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सरल लोलक किसे कहते हैं ? इसके आवर्तकाल क...

सरल लोलक किसे कहते हैं ? इसके आवर्तकाल का सूत्र स्थापित कीजिए | | 11 | दोलन | PHYSICS | SHIVLAA...

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बच्चों का सक्रिय शब्दकोष किसे कहते हैं

भारतीय साहित्य भारतीय संस्कृति के आधार पर विकसित हुआ है। इस संस्कृति में भारतीयता के बीज समाहित हैं। जब कभी-भी भारतीय अपनी पहचान का व्याख्यान करने को उत्सुक होता है, उसे अपनी जड़ से जोड़कर देखना चाहता है। यह केवल भारत व भारतीय के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि किसी भी देश के प्रान्त से जुड़ा हुआ मसला है। अपने को अन्य से 5 जोड़कर तर्क दिए जाते हैं। उसे अपनी जड़ से जोड़कर ही देखते हैं। वर्तमान में भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बीच उपजी हुई विषय वस्तु को ही आधार बनाकर अपनी पहचान को जोड़ते हैं, जिसके कारण दक्षिण भारतीय या उत्तर भारतीय सभी भारतीय संस्कृति को टूटी कड़ियों से जोड़कर अपने आपको अलग स्थापित करते हैं। इसका परिणाम भारतीय स्तर पर विखण्डन के रूप में भी देखने को मिलता है। इस परिणाम के तहत भाषा व संस्कृति के आधार पर विभिन्न प्रान्तों का निर्माण भी सम्भव हो गया। यदि यही विखण्डित समाज भारतीय संस्कृति के मूल से जोड़कर अपने।को देखता होता तो भाषायी एकता भी बनती और क्षेत्रवाद का काला धुआँ, जो भारतीय आकाश पर मण्डरा रहा है, उसकी उत्पत्ति ही सम्भव नहीं हो पाती। इस सन्दर्भ में भारतीयता व उसके समीप उपजे साहित्य को सीमाओं में जाँचना जरूरी है। इसकी प्रकृति की खोज और इसके परिणामों की व्याख्या भारतीय साहित्य व भारतीयता के सन्दर्भ में खोजनी होंगी। भारतीयता के सन्दर्भ में साहित्य और समाज के सम्बन्धों को समझना आवश्यक है। साहित्य का जन्म समाज में ही सम्भव हो सकता है, इसलिए मानवीय संवेदनाओं को हम उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम से समझ सकते हैं। यह अभिव्यक्ति समाज और काल में अलग-अलग रूपों में प्रकट हुई है। यदि हम पाषाण काल के खण्डों और उसके वन में ही रहने वालों की स्थिति को देखें, तो उनके विचार शब्दों में नहीं, बल्कि रेखाचित्रों में देखने को मिलते हैं। कई गुफाओं में इन समाजों की अभिव्यक्ति को पत्थर पर खुदे निशानों में देख सकते हैं। ये निशान उनके जन-जीवन में घटने वाली घटनाओं को प्रदर्शित करते नजर आते हैं। उनमें शिकार करते आदिमानव को देख सकते हैं, जो जीवन-यापन के साधन हैं। उन चित्रों में हल चलाने वाले किसानों की अभिव्यक्ति नहीं मिलती। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह समाज वनाचरण व्यवस्था में ही सिमटी या उनका जीवन-यापन शिकार पर ही केन्द्रित या सभ्यता के विकास की गाथा उसके जीवन में नहीं गाई जा रही थी, लेकिन समय की पहली धारा में जो प्रभाव देखे जाते हैं, वह सभ्यता के रूप में गिरे पड़े टूटे-फूटे प्राप्त ऐतिहासिक खोज में देख सकते हैं। भारतीयता को समझने के लिए निम्नलिखित में से किसे समझना आवश्यक है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के ज़रिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं- अरे, सीखने का कितना खुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं, वगैरह। मगर अब ये खुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अक्सर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजें मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज़ को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए 'दो' समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज़ के 'दो' होने का क्या मतलब है? 'गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है' का आशय है

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के ज़रिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं- अरे, सीखने का कितना खुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं, वगैरह। मगर अब ये खुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अक्सर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजें मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज़ को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए 'दो' समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज़ के 'दो' होने का क्या मतलब है? 'अमूर्त का विलोम है