आपको उन अपराधियों से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए, वे सभी हिंसक प्रवृत्ति वाले और लंबे समय से रिकॉर्ड वाले हैं...
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विद्याभ्यासी पुरुष को साथियों का अभाव कभी नहीं रहता। उसकी कोठरी मैं सदा ऐसे लोगों का वास रहता है, जो अमर हैं। वे उसके प्रति सहानुभूति प्रकट करने और उसे समझाने के लिए सदा प्रस्तुत रहते हैं। कवि, दार्शनिक और विद्वान् जिन्होंने प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन किया है और बड़े-बड़े महात्मा, जिन्होंने आत्मा के गूढ़ रहस्यों की थाह लगा ली है, सदा उसकी बातें सुनने और उसकी । 'शंकाओं का समाधान करने के लिए उद्यत रहते हैं। बिना किसी उद्देश्य के सरसरी तौर पर पुस्तकों के पन्ने उलटते जाना अध्ययन नहीं है। लिखी हुई बातों को विचारपूर्वक पूर्णरूप से हृदय से ग्रहण करने का नाम अध्ययन है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष को अपने पढ़ने का उद्देश्य स्थित कर लेना चाहिए। इसके लिए सबसे मुख्य बात यह है कि पढ़ना नियमपूर्वक हो अर्थात् इसके लिए नित्य का समय उपयुक्त होता है। (अध्ययन - निबंध, रामचंद्र शुक्ल) अध्ययन के लिए किस नियम का दृढ़ता से पालन होना चाहिए?
विद्याभ्यासी पुरुष को साथियों का अभाव कभी नहीं रहता। उसकी कोठरी में सदा ऐसे लोगों का वास रहता है, जो अमर हैं। वे उसके प्रति सहानुभूति । प्रकट करने और उसे समझाने के लिए सदा प्रस्तुत रहते हैं। कवि, दार्शनिक और विद्वान जिन्होंने प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन किया है और बड़े-बड़े. महात्मा, जिन्होंने आत्मा के गूढ़ रहस्यों की थाह लगा ली है, सदा उसकी बातें सुनने और उसकी शंकाओं का समाधान करने के लिए उद्यत रहते हैं। बिना किसी उद्देश्य के सरसरी तौर पर पुस्तकों के पन्ने उलटते जाना अध्ययन नहीं है। लिखी हुई बातों को विचारपूर्वक पूर्णरूप से हृदय से ग्रहण करने का नाम अध्ययन है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष को अपने पढ़ने का उद्देश्य स्थित कर लेना चाहिए। इसके लिए सबसे मुख्य बात यह है कि पढ़ना नियमपूर्वक हो अर्थात् इसके लिए नित्य का समय उपयुक्त होता है। अध्ययन के लिए किस नियम का दृढ़ता से पालन होना चाहिए?
भाषा-अधिगम के चरणों को प्रभावित करने वाले तत्व या कारक निम्न में से नहीं हैं
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए: समूची स्वार्थी व अहं-प्रेरित प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं, ऐसे कर्मों में ऊँचे उद्देश्य नहीं होते, उनमें लोक संग्रह नहीं होता, भव्य आदर्श नहीं होता। दूसरे, भले ही आप अपने सामने एक ऊँचा आदर्श रखें, तो भी आपके कर्म यदि आपके मन के चाहे या अनचाहे से प्रेरित हैं तो वे ह्रासमान ही होंगे, क्योंकि पसंद-नापसंद से किए जाते कार्य वासनाओं को बढ़ाए बिना नहीं रहते। कोई काम आपको महज इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि वह आपको पसंद है। उसी तरह कोई काम करने से आपको महज़ इस आधार पर नहीं कतराना चाहिए कि वह काम आपका मनचाहा नहीं है। कार्य का निर्णय बुद्धि-विवेक के आधार पर होना चाहिए, मनचली भावनाओं, तुनकमिजाजी के आधार पर कतई नहीं। इस एक बात को हमेशा याद रखिए कि पसंद और नापसंद आपके सबसे बड़े शत्रु हैं। आप इन्हें पहचानते तक नहीं। उल्टे आप इन्हें पाल-पोसकर दुलारते हैं। वे तो हर क्षण आपकी हानि व हास करने पर ही तुले हैं। इनसे निबटने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि अपनी रुचि और अरुचि का विश्लेषण करें। वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले हैं।" वाक्य में 'वे' सर्वनाम किसके लिए आया है?
