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जब प्रकाश की किरण कांच से वायु में जाती है, तो वह ………………से दूर हट जाती है | 10 | प्रकाश का अपवर्...

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माइकलएंजेलो इटली के बहुत प्रसिद्ध शिल्पकार थे। वे बड़ी सुंदर मूर्तियाँ बनाते थे। लोगों ने पूछा कि आप इतनी सुदंर मूर्ति केसे गढ़ लेते हैं। उन्होंने कहा कि मैं मूर्ति कहाँ गढ़ता हूँ। वह मूर्ति तो पहले से ही पत्थर में थी, मैंने तो सिर्फ पत्थर का फालतू हिस्सा हटा दिया तो मूर्ति प्रकट हो गयी! तो विद्यार्थी को अपना परिचय पाने में, स्व-भान होने में मदद करना ही शिक्षक का काम है। अब यह स्व-भान कैसे हो? कहते हैं, सेल्फ इज लाइक अरे-जो साइंस में माना जाता है कि प्रकाश की किरण अदृश्य होती है, वह आपको दिखाई देती है, वैसे हमारा जो 'स्व' है वह शून्य में, अभाव में समझ में नहीं आता। वह तब प्रकट होता है, जब मैं स्व-धर्म कर्तव्य-कर्म करता हूँ। कर्म करते-करते मुश्किल का जब मैं सामना करता हूँ तब मेरा रूप. मेरी शक्ति, मेरे स्व का मुझे पता चलता है। स्व-धर्म रूप कर्म करते हुए जो स्व मेरे सामने व्यक्त होता है, वही मेरी शिक्षा है। इसलिए शिक्षा दी नहीं जा सकती, बल्कि अंदर से अंकुरित होती है और उस प्रक्रिया में शिक्षक केवल बाहर से मदद करता है। जैसे पौधे के अंकुरित होने में, इसके प्रफुल्लित होने में सीधा हम कुछ नहीं कर सकते। परंतु बाहर से खाद-पानी देना, निराई करना, प्रकाश की व्यवस्था आदि कर सकते हैं। अनुच्छेद में खाद-पानी देने, निराई करने का उदाहरण बताता है कि शिक्षक का कार्य बच्चों को

माइकलएंजेलो इटली के बहुत प्रसिद्ध शिल्पकार थे। वे बड़ी सुंदर मूर्तियाँ बनाते थे। लोगों ने पूछा कि आप इतनी सुदंर मूर्ति केसे गढ़ लेते हैं। उन्होंने कहा कि मैं मूर्ति कहाँ गढ़ता हूँ। वह मूर्ति तो पहले से ही पत्थर में थी, मैंने तो सिर्फ पत्थर का फालतू हिस्सा हटा दिया तो मूर्ति प्रकट हो गयी! तो विद्यार्थी को अपना परिचय पाने में, स्व-भान होने में मदद करना ही शिक्षक का काम है। अब यह स्व-भान कैसे हो? कहते हैं, सेल्फ इज लाइक अरे-जो साइंस में माना जाता है कि प्रकाश की किरण अदृश्य होती है, वह आपको दिखाई देती है, वैसे हमारा जो 'स्व' है वह शून्य में, अभाव में समझ में नहीं आता। वह तब प्रकट होता है, जब मैं स्व-धर्म कर्तव्य-कर्म करता हूँ। कर्म करते-करते मुश्किल का जब मैं सामना करता हूँ तब मेरा रूप. मेरी शक्ति, मेरे स्व का मुझे पता चलता है। स्व-धर्म रूप कर्म करते हुए जो स्व मेरे सामने व्यक्त होता है, वही मेरी शिक्षा है। इसलिए शिक्षा दी नहीं जा सकती, बल्कि अंदर से अंकुरित होती है और उस प्रक्रिया में शिक्षक केवल बाहर से मदद करता है। जैसे पौधे के अंकुरित होने में, इसके प्रफुल्लित होने में सीधा हम कुछ नहीं कर सकते। परंतु बाहर से खाद-पानी देना, निराई करना, प्रकाश की व्यवस्था आदि कर सकते हैं। 'स्व' का प्रकाट्य में होता है।

