केंचुए के आर्थिक महत्व पर चर्चा करें। | 11 | जानवरों में संरचनात्मक संगठन | जीव विज्ञान...
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प्राचीन भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति से सम्बन्धित अधिकांश अकादमिक अध्ययन ब्राह्मण साहित्य पर आधारित है। इस साहित्य में धार्मिक और वैधानिक बिन्दुओं पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है। धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पादित करने का अधिकार, कर्मकाण्ड-सम्पादन का उद्देश्य, विधवाओं के अधिकार, पुनर्विवाह, नियोग संस्था की प्रासंगिकता, सम्पत्ति का अधिकार आदि कुछ ऐसे उल्लेखनीय बिन्दु हैं, जिन पर विशद् चर्चा की गई है। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, सार्वजनिक गतिविधियाँ सामाजिक समारोहों में उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा परिवार को केन्द्र में रखकर, परिवार के सदस्य के रूप में पारिवारिक भूमिकाओं के निर्वहन के सन्दर्भ में की गई है। ज्यादातर उल्लेख पत्नी की भूमिका और पली के रूप में दिए जाने वाले अधिकार से सम्बन्धित हैं। ऐसे सन्दर्भ न के बराबर हैं, जिनमें समाज के एक स्वतन्त्र सदस्य के रूप में स्त्री अधिकारों की चर्चा की गई हो या उस पर विचार-विमर्श किया गया हो। गणिकाओं को इस सन्दर्भ में अपवाद माना जा सकता है, किन्तु ब्राह्मण साहित्य पितृवंशीय समाज में स्त्री अधिकारों को सन्दर्भित करता है। गणिकाओं को इस समाज का अंग नहीं माना गया है। चूंकि स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का ये पूरा प्रारम्भिक विवेचन ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित था, इसलिए यह सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए को प्रस्तुत करता है। ब्राह्मणेत्तर (श्रमणिक) नजरिये से हमें परिचित नहीं कराता, इसलिए ऐसी कोई अवधारणा बनाना कि समाज में इन नियमों का शब्दशः पालन होता रहा होगा गलत होगा। वास्तविक समाज निश्चय ही इन ग्रन्थों की अपेक्षाओं के आदर्श समाज से अलग रहा होगा। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा किसको केन्द्र में रखकर की गई है?
प्राचीन भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति से सम्बन्धित अधिकांश अकादमिक अध्ययन ब्राह्मण साहित्य पर आधारित है। इस साहित्य में धार्मिक और वैधानिक बिन्दुओं पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है। धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पादित करने का अधिकार, कर्मकाण्ड-सम्पादन का उद्देश्य, विधवाओं के अधिकार, पुनर्विवाह, नियोग संस्था की प्रासंगिकता, सम्पत्ति का अधिकार आदि कुछ ऐसे उल्लेखनीय बिन्दु हैं, जिन पर विशद् चर्चा की गई है। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, सार्वजनिक गतिविधियाँ सामाजिक समारोहों में उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा परिवार को केन्द्र में रखकर, परिवार के सदस्य के रूप में पारिवारिक भूमिकाओं के निर्वहन के सन्दर्भ में की गई है। ज्यादातर उल्लेख पत्नी की भूमिका और पली के रूप में दिए जाने वाले अधिकार से सम्बन्धित हैं। ऐसे सन्दर्भ न के बराबर हैं, जिनमें समाज के एक स्वतन्त्र सदस्य के रूप में स्त्री अधिकारों की चर्चा की गई हो या उस पर विचार-विमर्श किया गया हो। गणिकाओं को इस सन्दर्भ में अपवाद माना जा सकता है, किन्तु ब्राह्मण साहित्य पितृवंशीय समाज में स्त्री अधिकारों को सन्दर्भित करता है। गणिकाओं को इस समाज का अंग नहीं माना गया है। चूंकि स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का ये पूरा प्रारम्भिक विवेचन ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित था, इसलिए यह सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए को प्रस्तुत करता है। ब्राह्मणेत्तर (श्रमणिक) नजरिये से हमें परिचित नहीं कराता, इसलिए ऐसी कोई अवधारणा बनाना कि समाज में इन नियमों का शब्दशः पालन होता रहा होगा गलत होगा। वास्तविक समाज निश्चय ही इन ग्रन्थों की अपेक्षाओं के आदर्श समाज से अलग रहा होगा। ब्राह्मण साहित्य में स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी उल्लेख किससे सम्बन्धित हैं?
