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चित्रानुसार चार NOR द्वार जुड़े हैं। दिए गये चित्र की सत्य सारिणी है : | 12 | सॉल्वड पेपर (JEE M...

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A rectangular lawn whose length is twice of its breadth is extended by having four semi-circular portions on its sides. What is the total area (in m^2 ) of the lawn if the smaller side of the rectangle is 12m? (Take pi = 3.14) एक आयताकार लॉन जिसकी लंबाई इसकी चौड़ाई से दोगुनी है, उसके किनारों पर चार अर्ध-वत्ताकार हिस्से होते हैं। यदि आयत की चौड़ाई 12 मीटर है तो लॉन का कुल क्षेत्रफल ( m^2 ) में क्या है? (मानिए pi = 3.14)

The given table represents the number of engineers recruited by four companies A,B,C and D over the years. Study the table carefully and answer the questions that follows: The number of years in which the number of engineers recruited by company D is less than the average number of engineers recruited by company B in the given six years, is: दी गयी तालिका चार कंपनियों A, B, C और D के द्वारा इन वर्षों के दौरान भर्ती किये गए इंजीनियरों की संख्या दर्शाती है | इस तालिका का ध्यानपूर्वक अध्ययन करें तथा इसके बाद पूछे गए प्रश्न का उत्तर दें | ऐसे कितने वर्ष हैं जिनमें कंपनी D के द्वारा भर्ती किये गए इंजीनियरों की संख्या दिए गए छः वर्षों की अवधि में कंपनी B के द्वारा भर्ती किये गए इंजीनियरों की औसत संख्या से कम है?

साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। लेखक खेती के साथ-साथ लिखने का काम भी क्यों कर रहा है।

साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। लेखक को दिसंबर से लगाव है, क्योंकि:

साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। शब्दों का कौन सा जोड़ शेष से भिन्न है?

साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। “किसान' से बना 'किसानी' शब्द है:

साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। स्वार्थ को ताक पर रखकर जीते है:

साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। किसान अपने सुख-दुख को कब भूल जाता है?