माइकलएंजेलो इटली के बहुत प्रसिद्ध शिल्पकार थे। वे बड़ी सुंदर मूर्तियाँ बनाते थे। लोगों ने पूछा कि आप इतनी सुदंर मूर्ति केसे गढ़ लेते हैं। उन्होंने कहा कि मैं मूर्ति कहाँ गढ़ता हूँ। वह मूर्ति तो पहले से ही पत्थर में थी, मैंने तो सिर्फ पत्थर का फालतू हिस्सा हटा दिया तो मूर्ति प्रकट हो गयी! तो विद्यार्थी को अपना परिचय पाने में, स्व-भान होने में मदद करना ही शिक्षक का काम है। अब यह स्व-भान कैसे हो? कहते हैं, सेल्फ इज लाइक अरे-जो साइंस में माना जाता है कि प्रकाश की किरण अदृश्य होती है, वह आपको दिखाई देती है, वैसे हमारा जो 'स्व' है वह शून्य में, अभाव में समझ में नहीं आता। वह तब प्रकट होता है, जब मैं स्व-धर्म कर्तव्य-कर्म करता हूँ। कर्म करते-करते मुश्किल का जब मैं सामना करता हूँ तब मेरा रूप. मेरी शक्ति, मेरे स्व का मुझे पता चलता है। स्व-धर्म रूप कर्म करते हुए जो स्व मेरे सामने व्यक्त होता है, वही मेरी शिक्षा है। इसलिए शिक्षा दी नहीं जा सकती, बल्कि अंदर से अंकुरित होती है और उस प्रक्रिया में शिक्षक केवल बाहर से मदद करता है। जैसे पौधे के अंकुरित होने में, इसके प्रफुल्लित होने में सीधा हम कुछ नहीं कर सकते। परंतु बाहर से खाद-पानी देना, निराई करना, प्रकाश की व्यवस्था आदि कर सकते हैं। शिक्षक का काम है

माइकलएंजेलो इटली के बहुत प्रसिद्ध शिल्पकार थे। वे बड़ी सुंदर मूर्तियाँ बनाते थे। लोगों ने पूछा कि आप इतनी सुदंर मूर्ति केसे गढ़ लेते हैं। उन्होंने कहा कि मैं मूर्ति कहाँ गढ़ता हूँ। वह मूर्ति तो पहले से ही पत्थर में थी, मैंने तो सिर्फ पत्थर का फालतू हिस्सा हटा दिया तो मूर्ति प्रकट हो गयी! तो विद्यार्थी को अपना परिचय पाने में, स्व-भान होने में मदद करना ही शिक्षक का काम है। अब यह स्व-भान कैसे हो? कहते हैं, सेल्फ इज लाइक अरे-जो साइंस में माना जाता है कि प्रकाश की किरण अदृश्य होती है, वह आपको दिखाई देती है, वैसे हमारा जो 'स्व' है वह शून्य में, अभाव में समझ में नहीं आता। वह तब प्रकट होता है, जब मैं स्व-धर्म कर्तव्य-कर्म करता हूँ। कर्म करते-करते मुश्किल का जब मैं सामना करता हूँ तब मेरा रूप. मेरी शक्ति, मेरे स्व का मुझे पता चलता है। स्व-धर्म रूप कर्म करते हुए जो स्व मेरे सामने व्यक्त होता है, वही मेरी शिक्षा है। इसलिए शिक्षा दी नहीं जा सकती, बल्कि अंदर से अंकुरित होती है और उस प्रक्रिया में शिक्षक केवल बाहर से मदद करता है। जैसे पौधे के अंकुरित होने में, इसके प्रफुल्लित होने में सीधा हम कुछ नहीं कर सकते। परंतु बाहर से खाद-पानी देना, निराई करना, प्रकाश की व्यवस्था आदि कर सकते हैं। 'वे बड़ी सुंदर मूर्तियाँ बनाते थे। वाक्य में प्रविशेषण है