जलवायु नियंत्रण |ऊंचाई |वायुदाब एवं पवन तंत्र |समुद्र से दूरी |अक्षांश |उच्चावच |महासागरीय धाराए |कोरिआलिस बल |वायुदाब एवं पवन |OMR|जेट धारा |भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक |व्यापारिक पवन
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मौसम और जलवायु में अंतर |भारत की जलवायु |तापमान और वर्षा में अंतर |गर्मी का मौसम |सर्दी का मौसम |भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक |ऊँचाई|वायुदाब पवन
परिरक्षण प्रभाव (σ) एवं प्रभावी नाभिकीय आवेश (Zeff)|परिरक्षण नियतांक (σ) को ज्ञात करने के लिए स्लेटर का नियम |परमाण्वीय त्रिज्या |परमाण्वीय आकार को प्रभावित करने वाले कारक |आयनन ऊर्जा |आयनन विभव को प्रभावित करने वाले कारक |आयनन ऊर्जा की तुलना |आयनन ऊर्जा के अनुप्रयोग |इलेक्ट्रॉन बंधुता |विद्युत ऋणात्मकता |OMR|सारांश
Climate Of India (भारत की जलवायु)|Factors Affecting Climate (जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक)|Climate Zones Of India (भारत के जलवायु क्षेत्र)|OMR
पृष्ठ रसायन|अधिशोषण|अधिशोष्य|अधिशोषण एवं अवशोषण में अंतर|अधिशोषण के कुछ उदाहरण|अधिशोषण की ऊष्मागतिकी|अधिशोषण के प्रकार|ठोस पर गैसों के अधिशोषण को प्रभावित करने वाले कारक |भौतिक अधिशोषण के अभिलक्षण|OMR|Summary
निम्नलिखित पद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मानव के लिए विचार तथा अनुभव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उदात्त है व इसका अथवा उसका नहीं है जातिगत अथवा देशगत नहीं है, वह सबका है, सारे विश्व का है। समस्त ज्ञान, विज्ञान और सभ्यता, सारी मानवता की विरासत है। पूर्व और पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के भेद, अक्षांश और देशान्तर का भेद तथा जलवायु और भौगोलिक सीमा के भेद सर्वथा निराधार हैं। सम्प्रदाय, समुदाय और जाति के नाम पर आदशौं, मूल्यों की स्थापना करना, संकीर्णता के वातावरण में मानवता के दम घोंटना-सा है। जो कुछ भी उपलब्धि है, वह चाहे जिस भू-भाग की उपज हो। महापुरुष विरोधी नहीं होते, एक-दूसरे के पूरक होते हैं। महापुरुष में अपने देश की विशेषता होती है। विवेकशील मनुष्य नम्रतापूर्वक महापुरुषों से शिक्षा ग्रहरण कर अपने जीवन को प्रकाशित करने का प्रयत्न करता है। समस्त मानवता उसके प्रति कृतज्ञ है। किन्तु अब हमें उनसे आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि ज्ञान की इतिश्री नहीं होती। संसार एक खुली पाठशाला है, जीवन एक खुली पुस्तक है, विकास की क्रिया के मूल में मानव की पूर्ण बनने की अपनी प्रेरणा है। विकास के लिए समन्वय का भाव होना परम आवश्यक है। यदि हम विभिन्न विचारधाराओं एवं उनके जन्मदाता महापुरुषों का पूर्ण खण्डन करें तो विकास अवरुद्ध हो जायेगा। किसी धर्म विशेष या मान्यता के खूटे के साथ संकीर्ण भाव से बंधकर तथा परम्पराओं और रूढ़ियों से जकड़े हुए हम आगे नहीं बढ़ सकते। मानव को मानव रूप में सम्मानित करके ही हम जातीयता, प्रान्तीयता, क्षुद्र राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता के भेद को तोड़ सकते हैं। आज मानव, मानव से दूर हटता जा रहा है। वह भूल चुका है कि देश, धर्म और जाति के भिन्न होते हुए भी हम सर्वप्रथम मानव हैं और समान हैं तथा सभी की भावनाएं और लक्ष्य एक ही हैं। सत्ताधारी मनुष्य दूसरों को कुचलकर सुख- सुवध ाओं पर एकाधिकार कर लेना चाहता है लेकिन एक आकाश के नीचे रहने वाले इन्सान तो सब एक हैं भले ही कोई कुदाल लेकर श्रमिका का कार्य करता हो, कोई कलम लेकर दफ्तर का, किन्तु लक्ष्य एक है- समाज का अभ्युदय। मानव का नाता श्रेष्ठ नाता है। नौकर कहकर पुकारना मानो मानव का अपमान है। सहयोगी, सहायक अथवा सस्नेह उसके नाम से सम्बोधित करना मधुर है। जेल और फांसी का विध र मानवता का कलंक है। एक सीमा एक दण्ड भी आवश्यक होता है, लेकिन दण्ड का आतंक समाज को पंगु बना देता है। हमें अपराध वृत्ति का शमन करके अपराधी को शिष्ट एवं सभ्य मानव बनाना चाहिए। दया मानवता का सार है। दया छोड़कर सत्य भी सत्य नहीं है। दया प्रेरित असत्य भी व्यावहारिक सत्य नहीं है। दया धर्म मानवधर्म हैं। . प्रस्तुत गद्यांश मुख्यतः किस भावना से ओतप्रोत है?