एक तरीके से बढ़ रहा था, उसमें तब्दीली होने लगती है। उसके लिए यह एक ऐसा अनुभव होता है जो उसका मन अधिक-से-अधिक घेरे रहता है। समाज की परंपरा की वजह से वह इस समस्या को संकोच की वजह से प्रकाशित नहीं करता। उसे इसका खुलासा नहीं मिलता। मन की अवस्था बदल जाती है। मन दूसरी बातों से हटकर इधर-उधर भटकने लगता है। एकाग्रता नहीं रहती। शारीरिक विकास तो एक ढंग से हो जाता है। उसकी शारीरिक प्रवतियां भी सयानों की-सी होने लगती हैं। लेकिन मानस इतना विकसित अभी तक नहीं हो पाता, जिससे वह अपने आप को ठीक-ठीक समझ सके। 'मन की अवस्था भी बदल जाती है' वाक्य में 'भी' शब्द है

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मानव जीवन में आत्मसम्मान का अत्यधिक महत्व है। आत्मसम्मान में अपने व्यक्तित्व को अधिकाधिक सशक्त एवं प्रतिष्ठित बनाने की भावना निहित होती है। इससे शक्ति, साहस, उत्साह आदि गुणों का जन्म होता है जो जीवन की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आत्मसमान की भावना से पूर्ण व्यक्ति संघर्षों की परवाह नहीं करता है और हर विषम परिस्थिति से टक्कर लेता है। ऐसे व्यक्ति जीवन में पराजय का मुंह नहीं देखते तथा निरन्तर यश की प्राप्ति करते हैं। आत्मसम्मानी व्यक्ति धर्म, सत्य, न्याय और नीति के पथ का अनुगमन करता है उसके जीवन में ही सच्चे सुख और शांति का निवास होता है। परोपकार, जनसेवा जैसे कार्यों में उसकी रूचि होती है। लोकप्रियता और सामाजिक प्रतिष्ठा उसे सहज ही प्राप्त होती है। ऐसे व्यक्ति में अपने राष्ट्र के प्रति सच्ची निष्ठा होती है तथा मातृभूमि की उन्नति के लिए वह अपने प्राणों को उत्सर्ग करने में सुख की अनुभूति करता है। चूंकि आत्मसम्मानी व्यक्ति अपने अथवा दूसरों की आत्मा का हनन नहीं करता है, इसीलिए वह ईर्ष्या-द्वेष जैसी भावनाओं से मुक्त होकर मानव मात्र को अपने परिवार का अंग मानता है। उसके हृदय में स्वार्थ, लोभ और अहंकार का भाव नहीं होता। निश्छल हृदय होने के कारण वह आसुरी प्रवृत्तियों से सर्वथा मुक्त होता है। आत्मसम्मानी व्यक्ति की रूचि होती है