फिनॉल से पिक्रिक अम्ल किस प्रकार प्राप्त करोगे? | 12 | ऐल्कॉहॉल्स, फिनॉल्स तथा इथर्स | CHEMIST...
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The average of some numbers is 54.6. If 75% of the numbers are increased by 5.6 each and the rest are decreased by 8.4 each, then what is the average of the numbers so obtained? कुछ संख्याओं का औसत 54.6 है | यदि इन संख्याओं के 75% में से प्रत्येक को 5.6 से बढ़ा दिया जाए तथा शेष में से प्रत्येक को 8.4 से कम कर दिया जाए, तो इस प्रकार प्राप्त होने वाली संख्याओं का औसत क्या होगा ?
The heights of some girls in a school were noted and the data obtained are as shown in the table. एक विद्यालय में कुछ लड़कियों की लंबाई को दर्ज किया गया तथा इस प्रकार प्राप्त आंकड़ों को इस तालिका में दर्शाया गया है | How many girls have a height of 135 cm or more but less than 150 cm? कितनी लड़कियों की लंबाई 135 सेमी या अधिक है लेकिन 150 सेमी से कम है ?
A number is first decreased by 10% and then increased by 10%. The number so obtained is 100 less than the original number. The original number is: किसी संख्या में पहले 10% की कमी तथा फिर 10% की वृद्धि की जाती है | इस प्रकार प्राप्त संख्या वास्तविक संख्या से 100 कम है | वास्तविक संख्या ज्ञात करें |
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। प्रत्येक प्रभात सुंदर चीजें लेकर उपस्थित होता है, पर यदि हमने कल तथा परसों के प्रभात की कृपा से लाभ नहीं उठाया तो आज के प्रभात से लाभ उठाने की हमारी शक्ति क्षीण होती जाएगी, और यही गति रही तो फिर हम उस शक्ति को बिल्कुल ही गँवा बैठेंगे। किसी विद्वान् ने ठीक ही कहा है कि खोई हुई सम्पत्ति कमखर्ची और परिश्रम से प्राप्त की जा सकती है, भूला हुआ ज्ञान अध्ययन से प्राप्त हो सकता है, गँवाया हुआ स्वास्थ्य दवा और संयम से लौटाया जा सकता है परन्तु नष्ट किया हुआ समय सदा के लिए चला जाता है। वह बस स्मृति की एक चीज हो जाता है और अतीत की एक छाया मात्र रह जाता है। ग्लेडस्टन सरीखा प्रतिभाशाली व्यक्ति अपनी जेब में एक __ छोटी-सी पुस्तक हमेशा लेकर निकलता था। उन्हें चिन्ता रहती थी किकहीं कोई घड़ी व्यर्थ न चली जाए। तब हम जैसे साधारण मनुष्यों को अपने अमूल्य समय को नष्ट होने से बचाने के लिए क्या नहीं करना चाहिए? प्रतिभावान् पुरुष समय के छोटे-छोटे टुकड़ों को बचाकर महान हो जाते हैं और अपनी असफलता पर आश्चर्य करने वाले उन्हेंयों ही उड़ जाने देते हैं। उन्हें जीवन-भर कभी समय का मूल्य मालूम __ ही नहीं हो पाता। गँवाया हुआ स्वास्थ्य किस तरह वापस आ सकता है?
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। प्रस्तुत गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से क्या हो सकता है?
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। वैदिक काल में निम्नलिखित में से किस विषय की शिक्षा दी जाती थी?
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। वेदत्रयी के अन्तर्गत निम्नलिखित में से किसे शामिल नहीं किया जाता है?
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। वायु पुराण में निम्नलिखित में से किस विषय को शामिल नहीं किया गया है?
प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। मनु के अनुसार वैश्यों को निम्नलिखित में से किस विषय की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए?
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