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बाल-मस्तिष्क की प्रकृति की यह माँग होती है कि बच्चे का बौद्धिक विकास विचारों के स्रोत के पास हो। दूसरे शब्दों में, यह ठोस, वास्तविक बिम्बों के बीच और सर्वप्रथम प्रकृति की गोद में हो, जहाँ बच्चा ठोस बिम्ब को देखे, सुने और फिर उसका विचार इस बिम्ब के बारे में प्राप्त सूचना के 'संसाधन' के काम में लगे। जब बच्चे को प्रकृति से दूर रखा जाता है, जब बच्चा पढ़ाई के पहले दिन से ही केवल शब्दों के रूप में सारा ज्ञान और बोध पाता है, तो उसके मस्तिष्क की कोशिकाएं जल्दी ही थक जाती है और अध्यापक द्वारा प्रस्तुत काम को निभा नहीं पाती और इन कोशिकाओं को तो अभी विकसित, सशक्त, सुदृढ़ होना है। यही पर उस बात का कारण छिपा है, जो प्राथमिक कक्षाओं में अक्सर देखने में आती है-बच्चा चुपचाप बैठा अध्यापक की आँखों में आँखें डाले देखता है, मानो बड़े ध्यान से सुन रहा हो, लेकिन वास्तव में वह एक शब्द भी नहीं समझ पाता, क्योक बच्चे को नियमों पर सोच-विचार करना पड़ता है, और ये सब अमूर्त सामान्यीकृत बातें होती हैं। जब बच्चे को प्रकृति से दूर रखा जाता है .....!" वाक्य के रेखांकित अंश में कौन-सा कारक है?

जीवन में बहुत अंधकार है और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है। कुछ लोग इस अंधकार को स्वीकार कर लेते हैं और तब उनके भीतर जो प्रकाश तक पहुँचने और पाने की आकांक्षा थी, वह । क्रमशः क्षीण होती जाती है। मैं अंधकार को इस स्वीकृति को मनुष्यों ही का सबसे बड़ा पाप कहता हूँ। यह मनुष्य का स्वयं अपने प्रति किया । गया अपराध है। उसके दूसरों के प्रति किए गए अपराधों का जन्म इस मूल पाप से ही होता है। यह समर्पण रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह किसी के भी प्रति कोई पाप न नहीं कर.सकता है। किन्तु कुछ लोग अंधकार के स्वीकार से बचने । के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है। जब व्यक्ति स्वयं के प्रति किए गए अन्याय, शोषण के विरुद्ध आवाज नहीं उठाता तो

जीवन में बहुत अंधकार है और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है। कुछ लोग इस अंधकार को स्वीकार कर लेते हैं और तब उनके भीतर जो प्रकाश तक पहुँचने और पाने की आकांक्षा थी, वह । क्रमशः क्षीण होती जाती है। मैं अंधकार को इस स्वीकृति को मनुष्यों ही का सबसे बड़ा पाप कहता हूँ। यह मनुष्य का स्वयं अपने प्रति किया । गया अपराध है। उसके दूसरों के प्रति किए गए अपराधों का जन्म इस मूल पाप से ही होता है। यह समर्पण रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह किसी के भी प्रति कोई पाप न नहीं कर.सकता है। किन्तु कुछ लोग अंधकार के स्वीकार से बचने । के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है। ''_____ और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है।" वाक्य में निपात है

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