प्राचीन भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति से सम्बन्धित अधिकांश अकादमिक अध्ययन ब्राह्मण साहित्य पर आधारित है। इस साहित्य में धार्मिक और वैधानिक बिन्दुओं पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है। धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पादित करने का अधिकार, कर्मकाण्ड-सम्पादन का उद्देश्य, विधवाओं के अधिकार, पुनर्विवाह, नियोग संस्था की प्रासंगिकता, सम्पत्ति का अधिकार आदि कुछ ऐसे उल्लेखनीय बिन्दु हैं, जिन पर विशद् चर्चा की गई है। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, सार्वजनिक गतिविधियाँ सामाजिक समारोहों में उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा परिवार को केन्द्र में रखकर, परिवार के सदस्य के रूप में पारिवारिक भूमिकाओं के निर्वहन के सन्दर्भ में की गई है। ज्यादातर उल्लेख पत्नी की भूमिका और पली के रूप में दिए जाने वाले अधिकार से सम्बन्धित हैं। ऐसे सन्दर्भ न के बराबर हैं, जिनमें समाज के एक स्वतन्त्र सदस्य के रूप में स्त्री अधिकारों की चर्चा की गई हो या उस पर विचार-विमर्श किया गया हो। गणिकाओं को इस सन्दर्भ में अपवाद माना जा सकता है, किन्तु ब्राह्मण साहित्य पितृवंशीय समाज में स्त्री अधिकारों को सन्दर्भित करता है। गणिकाओं को इस समाज का अंग नहीं माना गया है। चूंकि स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का ये पूरा प्रारम्भिक विवेचन ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित था, इसलिए यह सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए को प्रस्तुत करता है। ब्राह्मणेत्तर (श्रमणिक) नजरिये से हमें परिचित नहीं कराता, इसलिए ऐसी कोई अवधारणा बनाना कि समाज में इन नियमों का शब्दशः पालन होता रहा होगा गलत होगा। वास्तविक समाज निश्चय ही इन ग्रन्थों की अपेक्षाओं के आदर्श समाज से अलग रहा होगा। स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं
प्राचीन भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति से सम्बन्धित अधिकांश अकादमिक अध्ययन ब्राह्मण साहित्य पर आधारित है। इस साहित्य में धार्मिक और वैधानिक बिन्दुओं पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है। धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पादित करने का अधिकार, कर्मकाण्ड-सम्पादन का उद्देश्य, विधवाओं के अधिकार, पुनर्विवाह, नियोग संस्था की प्रासंगिकता, सम्पत्ति का अधिकार आदि कुछ ऐसे उल्लेखनीय बिन्दु हैं, जिन पर विशद् चर्चा की गई है। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, सार्वजनिक गतिविधियाँ सामाजिक समारोहों में उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा परिवार को केन्द्र में रखकर, परिवार के सदस्य के रूप में पारिवारिक भूमिकाओं के निर्वहन के सन्दर्भ में की गई है। ज्यादातर उल्लेख पत्नी की भूमिका और पली के रूप में दिए जाने वाले अधिकार से सम्बन्धित हैं। ऐसे सन्दर्भ न के बराबर हैं, जिनमें समाज के एक स्वतन्त्र सदस्य के रूप में स्त्री अधिकारों की चर्चा की गई हो या उस पर विचार-विमर्श किया गया हो। गणिकाओं को इस सन्दर्भ में अपवाद माना जा सकता है, किन्तु ब्राह्मण साहित्य पितृवंशीय समाज में स्त्री अधिकारों को सन्दर्भित करता है। गणिकाओं को इस समाज का अंग नहीं माना गया है। चूंकि स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का ये पूरा प्रारम्भिक विवेचन ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित था, इसलिए यह सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए को प्रस्तुत करता है। ब्राह्मणेत्तर (श्रमणिक) नजरिये से हमें परिचित नहीं कराता, इसलिए ऐसी कोई अवधारणा बनाना कि समाज में इन नियमों का शब्दशः पालन होता रहा होगा गलत होगा। वास्तविक समाज निश्चय ही इन ग्रन्थों की अपेक्षाओं के आदर्श समाज से अलग रहा होगा। प्राचीन भारत में स्त्रियों की क्या स्थिति थी, यह जानने का स्रोत है।
