Home
Class
BIOLOGY
জীবনে সফলতা পাওয়া का मूल মন্ত্র ? @Yoge...

জীবনে সফলতা পাওয়া का मूल মন্ত্র ? @Yogeshsirbiology #motivation #neet2023 #biologyclass12

Promotional Banner

Similar Questions

Explore conceptually related problems

The compound interest for two years at 12% per annum is Rs477. What is the Principal amount (in Rs) invested? 12% प्रति वर्ष की दर से दो वर्षों का चक्रवृद्धि ब्याज 477 रुपये है | निवेश किया गया मूल धन ( रुपये में ) ज्ञात करें |

Two numbers are in the ratio 4:9. If both the numbers are increased by 12, the ratio becomes 11:21, the sum of the original numbers is: दो संख्याएँ 4 : 9 के अनुपात में है | यदि दोनों संख्याओं में 12 की वृद्धि होती है, तो अनुपात 11 : 21 हो जाता है | मूल संख्याओं का योग है :

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। नव उदारवाद का प्रभाव हो सकता है

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। लेखक प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से क्या कहना चाहता है?

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। इतिहास के अन्त की घोषणा किसने की थी?

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। ट्रिनिटी कॉलेज कहाँ है?

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। टॉमस एल. फ्रिडमैन किस समाचार-पत्र में स्तम्भ लिखते थे?

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। आकाश कपूर कहाँ रहते हैं?

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। जिसका निवारण न किया जा सके, उसे कहते हैं