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पादप अपशिष्ट संचित रहते है | 10 | उत्सर्जन | BIOLOGY | BHARATI BHAWAN | Doubtnut

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Pankaj invests an amount after dividing in three different schemes A, B and C giving the interest at the rate of 10%, 12% and 15% respectively and the accumulated interest for one year is Rs. 3200. The amounts invested in A, B and C are in the ratio of 8 : 5 : 12. What amount did he invest in the scheme B ? पंकज किसी राशि को विभाजित कर तीन अलग-अलग योजनाओं A, B और C में क्रमशः 10%, 12% और 15% प्रति वर्ष ब्याज दर पर निवेश करता है, और एक वर्ष में संचित कुल ब्याज 3200 रूपए है | योजना A, B और C में निवेश की गयी राशि 8 : 5 : 12 के अनुपात में है | योजना B में वह कितनी राशि का निवेश करता है ?

यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते भी हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की सम्भावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परन्तु वार्तालाप हम भूलते नहीं हैं। सुनने के लिए पुराना । भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जारी है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र 20% ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल 10% ही याद रहता है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। 'सुनने के लिए पुराना भूलना भी जरूरी है।' वाक्य है

यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते भी हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की सम्भावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परन्तु वार्तालाप हम भूलते नहीं हैं। सुनने के लिए पुराना । भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जारी है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र 20% ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल 10% ही याद रहता है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। भाषण और वार्तालाप में क्या अन्तर है?

यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते भी हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की सम्भावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परन्तु वार्तालाप हम भूलते नहीं हैं। सुनने के लिए पुराना । भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जारी है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र 20% ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल 10% ही याद रहता है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। सुनकर समझने को कौन-सा तत्त्व प्रभावित करता है?

यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते भी हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की सम्भावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परन्तु वार्तालाप हम भूलते नहीं हैं। सुनने के लिए पुराना । भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जारी है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र 20% ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल 10% ही याद रहता है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। लेखक के अनुसार क्या महत्त्वपूर्ण है?

यदि हम सुनने के साथ-साथ सुनाते भी हैं, अर्थात् वार्तालाप भी करते हैं तो बातें याद रहने की सम्भावना काफी अधिक रहती है। इसलिए भाषण तो हमें याद नहीं रहते, परन्तु वार्तालाप हम भूलते नहीं हैं। सुनने के लिए पुराना । भूलना भी जरूरी है। बुद्धि के पास वह शक्ति है जिससे वह सुनी हुई बातों का सार निकालकर बाकी विस्तार को भुला देती है, तभी हम नई बातें सुन सकते हैं। दो कान इसलिए हैं कि सुनने को इतना कुछ है कि एक कम पड़ता है। प्रकृति ने हमें मुख एक ही दिया है इसलिए कि सुनो ज्यादा, बोलो कम। सामने वाले की बात ध्यान से सुनना एक प्रकार की गतिविधि है। सुनने की कला आज दुर्लभ होती जारी है। शोध बताते हैं कि हम जितना सुनते हैं, उसका मात्र 20% ही हमें याद रहता है। सुनी बातों में से तीन दिन बाद केवल 10% ही याद रहता है। इसके अलावा सुनने और समझने के बीच हमारा पूर्वाग्रह, पूर्व जानकारी, पूर्व अर्जित ज्ञान भी प्रभाव डालता है। यह जड़ी-बूटी तो आज बड़ी ......." है। वाक्य के रिक्त स्थान पर शब्द आएमा

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