शैवालतथाजिम्नोस्पर्म के आर्थिक महत्वपर टिप्पणी लिखों। | 11 | वनस्पति जगत | BIOLOGY | NCERT HINDI...
शैवालतथाजिम्नोस्पर्म के आर्थिक महत्वपर टिप्पणी लिखों। | 11 | वनस्पति जगत | BIOLOGY | NCERT HINDI...
Similar Questions
Explore conceptually related problems
वनस्पति जगत |वनस्पति जगत के लक्षण |OMR
वनस्पति जगत |पादपो का वर्गीकरण |पादपो का वर्गीकरण |वनस्पति जगत के लक्षण
वनस्पति जगत के लक्षण |थेेेलोफाइट (शेवाल )|OMR
वनस्पति जगत-परिचय|वनस्पति जगत के लक्षण|वनस्पति जगत का वर्गीकरण|थैलोफाइट (शैवाल)|थैलोफाईट (शैवाल) के लक्षण|OMR
भाषा, साहित्य, कला, दर्शन, जीवन और संस्कृति इन सबका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। इन्हीं से बनती है हमारी पहचान, परिभाषित होती है हमारी अस्मिता। किसी भी राष्ट्र की पहचान है उसका साहित्यिक और सांस्कृतिक संसार, जिसे जीवित रखने का कार्य करती है 'भाषा'। साथ ही भाषा समाज के भावनात्मक और सांस्कृतिक संघटन को दृढ़ बनाती है। यद्यपि भाषा का सम्बन्ध किसी मजहब से नहीं होता, किन्तु यह भी सच है कि प्रत्येक भाषा किसी-न-किसी जाति की होती है और यही वैज्ञानिक दृष्टि भी है, क्योकि भाषा को बोलने वालों का और उसे अपने धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक व्यवहार में लाने वाले लोगों का सम्बन्ध धर्म से होता है। इसलिए धीरे-धीरे अपनी धार्मिक छवि और रूढ़ विचारधाराओं के कारण भाषा, 'मजहब विशेष की बन जाती है। दुनिया के विभिन्न धर्मों की अपनी-अपनी रूढ़ भाषाएँ इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं। धार्मिक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त धर्म विशेष को भाषा उस पर अपना विशिष्ट 'मजहबी' ठप्पा लगा देती है और वह जन सामान्य के लिए 'पवित्र भाषा' या 'देववाणी' का मिथक बन जाती है। हिन्दुओं की मजहबी भाषा संस्कृत', मुसलमानों की 'अरबी', जैनों की "प्राकृत', सिखों की 'पंजाबी भाषा इसी मजहबी ठप्पे का उदाहरण है। यद्यपि भाषा बार-बार इस धर्म और जाति के दायरे को नकारती हुई जन-मन के भावानुकूल अपना रूप बदलती है, विस्तारित होती है, किन्तु धर्म के ठेकेदार सदा-सदा से उसे रूढिबद्ध करने का प्रयास करते रहे हैं। यहाँ तक कि नंदी, पर्वत, वन-प्रदेश, समुद्र, वनस्पति जो समूची धरती पर विद्यमान हैं, धार्मिक आस्थाओं के, विश्वासों के चलते विशिष्ट धर्मस्थली बन जाते हैं। सांस्कृतिक नैतिक व्यवहार की तरह धर्म जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। मानव की दुर्बलता भी और सबलता भी। रूढ़ अन्धविश्वासों के सहारे धर्म के ठेकेदार पण्डे-पुजारी, मुल्ला-मौलवी, पोप-पादरी सभी अपने-अपने लाभ-लोभ को भुनाते रहते हैं और उनकी इस ठगी का शिकार बनती है अन्धविश्वासों से ग्रस्त भयाक्रान्त जनता। शासन तन्त्र इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाता है और भाषा के नाम पर समुदायों और जाति में जनता को बॉट उसका दोहरा शोषण किया जाता है। यहीं से जुड़ाव होता है भाषायी जातीय सम्बन्ध का। शासन-वर्ग का हस्तक्षेप राजसत्ता तक ही नहीं रहता। भाषा, प्रशासन की भाषा के रूप में शासक के इंगित पर अपना स्वरूप रचती है। तद्नुरूप उसकी सत्ता बनती एवं बिगड़ती है। शासन के धर्म और विचार के अनुकूल भाषा का दायरा निर्धारित होता है। प्राय: भाषा दो रूपों में बँटी रहती है एक प्रशासन की भाषा दूसरी जनसामान्य की। भाषा को धर्म के बन्धनों में बाँधने में सर्वाधिक भूमिका किसकी होती है?
