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आर्थिक क्षेत्र में सरकार की भूमिका एवं ब...

आर्थिक क्षेत्र में सरकार की भूमिका एवं बाज़ार(Role Of Government In Economic Sector And Market) |आर्थिक क्रिया (Economic Activities)|Market (बाज़ार)-बाज़ार के विविध रूप (Different Forms Of Market)|सरकार की भूमिका (Role Of Govt.)|OMR|Summary

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Governance (शासन व्यवस्था)-Government (सरकार)|Function Of Government (सरकार के कार्य)|Role Of Government (सरकार की भूमिका)|Three Important Organs Of Government (सरकार के तीन महत्वपूर्ण अंग)|Types,Forms Of Government (सरकार के रूप,प्रकार )|Democratic Government (लोकतांत्रिक सरकार)|Levels Of Government (सरकार के स्तर)|Summary

Government (सरकार)|Levels Of Government In India (भारत में सरकार के स्तर)|The Union Executive Or The Union Government (सरकार की कार्यपालिका या संघ की सरकार)|OMR|Summary

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OMR|Role Of A Teacher In The Classroom(कक्षा में एक शिक्षक की भूमिका)|Summary

Different Forms Of Government (सरकार के विभिन्न रूप)|Nature Of Democracy (लोकतंत्र के स्वरूप)|Salient Features Of The Democratic Rule (लोकतांत्रिक शासन की प्रमुख विशेषताए)|Seperation Of Powers (शक्तियों का प्रथक्करण)|Organs Of Democratic Government (लोकतांत्रिक सरकार के अंग)|Level Of Government (सरकार के स्तर)|OMR|Summary

the following graph shows the expenditure on education sector by Indian government for the year 2014-15 to 2019-20 निम्नलिखित आरेख भारत सरकार के द्वारा वर्ष 2014-15 से 2019-20 तक शिक्षा के क्षेत्र में किये गए व्यय को दर्शाता है। If the government plans to increase the expenditure by 30% on the average expenditure in 2016-17, 2017-18, 2018-19, then the approximate amount (in billion of rupees) to be spent in 2020-21 is: यदि सरकार 2016-17, 2017-18, 2018-19 में औसत व्यय के आधार पर व्यय को 30% बढ़ाना चाहती है, तो वर्ष 2020-21 में लगभग कितनी राशि ( अरब रुपये में ) खर्च की जाएगी।

Different Forms Of Government (सरकार के विभिन्न रूप)|Nature Of Democracy (लोकतंत्र के स्वरूप)|Salient Features Of The Democratic Rule (लोकतांत्रिक शासन की प्रमुख विशेषताए)|Seperation Of Powers (शक्तियों का प्रथक्करण)|Organs Of Democratic Government (लोकता

प्राचीन भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति से सम्बन्धित अधिकांश अकादमिक अध्ययन ब्राह्मण साहित्य पर आधारित है। इस साहित्य में धार्मिक और वैधानिक बिन्दुओं पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है। धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पादित करने का अधिकार, कर्मकाण्ड-सम्पादन का उद्देश्य, विधवाओं के अधिकार, पुनर्विवाह, नियोग संस्था की प्रासंगिकता, सम्पत्ति का अधिकार आदि कुछ ऐसे उल्लेखनीय बिन्दु हैं, जिन पर विशद् चर्चा की गई है। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, सार्वजनिक गतिविधियाँ सामाजिक समारोहों में उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा परिवार को केन्द्र में रखकर, परिवार के सदस्य के रूप में पारिवारिक भूमिकाओं के निर्वहन के सन्दर्भ में की गई है। ज्यादातर उल्लेख पत्नी की भूमिका और पली के रूप में दिए जाने वाले अधिकार से सम्बन्धित हैं। ऐसे सन्दर्भ न के बराबर हैं, जिनमें समाज के एक स्वतन्त्र सदस्य के रूप में स्त्री अधिकारों की चर्चा की गई हो या उस पर विचार-विमर्श किया गया हो। गणिकाओं को इस सन्दर्भ में अपवाद माना जा सकता है, किन्तु ब्राह्मण साहित्य पितृवंशीय समाज में स्त्री अधिकारों को सन्दर्भित करता है। गणिकाओं को इस समाज का अंग नहीं माना गया है। चूंकि स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का ये पूरा प्रारम्भिक विवेचन ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित था, इसलिए यह सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए को प्रस्तुत करता है। ब्राह्मणेत्तर (श्रमणिक) नजरिये से हमें परिचित नहीं कराता, इसलिए ऐसी कोई अवधारणा बनाना कि समाज में इन नियमों का शब्दशः पालन होता रहा होगा गलत होगा। वास्तविक समाज निश्चय ही इन ग्रन्थों की अपेक्षाओं के आदर्श समाज से अलग रहा होगा। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा किसको केन्द्र में रखकर की गई है?

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