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SOCIAL SCIENCE
भारत में भुखमरी से पीड़ित परिवारों का प्र...

भारत में भुखमरी से पीड़ित परिवारों का प्रतिशत |हरित क्रांति का प्रभाव |बफर स्टॉक |जन वितरण प्रणाली |पी डी एस की वर्तमान स्थिति |अभ्यास प्रश्न |OMR

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The given pie-chart, shows the percentage distribution of the expenditure incurred in publishing a book. Study the pie-chart and the answer the question based on it. / दिया गया पाई चार्ट किसी पुस्तक के प्रकाशन में हुए व्ययों के प्रतिशत वितरण को दर्शाता है | इस पाई चार्ट का अध्ययन करें तथा इस पर आधारित प्रश्न का उत्तर दें | In the given pie-chart, by what percentage the Royalty on the book is less than the Printing cost? / दिए गए पाई चार्ट के अनुसार, इस पुस्तक पर रॉयल्टी प्रकाशन की लागत से कितना प्रतिशत कम है ?

प्राचीन भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति से सम्बन्धित अधिकांश अकादमिक अध्ययन ब्राह्मण साहित्य पर आधारित है। इस साहित्य में धार्मिक और वैधानिक बिन्दुओं पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है। धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पादित करने का अधिकार, कर्मकाण्ड-सम्पादन का उद्देश्य, विधवाओं के अधिकार, पुनर्विवाह, नियोग संस्था की प्रासंगिकता, सम्पत्ति का अधिकार आदि कुछ ऐसे उल्लेखनीय बिन्दु हैं, जिन पर विशद् चर्चा की गई है। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, सार्वजनिक गतिविधियाँ सामाजिक समारोहों में उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा परिवार को केन्द्र में रखकर, परिवार के सदस्य के रूप में पारिवारिक भूमिकाओं के निर्वहन के सन्दर्भ में की गई है। ज्यादातर उल्लेख पत्नी की भूमिका और पली के रूप में दिए जाने वाले अधिकार से सम्बन्धित हैं। ऐसे सन्दर्भ न के बराबर हैं, जिनमें समाज के एक स्वतन्त्र सदस्य के रूप में स्त्री अधिकारों की चर्चा की गई हो या उस पर विचार-विमर्श किया गया हो। गणिकाओं को इस सन्दर्भ में अपवाद माना जा सकता है, किन्तु ब्राह्मण साहित्य पितृवंशीय समाज में स्त्री अधिकारों को सन्दर्भित करता है। गणिकाओं को इस समाज का अंग नहीं माना गया है। चूंकि स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का ये पूरा प्रारम्भिक विवेचन ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित था, इसलिए यह सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए को प्रस्तुत करता है। ब्राह्मणेत्तर (श्रमणिक) नजरिये से हमें परिचित नहीं कराता, इसलिए ऐसी कोई अवधारणा बनाना कि समाज में इन नियमों का शब्दशः पालन होता रहा होगा गलत होगा। वास्तविक समाज निश्चय ही इन ग्रन्थों की अपेक्षाओं के आदर्श समाज से अलग रहा होगा। प्राचीन भारत में स्त्रियों की क्या स्थिति थी, यह जानने का स्रोत है।

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता जनसंख्या वृद्धि रोकना है। इस क्षेत्र में हमारे सभी प्रयत्न निष्फल रहे हैं। ऐसा क्यों है? यह इसलिए भी हो सकता है कि समस्या को देखने का हर एक का एक अलग नजरिया है। जनसंख्याशास्त्रियों के लिए यह आंकड़ों का अम्बार है। अफसरशाही के लिए यह टार्गेट तय करने की कवायद है। राजनीतिज्ञ इस वोट बैंक की दृष्टि से देखता है। ये सबस अपने-अपने ढंग से समस्या को सुलझाने में लगे हैं। अतः अलग-अलग किसी के हाथ सफलता नहीं लगी। पर यह स्पष्ट है कि परिवार के आकार पर आर्थिक विकास और शिक्षा का बहुत प्रभाव पड़ता है। यहाँ आर्थिक विकास का मतलब पाश्चात्य मतानुसार भौतिकवाद नहीं जहाँ बच्चों को बोझ माना जाता है। हमारे लिए तो यह सम्मानपूर्वक जीने के स्तर से सम्बन्धित है। यह मौजूदा सम्पति के समतामलक विवरण पर ही निर्भर नहीं है वरन् ऐसी शैली अपनाने से सम्बन्धित है जिसमें अस्सी करोड़ लोगों की ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल हो सके। इसी प्रकार स्त्री शिक्षा भी है। यह समाज में एक नए प्रकार का चिन्तन पैदा करेगी जिससे सामाजिक और आर्थिक विकास के नए आयाम खुलेंगे और साथ ही बच्चों के विकास का नया रास्ता भी खुलेगा। अतः जनसंख्या की समस्या सामाजिक है। यह अकेले सरकार नहीं सुलझा सकती। केन्द्रीयकरण से हटकर इसे ग्राम-ग्राम, व्यक्ति-व्यक्ति तक पहुँचना होगा। जब तक यह जन आन्दोलन नहीं बन जाता तब तक सफलता मिलना संदिग्ध है। भारत में आर्थिक विकास के लिए जरूरी है

