सिद्ध कीजिए कि चक्रीय चतुर्भुज की सम्मुख भुजाओं (जबकि वे समांतर न हों) को बढ़ाने पर प्राप्त हुए ...
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ABCD is a cyclic quadrilateral such that its sides AD and BC produced meet at P and sides AB and DC produced meet at Q. If angle A=62^@ and angle ABC= 74^@ , then the difference between angle P and angle Q is: ABCD एक चक्रीय चतुर्भुज है जो इस प्रकार है कि इसकी भुजाओं AD और BC को बढ़ाने पर वे P पर मिलती हैं तथा AB और DC को बढ़ाने पर वे Q पर मिलती हैं | यदि angle =62^@ और angle ABC= 74^@ है, तो angle P और angle Q के बीच अंतर ज्ञात करें |
ABCD is a cyclic quadrilateral in which sides AD and BC are produced to meet at P, and sides DC and AB meet at Q when produced. If angle A=60^@ and angle ABC=72^@ then angle DPC - angle BQC = ABCD एक चक्रीय चतुर्भुज है जिसमें भुजाओं AD तथा BC को बढ़ाया जाता है जो P पर मिलती हैं तथा भुजाओं DC और AB को बढ़ाया जाता है जो Q पर मिलती हैं | यदि angle A=60^@ तथा angle ABC=72^@ है, तो angle DPC - angle BQC = ?
Sides AB and DC of a cyclic quadrilateral ABCD are produced to meet at E, and sides AD and BC are produced to meet at F. If angle ADC= 75^@ and angle BEC= 52^@ , then the difference between angle BAD and angle AFB ? / एक चक्रीय चतुर्भुज ABCD की भुजाओं AB और DC को बढ़ाया जाता है जो E पर मिलती हैं तथा भुजाओं AD और BC को बढ़ाया जाता है जो F पर मिलती हैं | यदि angle ADC= 75^@ तथा angle BEC= 52^@ हैं, तो angle BAD तथा angle AFB के बीच क्या अंतर है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। 'महानायक' में कौन-सा समास है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। महात्मा गाँधी ने किसे अगोचर माना है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। ये सभी महात्मा गाँधी ने स्वयं को किसका सेवक कहा है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। गुरुदेव ने किसे भिखारी जैसा माना है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। गाँधीजी ने किस क्षेत्र में विशेष उपलब्धियाँ अर्जित की?
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