भाषा, साहित्य, कला, दर्शन, जीवन और संस्कृति इन सबका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। इन्हीं से बनती है हमारी पहचान, परिभाषित होती है हमारी अस्मिता। किसी भी राष्ट्र की पहचान है उसका साहित्यिक और सांस्कृतिक संसार, जिसे जीवित रखने का कार्य करती है 'भाषा'। साथ ही भाषा समाज के भावनात्मक और सांस्कृतिक संघटन को दृढ़ बनाती है। यद्यपि भाषा का सम्बन्ध किसी मजहब से नहीं होता, किन्तु यह भी सच है कि प्रत्येक भाषा किसी-न-किसी जाति की होती है और यही वैज्ञानिक दृष्टि भी है, क्योकि भाषा को बोलने वालों का और उसे अपने धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक व्यवहार में लाने वाले लोगों का सम्बन्ध धर्म से होता है। इसलिए धीरे-धीरे अपनी धार्मिक छवि और रूढ़ विचारधाराओं के कारण भाषा, 'मजहब विशेष की बन जाती है। दुनिया के विभिन्न धर्मों की अपनी-अपनी रूढ़ भाषाएँ इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं। धार्मिक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त धर्म विशेष को भाषा उस पर अपना विशिष्ट 'मजहबी' ठप्पा लगा देती है और वह जन सामान्य के लिए 'पवित्र भाषा' या 'देववाणी' का मिथक बन जाती है। हिन्दुओं की मजहबी भाषा संस्कृत', मुसलमानों की 'अरबी', जैनों की "प्राकृत', सिखों की 'पंजाबी भाषा इसी मजहबी ठप्पे का उदाहरण है। यद्यपि भाषा बार-बार इस धर्म और जाति के दायरे को नकारती हुई जन-मन के भावानुकूल अपना रूप बदलती है, विस्तारित होती है, किन्तु धर्म के ठेकेदार सदा-सदा से उसे रूढिबद्ध करने का प्रयास करते रहे हैं। यहाँ तक कि नंदी, पर्वत, वन-प्रदेश, समुद्र, वनस्पति जो समूची धरती पर विद्यमान हैं, धार्मिक आस्थाओं के, विश्वासों के चलते विशिष्ट धर्मस्थली बन जाते हैं। सांस्कृतिक नैतिक व्यवहार की तरह धर्म जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। मानव की दुर्बलता भी और सबलता भी। रूढ़ अन्धविश्वासों के सहारे धर्म के ठेकेदार पण्डे-पुजारी, मुल्ला-मौलवी, पोप-पादरी सभी अपने-अपने लाभ-लोभ को भुनाते रहते हैं और उनकी इस ठगी का शिकार बनती है अन्धविश्वासों से ग्रस्त भयाक्रान्त जनता। शासन तन्त्र इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाता है और भाषा के नाम पर समुदायों और जाति में जनता को बॉट उसका दोहरा शोषण किया जाता है। यहीं से जुड़ाव होता है भाषायी जातीय सम्बन्ध का। शासन-वर्ग का हस्तक्षेप राजसत्ता तक ही नहीं रहता। भाषा, प्रशासन की भाषा के रूप में शासक के इंगित पर अपना स्वरूप रचती है। तद्नुरूप उसकी सत्ता बनती एवं बिगड़ती है। शासन के धर्म और विचार के अनुकूल भाषा का दायरा निर्धारित होता है। प्राय: भाषा दो रूपों में बँटी रहती है एक प्रशासन की भाषा दूसरी जनसामान्य की। हमारी पहचान किससे बनती है?