समूची स्वार्थी व अह-प्रेरित प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं, ऐसे कर्मों में ऊँचे उद्देश्य नहीं होते, उनमें लोक-संग्रह नहीं होता, भव्य आदर्श नहीं होते। दूसरे, भले ही आपके सामने एक ऊंचा आदर्श रखें, तो भी आपके कर्म यदि आपके मन के चाहे या अनचाहे से प्रेरित हैं तो वे ह्रासमान ही होंगे, क्योंकि पसंद-नापसंद से किए जाते कार्य वासनाओं को बढ़ाए बिना नहीं रहते। कोई काम आपको महज इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि वह आपको पसंद है। उसी तरह कोई काम करने से आपको महज इस आधार पर नहीं कतराना चाहिए कि वह काम आपका मनचाहा नहीं है। कार्य का निर्णय बुद्धि-विवेक के आधार पर होना चाहिए, 'मनचली भावनाओं, तुनकमिजाजी के आधार पर कतई नहीं। इस एक बात को हमेशा याद रखिए कि पसंद और नापसंद आपके सबसे बड़े शत्र हैं। शm इन्हें पहचानते तक नहीं। उल्टे आप इन्हें पाल-पोसकर दुलारते हैं। वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले हैं। इनसे निबटने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि अपनी रुचि और अरुचि का विश्लेषण करें। ''वे तो हर क्षण आपको हानि व ह्रास करने पर ही तुले है।" वाक्य में ', सर्वनाम किसके लिए आया है?
निर्देशः गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। समूची स्वार्थी व अहं-प्रेरित प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं, ऐसे कर्मों में ऊँचे उद्देश्य नहीं होते, उनमें लोक-संग्रह नहीं होता, भव्य आदर्श नहीं होते। दूसरे, भले ही आपके सामने एक ऊँचा आदर्श रखें, तो भी आपके कर्म यदि आपके मन के चाहे या अनचाहे से प्रेरित हैं तो वे ह्रासमान ही होंगे, क्योंकि पसंद-नापसंद से किए जाते कार्य वासनाओं को बढ़ाए बिना नहीं रहते। कोई काम आपको महज इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि वह आपको पसंद है। उसी तरह कोई काम करने से आपको महज इस आधार पर नहीं कतराना चाहिए कि वह काम आपका मनचाहा नहीं है। कार्य का निर्णय बुद्धि-विवेक के आधार पर होना चाहिए, मनचली भावनाओं, तुनकमिजाजी के आधार पर कतई नहीं। इस एक बात को हमेशा याद रखिए कि पसंद और नापसंद आपके सबसे बड़े शत्रु हैं। आप इन्हें पहचानते तक नहीं। उल्टे आप इन्हें पाल-पोसकर दुलारते हैं। वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले हैं। इनसे निबटने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि अपनी रुचि और अरुचि का विश्लेषण करें। "वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले है।" वाक्य में 'वे' सर्वनाम किसके लिए आया है ?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। समूची स्वार्थी व अहं-प्रेरित प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं, ऐसे कर्मों में ऊँचे उद्देश्य नहीं होते, उनमे लोक-संग्रह नहीं होता, भव्य आदर्श नहीं होते। दूसरे, भले ही आप अपने सामने एक ऊँचा आदर्श रखें, तो भी आपके कर्म यदि आपके मन के चाहे या अनचाहे से प्रेरित हैं तो वे ह्रासमान ही होंगे, क्योंकि पसंद-नापसंद से किए जाते कार्य वासनाओं को बढ़ाए बिना नहीं रहते। कोई काम आपको महज इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि वह आपको पसंद है। उसी तरह कोई काम करने से आपको महज इस आधार पर नहीं कतराना चाहिए कि वह काम आपका मनचाहा नहीं है। कार्य का निर्णय बुद्धि-विवेक के आधार पर होना चाहिए, मनचली भावनाओं, तुनकमिजाजी के आधार पर कतई नहीं। इस एक बात को हमेशा याद रखिए कि पसंद और नापसंद आपके सबसे बड़े शत्रु हैं। आप इन्हें पहचानते तक नहीं। उल्टे आप इन्हें पाल-पोसकर दुलारते हैं। वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले हैं। इनसे निबटने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि अपनी रुचि और अरुचि का विश्लेषण करें। ''वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले है।'' वाक्य में 'वे' सर्वनाम किसके लिए आया है?