प्राचीन भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति से सम्बन्धित अधिकांश अकादमिक अध्ययन ब्राह्मण साहित्य पर आधारित है। इस साहित्य में धार्मिक और वैधानिक बिन्दुओं पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है। धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पादित करने का अधिकार, कर्मकाण्ड-सम्पादन का उद्देश्य, विधवाओं के अधिकार, पुनर्विवाह, नियोग संस्था की प्रासंगिकता, सम्पत्ति का अधिकार आदि कुछ ऐसे उल्लेखनीय बिन्दु हैं, जिन पर विशद् चर्चा की गई है। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, सार्वजनिक गतिविधियाँ सामाजिक समारोहों में उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा परिवार को केन्द्र में रखकर, परिवार के सदस्य के रूप में पारिवारिक भूमिकाओं के निर्वहन के सन्दर्भ में की गई है। ज्यादातर उल्लेख पत्नी की भूमिका और पली के रूप में दिए जाने वाले अधिकार से सम्बन्धित हैं। ऐसे सन्दर्भ न के बराबर हैं, जिनमें समाज के एक स्वतन्त्र सदस्य के रूप में स्त्री अधिकारों की चर्चा की गई हो या उस पर विचार-विमर्श किया गया हो। गणिकाओं को इस सन्दर्भ में अपवाद माना जा सकता है, किन्तु ब्राह्मण साहित्य पितृवंशीय समाज में स्त्री अधिकारों को सन्दर्भित करता है। गणिकाओं को इस समाज का अंग नहीं माना गया है। चूंकि स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का ये पूरा प्रारम्भिक विवेचन ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित था, इसलिए यह सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए को प्रस्तुत करता है। ब्राह्मणेत्तर (श्रमणिक) नजरिये से हमें परिचित नहीं कराता, इसलिए ऐसी कोई अवधारणा बनाना कि समाज में इन नियमों का शब्दशः पालन होता रहा होगा गलत होगा। वास्तविक समाज निश्चय ही इन ग्रन्थों की अपेक्षाओं के आदर्श समाज से अलग रहा होगा। निम्नलिखित में से किसे इस समाज का अंग नहीं माना गया था?
प्राचीन भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति से सम्बन्धित अधिकांश अकादमिक अध्ययन ब्राह्मण साहित्य पर आधारित है। इस साहित्य में धार्मिक और वैधानिक बिन्दुओं पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है। धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पादित करने का अधिकार, कर्मकाण्ड-सम्पादन का उद्देश्य, विधवाओं के अधिकार, पुनर्विवाह, नियोग संस्था की प्रासंगिकता, सम्पत्ति का अधिकार आदि कुछ ऐसे उल्लेखनीय बिन्दु हैं, जिन पर विशद् चर्चा की गई है। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, सार्वजनिक गतिविधियाँ सामाजिक समारोहों में उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा परिवार को केन्द्र में रखकर, परिवार के सदस्य के रूप में पारिवारिक भूमिकाओं के निर्वहन के सन्दर्भ में की गई है। ज्यादातर उल्लेख पत्नी की भूमिका और पली के रूप में दिए जाने वाले अधिकार से सम्बन्धित हैं। ऐसे सन्दर्भ न के बराबर हैं, जिनमें समाज के एक स्वतन्त्र सदस्य के रूप में स्त्री अधिकारों की चर्चा की गई हो या उस पर विचार-विमर्श किया गया हो। गणिकाओं को इस सन्दर्भ में अपवाद माना जा सकता है, किन्तु ब्राह्मण साहित्य पितृवंशीय समाज में स्त्री अधिकारों को सन्दर्भित करता है। गणिकाओं को इस समाज का अंग नहीं माना गया है। चूंकि स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का ये पूरा प्रारम्भिक विवेचन ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित था, इसलिए यह सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए को प्रस्तुत करता है। ब्राह्मणेत्तर (श्रमणिक) नजरिये से हमें परिचित नहीं कराता, इसलिए ऐसी कोई अवधारणा बनाना कि समाज में इन नियमों का शब्दशः पालन होता रहा होगा गलत होगा। वास्तविक समाज निश्चय ही इन ग्रन्थों की अपेक्षाओं के आदर्श समाज से अलग रहा होगा। 'निर्वहन' में कौन-सा उपसर्ग है?