भाषा, साहित्य, कला, दर्शन, जीवन और संस्कृति इन सबका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। इन्हीं से बनती है हमारी पहचान, परिभाषित होती है हमारी अस्मिता। किसी भी राष्ट्र की पहचान है उसका साहित्यिक और सांस्कृतिक संसार, जिसे जीवित रखने का कार्य करती है 'भाषा'। साथ ही भाषा समाज के भावनात्मक और सांस्कृतिक संघटन को दृढ़ बनाती है। यद्यपि भाषा का सम्बन्ध किसी मजहब से नहीं होता, किन्तु यह भी सच है कि प्रत्येक भाषा किसी-न-किसी जाति की होती है और यही वैज्ञानिक दृष्टि भी है, क्योकि भाषा को बोलने वालों का और उसे अपने धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक व्यवहार में लाने वाले लोगों का सम्बन्ध धर्म से होता है। इसलिए धीरे-धीरे अपनी धार्मिक छवि और रूढ़ विचारधाराओं के कारण भाषा, 'मजहब विशेष की बन जाती है। दुनिया के विभिन्न धर्मों की अपनी-अपनी रूढ़ भाषाएँ इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं। धार्मिक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त धर्म विशेष को भाषा उस पर अपना विशिष्ट 'मजहबी' ठप्पा लगा देती है और वह जन सामान्य के लिए 'पवित्र भाषा' या 'देववाणी' का मिथक बन जाती है। हिन्दुओं की मजहबी भाषा संस्कृत', मुसलमानों की 'अरबी', जैनों की "प्राकृत', सिखों की 'पंजाबी भाषा इसी मजहबी ठप्पे का उदाहरण है। यद्यपि भाषा बार-बार इस धर्म और जाति के दायरे को नकारती हुई जन-मन के भावानुकूल अपना रूप बदलती है, विस्तारित होती है, किन्तु धर्म के ठेकेदार सदा-सदा से उसे रूढिबद्ध करने का प्रयास करते रहे हैं। यहाँ तक कि नंदी, पर्वत, वन-प्रदेश, समुद्र, वनस्पति जो समूची धरती पर विद्यमान हैं, धार्मिक आस्थाओं के, विश्वासों के चलते विशिष्ट धर्मस्थली बन जाते हैं। सांस्कृतिक नैतिक व्यवहार की तरह धर्म जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। मानव की दुर्बलता भी और सबलता भी। रूढ़ अन्धविश्वासों के सहारे धर्म के ठेकेदार पण्डे-पुजारी, मुल्ला-मौलवी, पोप-पादरी सभी अपने-अपने लाभ-लोभ को भुनाते रहते हैं और उनकी इस ठगी का शिकार बनती है अन्धविश्वासों से ग्रस्त भयाक्रान्त जनता। शासन तन्त्र इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाता है और भाषा के नाम पर समुदायों और जाति में जनता को बॉट उसका दोहरा शोषण किया जाता है। यहीं से जुड़ाव होता है भाषायी जातीय सम्बन्ध का। शासन-वर्ग का हस्तक्षेप राजसत्ता तक ही नहीं रहता। भाषा, प्रशासन की भाषा के रूप में शासक के इंगित पर अपना स्वरूप रचती है। तद्नुरूप उसकी सत्ता बनती एवं बिगड़ती है। शासन के धर्म और विचार के अनुकूल भाषा का दायरा निर्धारित होता है। प्राय: भाषा दो रूपों में बँटी रहती है एक प्रशासन की भाषा दूसरी जनसामान्य की। भाषा किसे जीवित रखने का कार्य करती है?
