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निम्नांकित कथनों के सम्मुख सत्य या असत्य...

निम्नांकित कथनों के सम्मुख सत्य या असत्य जो सही हो लिखिए: (सत्य-असत्य अंकित करके)[(-6/7) +6/7]पर...

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राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं में व्यक्तिगत गुणों के अतिरिक्त संगठन में काम करने का गुण भी होना चाहिए। उनमें आज्ञापालन का भाव हो और वे अपने विकारों को राष्ट्रीय इच्छा की वेदी पर न्योछावर कर दें। जो काम हो वह संगठन के साथ। राष्ट्रीय महासभा की आकांक्षाओं का उल्लंघन कभी न किया जाए। यदि सत्य अंत:करण किसी भी तरह न माने तब भी राष्ट्रीय नेता की सम्मति अवश्य ही ले ली जाए। हम यह नहीं कह सकते कि अपने अंत:करण और विचार-शक्ति को बेच दिया जाए. परंतु हम यह अवश्य कहेंगे कि बहुत ही असाधारण अवस्थाओं को छोड़कर हमारे कार्य राष्ट्रीय महासभा के अधीन हों। व्यक्तिगत स्वतंत्रता बड़ी अच्छी चीज है - बड़ी अच्छी और अत्यंत ऊँची - परंतु राष्ट्र की स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए उसे संकुचित कर देना एक ऐसा त्याग है, जिसकी समता नहीं हो सकती, जो सब त्यागों में श्रेष्ठ है। वर्तमान परिस्थितियों में यदि किसी त्याग से तुरंत सफलता मिल सकती है, तो वह यही त्याग है। हमें आशा ही नहीं बल्कि विश्वास है कि जिन उत्साही और त्यागी आत्माओं ने सच्चे हृदय से राष्ट्रीय आहान का उत्तर दिया है, वे इस त्याग को करने में भी समर्थ होंगे। यदि अंत:करण सत्य मानने को तैयार न हो, तो किसकी सलाह लेनी चाहिए?

M is the brother of N. N is the brother of P. Q is the father of M. Based on these statements, which of the following statements cannot be definitely true? M, N का भाई है। N, P का भाई है। Q, M का पिता है। इन कथनों के आधार पर, निम्नलिखित में से कौन सा कथन निश्चित रूप से सत्य नहीं हो सकता है? (a) P is the brother of M / P, M का भाई है (b)M is the brother of P / M, P का भाई है (c)N is the son of Q / N, Q का पुत्र है (d)N is the brother of M / N, M का भाई ह

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्न संख्या 81 से 85 तक के उत्तर दीजिए: गांधीजी सत्य और अहिंसा को जीवन में सर्वाधिक महत्व देते थे, सत्याग्रह व असहयोग आंदोलन द्वारा उन्होंने अंग्रेजों का मुकाबला किया। गांधीजी सब मनुष्यों को समान मानते थे। धर्म, जाति, संप्रदाय, रंग आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को वे मानवता का कलंक मानते थे। वे आर्थिक असमानता को भी मिटा डालना चाहते थे। सामाजिक न्याय, शारीरिक श्रम को महत्व देते थे। गांधीजी प्रजातांत्रिक राज्य को कल्याणकारी मानते थे। गांधीजी के अनुसार, नैतिक आचरण का जीवन में विशेष स्थान होना चाहिए। सत्य, न्याय, धर्म, अहिंसा, अपरिग्रह, निःस्वार्थ सेवा को मानवता के लिए सच्ची सेवा मानते थे। उनके राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय विचारों में वसुधैव कुटुम्बकम का दृष्टिकोण प्रमुख था। उनकी मान्यता थी कि किसी राष्ट्र का समुचित उत्थान अपने परिवार, जाति, गांव, प्रदेश तथा देश की समस्याओं के सुधार से हो सकता है। स्वयं को सुधारों, सारा विश्व सुधरेगा उनका कहना सही था। सत्याग्रह' में कौन-सी सन्धि है?

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्न संख्या 81 से 85 तक के उत्तर दीजिए: गांधीजी सत्य और अहिंसा को जीवन में सर्वाधिक महत्व देते थे, सत्याग्रह व असहयोग आंदोलन द्वारा उन्होंने अंग्रेजों का मुकाबला किया। गांधीजी सब मनुष्यों को समान मानते थे। धर्म, जाति, संप्रदाय, रंग आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को वे मानवता का कलंक मानते थे। वे आर्थिक असमानता को भी मिटा डालना चाहते थे। सामाजिक न्याय, शारीरिक श्रम को महत्व देते थे। गांधीजी प्रजातांत्रिक राज्य को कल्याणकारी मानते थे। गांधीजी के अनुसार, नैतिक आचरण का जीवन में विशेष स्थान होना चाहिए। सत्य, न्याय, धर्म, अहिंसा, अपरिग्रह, निःस्वार्थ सेवा को मानवता के लिए सच्ची सेवा मानते थे। उनके राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय विचारों में वसुधैव कुटुम्बकम का दृष्टिकोण प्रमुख था। उनकी मान्यता थी कि किसी राष्ट्र का समुचित उत्थान अपने परिवार, जाति, गांव, प्रदेश तथा देश की समस्याओं के सुधार से हो सकता है। स्वयं को सुधारों, सारा विश्व सुधरेगा उनका कहना सही था। 'अ' उपसर्ग है

मानव के मर्मस्थल में परोपकार और त्याग जैसे सद्गुणों की जागृति । तभी हो पाती है, जब वह अपने तुच्छ भौतिक जीवन को नगण्य समझकर उत्साह-उमंग के साथ दूसरों की सेवा-सुश्रूषा तथा सत्कार करता है। यह कठोर सत्य है कि हम भौतिक रूप में इस संसार में सीमित अवधि तक ही रहेंगे। हमारी मृत्यु के बाद हमारे निकट संबंधी, मित्र, बंधु-बांधव जीवन भर हमारे लिए शोकाकुल और प्रेमाकुल भी नहीं रहेंगे। दुख मिश्रित इस निर्बल भावना पर विजय पाने के लिए तब हमारे अंतर्मन में एक विचार उठता है कि क्यों न हम अपने सत्कर्मों और सद्गुणों का प्रकाश फैलाकर सदा-सदा के लिए अमर हो जाएँ। सेवक-प्रवृत्ति अपनाकर हम ऐसा अवश्य कर सकते हैं। अपने निःस्वार्थ व्यक्तित्व और परहित कर्मों के बल पर हम हमेशा के लिए मानवीय जीवन हेतु उत्प्रेरणा बन सकते हैं । अनुपम मनुष्य जीवन को सद्गति प्रदान करने के लिए यह विचार नया नहीं है। ऐसे विचार सज्जन मनुष्यों के अंतर्मन में सदा उठते रहे हैं तथा इन्हें अपनाकर वे दुनिया में अमर भी हो गए। इस धरा पर स्थायी रूप में नहीं रहने पर भी ऐसे परहितकारी कालांतर तक पूजे जाते रहेंगे। अमूल्य मनुष्य जीवन की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा यही है। यही सीखकर 'मनुष्य का जीवन आनंदमय और समृद्धिशाली हो सकता है। । ''यदि इस प्रकार मानव जीवन उन्नत होता है तो यह संपूर्ण संसार स्वर्गिक विस्तार ग्रहण कर लेगा। किसी भी मानव को "आध्यात्मिकता का जो अंतिम ज्ञान मिलेगा, वह भी यही शिक्षा देगा कि धर्म-कर्म का उद्देश्य सत्कर्मों और सद्गुणों की ज्योति फैलाना ही है |