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पुस्तक जिसमें द्विनाम नामकरण पद्धति सर्व...

पुस्तक जिसमें द्विनाम नामकरण पद्धति सर्वप्रथम प्रकाशित है- | 11 | जीव-जगत | BIOLOGY | NAVBODH | ...

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सजीव जगत|नामकरण |द्विनाम पद्धति |नामकरण समितियां |द्विनाम पद्धति के नियम |सजीव जगत का वर्गीकरण |वर्गिकी पदानुक्रम |OMR

वर्गिकी|वर्गीकरण विज्ञान|नामकरण|द्विनाम पद्धति|नामकरण समितियां|द्विनाम पद्धति के नियम|सजीव जगत का वर्गीकरण|वर्गिकी पदानुक्रम|OMR

व्याकरण-शिक्षण की वह पद्धति अपेक्षाकृत अधिक उचित है, जिसमें

जीव' क्या है ?|जीव जगत में विविधता|वर्गिकी

जीव' क्या है ?|जगत में विविधता

जीवन |जीव जगत में विविधता |द्विपद पद्धति का वर्गीकरण |वर्गीकरण |OMR

छात्र की सहायता करना अत्यावश्यक है कि उसका मन वैज्ञानिक, स्पष्ट, निश्चित और सूक्ष्मता से सोचने वाला तथा उसके साथ ही साथ मन की गहराईयों को अनावृत करने वाला हो। क्या छात्र को इस प्रकार शिक्षित करना संभव है कि वह सभी लेबिलों के परे जो कर सके तथा उस वस्त का पता लगा सके, उसका अनुभव कर सके, जिसको मन नहीं माप सकता, जो किसी पुस्तक में नहीं लिखा है। यदि इस प्रकार के एक विद्यालय में ऐसी शिक्षा संभव हो सके, तो वह अनूठी होगी। आप सभी को यह देखना चाहिए कि इस प्रकार के विद्यालय का निर्माण कितना मूल्यवान होगा। केवल नृत्य, संगीत, गणित और दूसरे पाठों पर ध्यान देना समस्त जीवन नहीं है। शांत बैठना तथा अपने को देखना, सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त करना, अवलोकन करना भी जीवन का अंग है। विचार कैसे किया जाए. किस पर विचार किया जाए, तथा आप विचार क्यों कर रहे हैं, इसको देखना भी आवश्यक है। लेखक ऐसी शिक्षा की बात करता है जिसमें विद्यार्थी

Table shows the percentage distribution of the expenditure incurred on different items for publishing a book. यह तालिका एक पुस्तक को प्रकाशित करने में अलग-अलग मदों पर हुए व्यय का प्रतिशत वितरण दर्शाती है | Expenditure on Royalty is less than that on Printing by: रॉयल्टी पर किया गया खर्च प्रिंटिंग से कितना कम है ?

निम्नलिखित पद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मानव के लिए विचार तथा अनुभव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उदात्त है व इसका अथवा उसका नहीं है जातिगत अथवा देशगत नहीं है, वह सबका है, सारे विश्व का है। समस्त ज्ञान, विज्ञान और सभ्यता, सारी मानवता की विरासत है। पूर्व और पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के भेद, अक्षांश और देशान्तर का भेद तथा जलवायु और भौगोलिक सीमा के भेद सर्वथा निराधार हैं। सम्प्रदाय, समुदाय और जाति के नाम पर आदशौं, मूल्यों की स्थापना करना, संकीर्णता के वातावरण में मानवता के दम घोंटना-सा है। जो कुछ भी उपलब्धि है, वह चाहे जिस भू-भाग की उपज हो। महापुरुष विरोधी नहीं होते, एक-दूसरे के पूरक होते हैं। महापुरुष में अपने देश की विशेषता होती है। विवेकशील मनुष्य नम्रतापूर्वक महापुरुषों से शिक्षा ग्रहरण कर अपने जीवन को प्रकाशित करने का प्रयत्न करता है। समस्त मानवता उसके प्रति कृतज्ञ है। किन्तु अब हमें उनसे आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि ज्ञान की इतिश्री नहीं होती। संसार एक खुली पाठशाला है, जीवन एक खुली पुस्तक है, विकास की क्रिया के मूल में मानव की पूर्ण बनने की अपनी प्रेरणा है। विकास के लिए समन्वय का भाव होना परम आवश्यक है। यदि हम विभिन्न विचारधाराओं एवं उनके जन्मदाता महापुरुषों का पूर्ण खण्डन करें तो विकास अवरुद्ध हो जायेगा। किसी धर्म विशेष या मान्यता के खूटे के साथ संकीर्ण भाव से बंधकर तथा परम्पराओं और रूढ़ियों से जकड़े हुए हम आगे नहीं बढ़ सकते। मानव को मानव रूप में सम्मानित करके ही हम जातीयता, प्रान्तीयता, क्षुद्र राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता के भेद को तोड़ सकते हैं। आज मानव, मानव से दूर हटता जा रहा है। वह भूल चुका है कि देश, धर्म और जाति के भिन्न होते हुए भी हम सर्वप्रथम मानव हैं और समान हैं तथा सभी की भावनाएं और लक्ष्य एक ही हैं। सत्ताधारी मनुष्य दूसरों को कुचलकर सुख- सुवध ाओं पर एकाधिकार कर लेना चाहता है लेकिन एक आकाश के नीचे रहने वाले इन्सान तो सब एक हैं भले ही कोई कुदाल लेकर श्रमिका का कार्य करता हो, कोई कलम लेकर दफ्तर का, किन्तु लक्ष्य एक है- समाज का अभ्युदय। मानव का नाता श्रेष्ठ नाता है। नौकर कहकर पुकारना मानो मानव का अपमान है। सहयोगी, सहायक अथवा सस्नेह उसके नाम से सम्बोधित करना मधुर है। जेल और फांसी का विध र मानवता का कलंक है। एक सीमा एक दण्ड भी आवश्यक होता है, लेकिन दण्ड का आतंक समाज को पंगु बना देता है। हमें अपराध वृत्ति का शमन करके अपराधी को शिष्ट एवं सभ्य मानव बनाना चाहिए। दया मानवता का सार है। दया छोड़कर सत्य भी सत्य नहीं है। दया प्रेरित असत्य भी व्यावहारिक सत्य नहीं है। दया धर्म मानवधर्म हैं।विकास के लिए क्या आवश्यक है?