भाषा, साहित्य, कला, दर्शन, जीवन और संस्कृति इन सबका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। इन्हीं से बनती है हमारी पहचान, परिभाषित होती है हमारी अस्मिता। किसी भी राष्ट्र की पहचान है उसका साहित्यिक और सांस्कृतिक संसार, जिसे जीवित रखने का कार्य करती है 'भाषा'। साथ ही भाषा समाज के भावनात्मक और सांस्कृतिक संघटन को दृढ़ बनाती है। यद्यपि भाषा का सम्बन्ध किसी मजहब से नहीं होता, किन्तु यह भी सच है कि प्रत्येक भाषा किसी-न-किसी जाति की होती है और यही वैज्ञानिक दृष्टि भी है, क्योकि भाषा को बोलने वालों का और उसे अपने धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक व्यवहार में लाने वाले लोगों का सम्बन्ध धर्म से होता है। इसलिए धीरे-धीरे अपनी धार्मिक छवि और रूढ़ विचारधाराओं के कारण भाषा, 'मजहब विशेष की बन जाती है। दुनिया के विभिन्न धर्मों की अपनी-अपनी रूढ़ भाषाएँ इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं। धार्मिक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त धर्म विशेष को भाषा उस पर अपना विशिष्ट 'मजहबी' ठप्पा लगा देती है और वह जन सामान्य के लिए 'पवित्र भाषा' या 'देववाणी' का मिथक बन जाती है। हिन्दुओं की मजहबी भाषा संस्कृत', मुसलमानों की 'अरबी', जैनों की "प्राकृत', सिखों की 'पंजाबी भाषा इसी मजहबी ठप्पे का उदाहरण है। यद्यपि भाषा बार-बार इस धर्म और जाति के दायरे को नकारती हुई जन-मन के भावानुकूल अपना रूप बदलती है, विस्तारित होती है, किन्तु धर्म के ठेकेदार सदा-सदा से उसे रूढिबद्ध करने का प्रयास करते रहे हैं। यहाँ तक कि नंदी, पर्वत, वन-प्रदेश, समुद्र, वनस्पति जो समूची धरती पर विद्यमान हैं, धार्मिक आस्थाओं के, विश्वासों के चलते विशिष्ट धर्मस्थली बन जाते हैं। सांस्कृतिक नैतिक व्यवहार की तरह धर्म जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। मानव की दुर्बलता भी और सबलता भी। रूढ़ अन्धविश्वासों के सहारे धर्म के ठेकेदार पण्डे-पुजारी, मुल्ला-मौलवी, पोप-पादरी सभी अपने-अपने लाभ-लोभ को भुनाते रहते हैं और उनकी इस ठगी का शिकार बनती है अन्धविश्वासों से ग्रस्त भयाक्रान्त जनता। शासन तन्त्र इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाता है और भाषा के नाम पर समुदायों और जाति में जनता को बॉट उसका दोहरा शोषण किया जाता है। यहीं से जुड़ाव होता है भाषायी जातीय सम्बन्ध का। शासन-वर्ग का हस्तक्षेप राजसत्ता तक ही नहीं रहता। भाषा, प्रशासन की भाषा के रूप में शासक के इंगित पर अपना स्वरूप रचती है। तद्नुरूप उसकी सत्ता बनती एवं बिगड़ती है। शासन के धर्म और विचार के अनुकूल भाषा का दायरा निर्धारित होता है। प्राय: भाषा दो रूपों में बँटी रहती है एक प्रशासन की भाषा दूसरी जनसामान्य की। निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?