निर्देशः गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। समूची स्वार्थी व अहं-प्रेरित प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं, ऐसे कर्मों में ऊँचे उद्देश्य नहीं होते, उनमें लोक-संग्रह नहीं होता, भव्य आदर्श नहीं होते। दूसरे, भले ही आपके सामने एक ऊँचा आदर्श रखें, तो भी आपके कर्म यदि आपके मन के चाहे या अनचाहे से प्रेरित हैं तो वे ह्रासमान ही होंगे, क्योंकि पसंद-नापसंद से किए जाते कार्य वासनाओं को बढ़ाए बिना नहीं रहते। कोई काम आपको महज इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि वह आपको पसंद है। उसी तरह कोई काम करने से आपको महज इस आधार पर नहीं कतराना चाहिए कि वह काम आपका मनचाहा नहीं है। कार्य का निर्णय बुद्धि-विवेक के आधार पर होना चाहिए, मनचली भावनाओं, तुनकमिजाजी के आधार पर कतई नहीं। इस एक बात को हमेशा याद रखिए कि पसंद और नापसंद आपके सबसे बड़े शत्रु हैं। आप इन्हें पहचानते तक नहीं। उल्टे आप इन्हें पाल-पोसकर दुलारते हैं। वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले हैं। इनसे निबटने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि अपनी रुचि और अरुचि का विश्लेषण करें। कौन-से कार्य हानि की ओर ले जाते हैं ?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। समूची स्वार्थी व अहं-प्रेरित प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं, ऐसे कर्मों में ऊँचे उद्देश्य नहीं होते, उनमे लोक-संग्रह नहीं होता, भव्य आदर्श नहीं होते। दूसरे, भले ही आप अपने सामने एक ऊँचा आदर्श रखें, तो भी आपके कर्म यदि आपके मन के चाहे या अनचाहे से प्रेरित हैं तो वे ह्रासमान ही होंगे, क्योंकि पसंद-नापसंद से किए जाते कार्य वासनाओं को बढ़ाए बिना नहीं रहते। कोई काम आपको महज इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि वह आपको पसंद है। उसी तरह कोई काम करने से आपको महज इस आधार पर नहीं कतराना चाहिए कि वह काम आपका मनचाहा नहीं है। कार्य का निर्णय बुद्धि-विवेक के आधार पर होना चाहिए, मनचली भावनाओं, तुनकमिजाजी के आधार पर कतई नहीं। इस एक बात को हमेशा याद रखिए कि पसंद और नापसंद आपके सबसे बड़े शत्रु हैं। आप इन्हें पहचानते तक नहीं। उल्टे आप इन्हें पाल-पोसकर दुलारते हैं। वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले हैं। इनसे निबटने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि अपनी रुचि और अरुचि का विश्लेषण करें। कौन-से कार्य हानि की ओर ले जाते हैं?
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