प्राचीन भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति से सम्बन्धित अधिकांश अकादमिक अध्ययन ब्राह्मण साहित्य पर आधारित है। इस साहित्य में धार्मिक और वैधानिक बिन्दुओं पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है। धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पादित करने का अधिकार, कर्मकाण्ड-सम्पादन का उद्देश्य, विधवाओं के अधिकार, पुनर्विवाह, नियोग संस्था की प्रासंगिकता, सम्पत्ति का अधिकार आदि कुछ ऐसे उल्लेखनीय बिन्दु हैं, जिन पर विशद् चर्चा की गई है। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, सार्वजनिक गतिविधियाँ सामाजिक समारोहों में उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के आकलन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। स्त्रियों के अधिकार सम्बन्धी अधिकांश चर्चा परिवार को केन्द्र में रखकर, परिवार के सदस्य के रूप में पारिवारिक भूमिकाओं के निर्वहन के सन्दर्भ में की गई है। ज्यादातर उल्लेख पत्नी की भूमिका और पली के रूप में दिए जाने वाले अधिकार से सम्बन्धित हैं। ऐसे सन्दर्भ न के बराबर हैं, जिनमें समाज के एक स्वतन्त्र सदस्य के रूप में स्त्री अधिकारों की चर्चा की गई हो या उस पर विचार-विमर्श किया गया हो। गणिकाओं को इस सन्दर्भ में अपवाद माना जा सकता है, किन्तु ब्राह्मण साहित्य पितृवंशीय समाज में स्त्री अधिकारों को सन्दर्भित करता है। गणिकाओं को इस समाज का अंग नहीं माना गया है। चूंकि स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का ये पूरा प्रारम्भिक विवेचन ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित था, इसलिए यह सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए को प्रस्तुत करता है। ब्राह्मणेत्तर (श्रमणिक) नजरिये से हमें परिचित नहीं कराता, इसलिए ऐसी कोई अवधारणा बनाना कि समाज में इन नियमों का शब्दशः पालन होता रहा होगा गलत होगा। वास्तविक समाज निश्चय ही इन ग्रन्थों की अपेक्षाओं के आदर्श समाज से अलग रहा होगा। 'वास्तविक' का विपरीतार्थक शब्द है
In the following question, select the number which can be placed at the sign of question mark (?) from the given alternatives. निम्नलिखित प्रश्न में, उस नंबर का चयन करें जिसे दिए गए विकत्यों में से प्रश्न चिह्न (?) के चिह्न पर रखा जा सकता है।
In the following question, select the number which can be placed at the sign of question mark (?) from the given alternatives. निम्नलिखित प्रश्न में, उस नंबर का चयन करें जिसे दिए गए विकत्यों में से प्रश्न चिह्न (?) के चिह्न पर रखा जा सकता है।
In the following question, select the number which can be placed at the sign of question mark (?) from the given alternatives. निम्नलिखित प्रश्न में, उस नंबर का चयन करें जिसे दिए गए विकत्यों में से प्रश्न चिह्न (?) के चिह्न पर रखा जा सकता है।
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