भाषा, साहित्य, कला, दर्शन, जीवन और संस्कृति इन सबका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। इन्हीं से बनती है हमारी पहचान, परिभाषित होती है हमारी अस्मिता। किसी भी राष्ट्र की पहचान है उसका साहित्यिक और सांस्कृतिक संसार, जिसे जीवित रखने का कार्य करती है 'भाषा'। साथ ही भाषा समाज के भावनात्मक और सांस्कृतिक संघटन को दृढ़ बनाती है। यद्यपि भाषा का सम्बन्ध किसी मजहब से नहीं होता, किन्तु यह भी सच है कि प्रत्येक भाषा किसी-न-किसी जाति की होती है और यही वैज्ञानिक दृष्टि भी है, क्योकि भाषा को बोलने वालों का और उसे अपने धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक व्यवहार में लाने वाले लोगों का सम्बन्ध धर्म से होता है। इसलिए धीरे-धीरे अपनी धार्मिक छवि और रूढ़ विचारधाराओं के कारण भाषा, 'मजहब विशेष की बन जाती है। दुनिया के विभिन्न धर्मों की अपनी-अपनी रूढ़ भाषाएँ इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं। धार्मिक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त धर्म विशेष को भाषा उस पर अपना विशिष्ट 'मजहबी' ठप्पा लगा देती है और वह जन सामान्य के लिए 'पवित्र भाषा' या 'देववाणी' का मिथक बन जाती है। हिन्दुओं की मजहबी भाषा संस्कृत', मुसलमानों की 'अरबी', जैनों की "प्राकृत', सिखों की 'पंजाबी भाषा इसी मजहबी ठप्पे का उदाहरण है। यद्यपि भाषा बार-बार इस धर्म और जाति के दायरे को नकारती हुई जन-मन के भावानुकूल अपना रूप बदलती है, विस्तारित होती है, किन्तु धर्म के ठेकेदार सदा-सदा से उसे रूढिबद्ध करने का प्रयास करते रहे हैं। यहाँ तक कि नंदी, पर्वत, वन-प्रदेश, समुद्र, वनस्पति जो समूची धरती पर विद्यमान हैं, धार्मिक आस्थाओं के, विश्वासों के चलते विशिष्ट धर्मस्थली बन जाते हैं। सांस्कृतिक नैतिक व्यवहार की तरह धर्म जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। मानव की दुर्बलता भी और सबलता भी। रूढ़ अन्धविश्वासों के सहारे धर्म के ठेकेदार पण्डे-पुजारी, मुल्ला-मौलवी, पोप-पादरी सभी अपने-अपने लाभ-लोभ को भुनाते रहते हैं और उनकी इस ठगी का शिकार बनती है अन्धविश्वासों से ग्रस्त भयाक्रान्त जनता। शासन तन्त्र इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाता है और भाषा के नाम पर समुदायों और जाति में जनता को बॉट उसका दोहरा शोषण किया जाता है। यहीं से जुड़ाव होता है भाषायी जातीय सम्बन्ध का। शासन-वर्ग का हस्तक्षेप राजसत्ता तक ही नहीं रहता। भाषा, प्रशासन की भाषा के रूप में शासक के इंगित पर अपना स्वरूप रचती है। तद्नुरूप उसकी सत्ता बनती एवं बिगड़ती है। शासन के धर्म और विचार के अनुकूल भाषा का दायरा निर्धारित होता है। प्राय: भाषा दो रूपों में बँटी रहती है एक प्रशासन की भाषा दूसरी जनसामान्य की। जैन धर्म के विचारों की अभिव्यक्ति किस भाषा में हुई है?
Recommended Questions
- शैवालतथाजिम्नोस्पर्म के आर्थिक महत्वपर टिप्पणी लिखों। | 11 | वनस्पति ज...
Text Solution
|
- सूत्र C(4) H(11) N में कितने प्रतिशत ऐमिन संभव है?
Text Solution
|
- एक भिन्न इस प्रकार है कि यदि इसके अंश को 3 से गुणा किया जाए और हर से 3...
Text Solution
|
- यदि एक भिन्न के अंश में इसका हर जोड़ दिया जाए और हर में से अंश घटा दिय...
Text Solution
|
- अनुपातों (a(1))/(a(2)),(b(1))/(b(2)) और (c(1))/(c(2)) की तुलना कर ज्...
Text Solution
|
- 2x + 3y = 11 और 2x -4y = - 24 को हल कीजिए और इससे 'm ' का वह मान ज्...
Text Solution
|
- समस्याओ में रेखिक समीकरण युग्म बनाइए और उनके हल प्रतिस्थापन विधि द्...
Text Solution
|
- 7 या 11 आने की या प्रायिकता होंगे यदि दो पास फेंके जाते है ?
Text Solution
|
- वक्र x^(2)+y^(2)=a^(2)" के बिन्दु "(x(1),y(1)) पर स्पर्श रेखा का समीकर...
Text Solution
|