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शराब (मदिरा पेय) में होता है | 12 | एल्क...

शराब (मदिरा पेय) में होता है | 12 | एल्कोहल , फिनॉल एवं ईथर | CHEMISTRY | ERRORLESS HINDI | Dou...

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A drink of chocolate and milk contains 8% pure chocolate by volume. If 10 liters of pure milk are added to 50 liters of this drink, the percentage of chocolate in the new drink is: चॉकलेट और दूध का एक पेय में 8% शुद्ध चॉकलेट होता है। यदि इस पेय के 50 लीटर में 10 लीटर शुद्ध दूध मिलाया जाता है, तो नए पेय में चॉकलेट का प्रतिशत होता है:

Two articles are sold for Rs. 10,384 each. On one, the seller gains 18% and on the other, he loses 12%. What is his overall gain or less ? दो वस्तुओं में से प्रत्येक को 10384 रुपये में बेचा जाता है | पहली पर, विक्रेता को 18% का लाभ होता है तथा दूसरी पर उसे 12% की हानि होती है | कुल लाभ या हानि ज्ञात करें |

The total cost price of two articles is Rs. 2000. One of them is sold at a profit of 12% and the other at a loss of 12%. The overall gain in the transaction is 1.2%. The cost price of the article for which there was a profit was : दो वस्तुओं का कुल क्रय मूल्य 2000 रुपये है | उनमें से एक को 12% लाभ पर तथा दूसरी को 12% हानि पर बेचा जाता है | लेन-देन में कुल लाभ 1.2% का होता है | जिस वस्तु पर लाभ हुआ, उसका क्रय मूल्य था :

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। क्रान्तिकारी शब्द है

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। गोदान' का नायक कौन है?

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। गोदान में निम्नलिखित में से किसका वर्णन नहीं है?

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। होरी को कौन-सी इच्छा अधूरी रह जाती है?

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। प्रेमचन्द के अनुसार

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। गोदान में