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प्रबंधन से क्या आशय है? | 12 | प्रबंध क...

प्रबंधन से क्या आशय है? | 12 | प्रबंध की प्रकृति एवं महत्त्व | BUSINESS STUDIES | NCERT HINDI ...

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बंध क्या होता है ?|बंध की प्रक्रति क्या होती है ?|बंध कितने प्रकार के होते है ?|बंध निर्माण के कौन कौन से सिद्धांत है ?|सारांश

परिचय|कार्बन यौगिक में आबंधन|सहसयोंजक बंध एवं इसके प्रकार|ध्रुवीय एवं अध्रुवीय सहसयोंजक बंध एवं यौगिक|कार्बनिक यौगिक क्या है?|अपररूपता एवं कार्बन के अपररूप|कार्बन की सर्वतोमुखी प्रकृति एवं इसके कारण|सजातीय श्रेणी|क्रियात्मक समूह|Summary

बंध क्या होता है?|बंध की प्रकृति क्या होती है ?|बंध कितने प्रकार के होते है ?|बंध का निर्माण कैसे होता है ?|बंध निर्माण के कौन - कौन से सिद्धांत है ?|कक्षको की आकृति|अतिव्यापन क्या होता है ?|अतिव्यापन के प्रकार|अतिव्यापन के आधार पर बंधो के प्रकार|संकरण|सारांश

पर्यावरण प्रदूषण आज विश्वव्यापी समस्या है। वर्तमान एवं आने वाले दशकों में पृथ्वी की सम्पदा पर अधिक दबाव होगा। इस समस्या का मूल कारण है जनसंख्या की तीव्र गति से वृद्धि, प्रदूषण एवं उपलब्ध साधनों का अधिकतम प्रयोग। सहस्राब्दियों तक मनुष्य ने प्राकृतिक साधनों के साथ अपनी संगति को कायम रखा है। मानवीय सभ्यता और प्राकृतिक वैभव की युगल-बन्दी चलती रही। मनुष्य तो प्रकृति का आराधक था। प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य का उसने सुख लिया, उसके छलछलाते स्नेह से अपने को आप्लावित किया और उसके सुर से सुर मिलाकर जीवन के संगीत की रचना की, परन्तु आश्चर्य है कि आज मनुष्य अपनी लालसा, गुणात्मक जीवन और भौतिक सुख-सुविधा के लिए प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन व्यवस्थित रूप से नहीं करते हुए संरक्षण करने के बदले प्रकृति का निजी स्वार्थ हेतु विध्वन्स करने में लग गया है। आज विनाश की जो पटकथा लिखी जा रही है, उसके पीछे लालच, लूट-खसोट और लिप्सा की दृष्टि उत्तरदायी है। आज गुमराह इन्सान प्रकृति के पाँचों तत्त्वों से छेड़खानी कर रहा है। प्रकृति न तो पाषाणी है और न मूकदर्शिनी। उसे बदला लेना आता है। प्रकृति की त्यौरियाँ और तेवर बता रहे हैं कि वह बदला लेने पर आमादा है। दोनों तरफ मोर्चे खुल चुके हैं जाने कब क्या हो जाए। वन-विनाश, अन्धाधुन्ध प्रदूषण, संसाधनों का अनर्गल शोषण, नाभिकीय अस्त्रों की मूर्खतापूर्ण अन्धी दौड़ और औद्योगिक या प्रौद्योगिक उन्नति के नाम पर प्रकृति से अधिक छेड़छाड़ एवं हवा, पानी और मिट्टी जैसे प्राकृतिक साधनों के दुरुपयोग ने मनुष्य जाति को ही नहीं, सम्पूर्ण जीव-जड़ को विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है। प्रस्तुत गद्यांश में प्रकृति के कितने तत्त्वों से छेड़खानी की बात की गई है?