डीएनए आनुवंशिक पदार्थ है, इसे सिद्ध करने हेतु अपने प्रयोग के दौरान हर्षे व चेस ने डीएनए व प्रोटी...
डीएनए आनुवंशिक पदार्थ है, इसे सिद्ध करने हेतु अपने प्रयोग के दौरान हर्षे व चेस ने डीएनए व प्रोटी...
Similar Questions
Explore conceptually related problems
डीएनए |आनुवंशिक पदार्थ की खोज |आनुवंशिक पदार्थ DNA है|OMR
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मनु बहन ने पूरे दिन की डायरी लिखी, लेकिन एक जगह लिख दिया, 'सफाई वगैरह की। गांधीजी प्रतिदिन डायरी पढ़कर उस पर अपने हस्ताक्षर करते थे। आज की डायरी पर हस्ताक्षर करते हुए गांधीजी ने लिखा,कातने की गति का हिसाब लिखा जाए। मन में आए हुए विचार लिखे जाएं। जो-जो पढ़ा हो, उसकीटिप्पणी लिखी जाए। जिसने जो पढ़ा हो, वह लिखा जाए। ऐसा करने से पढ़ा हुआ कितना पच गया है, यह मालूम हो जाएगा, जो'वगैरह' का उपयोग नहीं होना चाहिए। डायरी में 'वगैरह' शब्द के लिए कोई स्थान नहीं है" जिसने जो पढ़ा हो, वह लिखा जाए। ऐसा करने से पढ़ा हुआ कितना पच गया है, यह मालूम हो जाएगा, जो बातें हुई हों वे लिखी जाए। मनु ने अपनी गलती का अहसास किया और डायरी विधा की पवित्रता को समझा। गांधीजी ने पुनः मनु से कहा-"डायरी लिखना आसान कार्य नहीं है। यह इबादत करने जैसी विधा है। हमें शुद्ध व सच्चे रूप से प्रत्येक छोटी-बड़ी घटना को निष्पक्ष रूप से लिखना चाहिए चाहे कोई बात हमारे विरुद्ध ही क्यों न जा रही हो। इससे हममेंसच्चाई स्वीकार करने की शक्ति प्राप्त होगी। गांधीजी ने 'वगैरह' शब्द पर अपनी आपत्ति क्यों जताई?
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मनु बहन ने पूरे दिन की डायरी लिखी, लेकिन एक जगह लिख दिया, 'सफाई वगैरह की। गांधीजी प्रतिदिन डायरी पढ़कर उस पर अपने हस्ताक्षर करते थे। आज की डायरी पर हस्ताक्षर करते हुए गांधीजी ने लिखा,कातने की गति का हिसाब लिखा जाए। मन में आए हुए विचार लिखे जाएं। जो-जो पढ़ा हो, उसकीटिप्पणी लिखी जाए। जिसने जो पढ़ा हो, वह लिखा जाए। ऐसा करने से पढ़ा हुआ कितना पच गया है, यह मालूम हो जाएगा, जो'वगैरह' का उपयोग नहीं होना चाहिए। डायरी में 'वगैरह' शब्द के लिए कोई स्थान नहीं है" जिसने जो पढ़ा हो, वह लिखा जाए। ऐसा करने से पढ़ा हुआ कितना पच गया है, यह मालूम हो जाएगा, जो बातें हुई हों वे लिखी जाए। मनु ने अपनी गलती का अहसास किया और डायरी विधा की पवित्रता को समझा। गांधीजी ने पुनः मनु से कहा-"डायरी लिखना आसान कार्य नहीं है। यह इबादत करने जैसी विधा है। हमें शुद्ध व सच्चे रूप से प्रत्येक छोटी-बड़ी घटना को निष्पक्ष रूप से लिखना चाहिए चाहे कोई बात हमारे विरुद्ध ही क्यों न जा रही हो। इससे हममेंसच्चाई स्वीकार करने की शक्ति प्राप्त होगी। डायरी लिखना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। 'महानायक' में कौन-सा समास है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। महात्मा गाँधी ने किसे अगोचर माना है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। ये सभी महात्मा गाँधी ने स्वयं को किसका सेवक कहा है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। प्रस्तुत गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से क्या हो सकता है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। गुरुदेव ने किसे भिखारी जैसा माना है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। गाँधीजी ने किस क्षेत्र में विशेष उपलब्धियाँ अर्जित की?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। 'स्वतन्त्रता आन्दोलन' यदि एक नाटक था, तो इसका नायक कौन था?
Recommended Questions
- डीएनए आनुवंशिक पदार्थ है, इसे सिद्ध करने हेतु अपने प्रयोग के दौरान हर्...
Text Solution
|
- डीएनए फिंगर प्रिंटिंग
Text Solution
|
- डीएनए फिंगर प्रिंटिंग
Text Solution
|
- आनुवंशिक पदार्थ के गुण , Rna संसार
Text Solution
|
- पुनर्योगज डीएनए प्रद्योगिकी के प्रक्रम
Text Solution
|
- आर-डीएनए | पुनर्योगज डीएनए तकनीक | आनुवंशिक इंजीनियरिंग | जैव प्रौद्यो...
Text Solution
|
- पुनर्योगज डीएनए का चरण | आनुवंशिक इंजीनियरिंग के उपकरण
Text Solution
|
- डीएनए |OMR
Text Solution
|
- डीएनए |डीएनए कुंडली की पैकेजिंग|OMR
Text Solution
|