प्राचीन भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति से सम्बन्धित अधिकांश अकादमिक अध्ययन ब्राह्मण साहित्य पर आधारित है। इस साहित्य में धार्मिक और वैधानिक बिन्दुओं पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है। धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पादित करने का अधिकार, कर्मकाण्ड-सम्पादन का उद्देश्य, विधवाओं के अधिकार, पुनर्विवाह, नियोग संस्था की प्रासंगिकता, सम्पत्ति का अधिकार आदि कुछ ऐसे उल्लेखनीय बिन्दु हैं, जिन पर विशद् चर्चा की गई है। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, सार्वजनिक गतिविधियाँ सामाजिक समारोहों में उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा परिवार को केन्द्र में रखकर, परिवार के सदस्य के रूप में पारिवारिक भूमिकाओं के निर्वहन के सन्दर्भ में की गई है। ज्यादातर उल्लेख पत्नी की भूमिका और पली के रूप में दिए जाने वाले अधिकार से सम्बन्धित हैं। ऐसे सन्दर्भ न के बराबर हैं, जिनमें समाज के एक स्वतन्त्र सदस्य के रूप में स्त्री अधिकारों की चर्चा की गई हो या उस पर विचार-विमर्श किया गया हो। गणिकाओं को इस सन्दर्भ में अपवाद माना जा सकता है, किन्तु ब्राह्मण साहित्य पितृवंशीय समाज में स्त्री अधिकारों को सन्दर्भित करता है। गणिकाओं को इस समाज का अंग नहीं माना गया है। चूंकि स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का ये पूरा प्रारम्भिक विवेचन ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित था, इसलिए यह सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए को प्रस्तुत करता है। ब्राह्मणेत्तर (श्रमणिक) नजरिये से हमें परिचित नहीं कराता, इसलिए ऐसी कोई अवधारणा बनाना कि समाज में इन नियमों का शब्दशः पालन होता रहा होगा गलत होगा। वास्तविक समाज निश्चय ही इन ग्रन्थों की अपेक्षाओं के आदर्श समाज से अलग रहा होगा। निम्नलिखित में से किसे इस समाज का अंग नहीं माना गया था?

प्राचीन भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति से सम्बन्धित अधिकांश अकादमिक अध्ययन ब्राह्मण साहित्य पर आधारित है। इस साहित्य में धार्मिक और वैधानिक बिन्दुओं पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है। धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पादित करने का अधिकार, कर्मकाण्ड-सम्पादन का उद्देश्य, विधवाओं के अधिकार, पुनर्विवाह, नियोग संस्था की प्रासंगिकता, सम्पत्ति का अधिकार आदि कुछ ऐसे उल्लेखनीय बिन्दु हैं, जिन पर विशद् चर्चा की गई है। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, सार्वजनिक गतिविधियाँ सामाजिक समारोहों में उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा परिवार को केन्द्र में रखकर, परिवार के सदस्य के रूप में पारिवारिक भूमिकाओं के निर्वहन के सन्दर्भ में की गई है। ज्यादातर उल्लेख पत्नी की भूमिका और पली के रूप में दिए जाने वाले अधिकार से सम्बन्धित हैं। ऐसे सन्दर्भ न के बराबर हैं, जिनमें समाज के एक स्वतन्त्र सदस्य के रूप में स्त्री अधिकारों की चर्चा की गई हो या उस पर विचार-विमर्श किया गया हो। गणिकाओं को इस सन्दर्भ में अपवाद माना जा सकता है, किन्तु ब्राह्मण साहित्य पितृवंशीय समाज में स्त्री अधिकारों को सन्दर्भित करता है। गणिकाओं को इस समाज का अंग नहीं माना गया है। चूंकि स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का ये पूरा प्रारम्भिक विवेचन ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित था, इसलिए यह सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए को प्रस्तुत करता है। ब्राह्मणेत्तर (श्रमणिक) नजरिये से हमें परिचित नहीं कराता, इसलिए ऐसी कोई अवधारणा बनाना कि समाज में इन नियमों का शब्दशः पालन होता रहा होगा गलत होगा। वास्तविक समाज निश्चय ही इन ग्रन्थों की अपेक्षाओं के आदर्श समाज से अलग रहा होगा। स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं

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