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BIOLOGY
पराग स्त्रीकेसर संकर्षण...

पराग स्त्रीकेसर संकर्षण

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मादा जनन तंत्र|स्त्रीकेसर|बीजाण्ड|अण्डाशय|OMR|Summary

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पुंकेसर: लघुबीजाणुपर्ण |परागकण स्फुटन |परागकण के नुक्सान |परागकण के फायदे |स्त्रीकेसर |बीजाण्ड(गुरुबीजाणुधानी)|OMR

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पराग कण के गुण|स्रीकेफसर |OMR|Summary

पुंकेसर : लघुबीजाणुपर्ण|परागण स्टूफन|परागण के नुकसान|परागण के फायदे|स्त्रीकेसर|बीजाण्ड (गुरुबीजाणुधानी)|OMR

उषा सुनहले तीर बरसती जयलक्ष्मी-सी उदित हुई, उधर पराजित काल रात्रि भी जल में अंतर्निहित हुई। वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का आज लगा हँसने फिर से, वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में शरद-विकास नये सिर से। नव कोमल आलोक बिखरता हिम-संसृति पर भर अनुराग, सित सरोज पर क्रीड़ा करता जैसे मधुमय पिंग पराग। धीरे-धीरे हिम-आच्छादन हटने लगा धरातल से, जगी वनस्पतियाँ अलसाई मुख धोती शीतल जल से। नेत्र निमीलन करती मानो प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने, जलधि लहरियों की अंगड़ाई बार-बार जाती सोने। सिंधुसेज पर धरा वधू अब तनिक संकुचित बैठी-सी, प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किये सी ऐंठी-सी। देखा मनु ने वह अविजित विजन का नव एकांत जैसे कोलाहल सोया हो हिम-शीतल-जड़ता-सा श्रांत। इंद्रनीलमणि महा चषक सोम-रहित उलटा लटका, आज पवन मृदु साँस ले रहा जैसे बीत गया खटका। कविता के अनुसार उषा अपने उदय के समय क्या बरसा रही है?

उषा सुनहले तीर बरसती जयलक्ष्मी-सी उदित हुई, उधर पराजित काल रात्रि भी जल में अंतर्निहित हुई। वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का आज लगा हँसने फिर से, वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में शरद-विकास नये सिर से। नव कोमल आलोक बिखरता हिम-संसृति पर भर अनुराग, सित सरोज पर क्रीड़ा करता जैसे मधुमय पिंग पराग। धीरे-धीरे हिम-आच्छादन हटने लगा धरातल से, जगी वनस्पतियाँ अलसाई मुख धोती शीतल जल से। नेत्र निमीलन करती मानो प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने, जलधि लहरियों की अंगड़ाई बार-बार जाती सोने। सिंधुसेज पर धरा वधू अब तनिक संकुचित बैठी-सी, प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किये सी ऐंठी-सी। देखा मनु ने वह अविजित विजन का नव एकांत जैसे कोलाहल सोया हो हिम-शीतल-जड़ता-सा श्रांत। इंद्रनीलमणि महा चषक सोम-रहित उलटा लटका, आज पवन मृदु साँस ले रहा जैसे बीत गया खटका। कालरात्रि पराजित होकर किसमें समाहित हो गई?