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एपिथीलियमी ऊतक कहाँ पाया जाता है ? | 9 ...

एपिथीलियमी ऊतक कहाँ पाया जाता है ? | 9 | ऊतक | BIOLOGY | BHARATI BHAWAN | Doubtnut

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Train A takes 9 hours more than train B to cover a distance of 612 km. If its speed is doubled then it takes 3 hours less than the time taken by train B. The speed of the train B is : 612 km की यात्रा करने के लिए ट्रेन B की तुलना में, ट्रेन A 9 घंटे अधिक समय लेती है | यदि ट्रेन की गति को दोगुना किया जाता है, तो वह ट्रेन B की तुलना में 3 घंटे का समय कम लेती है | ट्रेन B की गति km/h में) है:-

A right circular solid cone of radius 3.2 cm and height 7.2 cm is melted and recast into a right circular cylinder of height 9.6 cm. What is the diameter of the base of the cylinder ? 3.2 सेमी त्रिज्या और 7.2 सेमी ऊंचाई वाले एक लम्ब वृत्तीय ठोस शंकु को पिघलाया जाता है तथा 9.6 सेमी ऊँचाई वाला एक लम्ब वृत्तीय बेलन बनाया जाता है | बेलन के आधार का व्यास कितना है ?

A 9 cm solid metallic cube and a solid metallic cuboid having dimensions 5 cm, 13cm, 31cm are melted and recast into a single cube. What is the total surface area(in cm^2 ) of the new cube? 5 सेमी, 13 सेमी, 31 सेमी आयाम वाले घनाभ और 9 सेमी ठोस धातु घन को पिघलाया जाता है और एक ही घन में पुनर्गठित किया जाता है। नए घन का कुल क्षेत्रफल ( cm^2 में) क्या है?

A 9cm solid metallic cube and a solid metallic cuboid having dimensions 5 cm, 13cm, 31cm are melted and recast into a single cube. How much (in Rs.) is the cost to polish the new cube at the rate of Rs.10 per cm^2 5 सेमी, 13 सेमी, 31 सेमी आयाम वाले घनाभ और 9 सेमी ठोस धातु घन को पिघलाया जाता है और एक ही घन में पुनर्गठित किया जाता है। Rs.10 प्रति cm^2 की दर से नए घन को पॉलिश करने की लागत क्या होगी

A sphere of radius 9 cm is melted and recast into small spheres of radius 2 cm each. How many such sphere can be made? 9 सेमी त्रिज्या वाले एक गोले को पिघलाया जाता है और 2 सेमी त्रिज्या वाले गोले बनाए जाते हैं | ऐसे कितने गोले का निर्माण किया जा सकता है ?

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये गद्यांश धर्म पालन करने के मार्ग में सबसे अधिक बाधा चित की चंचलता, उद्देश्य की अस्थिरता और मन की निर्बलता से पड़ती है। मनुष्य के कर्तव्य मार्ग में एक ओर तो आत्मा के बुरे-भले कामों का ज्ञान और दूसरी ओर आलस्य और स्वार्थपरता रहती है। बस, मनुष्य इन्हीं दोनों के बीच में पड़ा रहा है। अंत में यदि उस का मन पक्का हुआ तो वह आत्मा की आज्ञा मानकर अपना धर्म पालन करता है पर यदि उसका मन दुविधा में पड़ा रहा है तो स्वार्थपरता उसे निश्चित ही परेगी और उसका चरित्र घृणा के योग्य हो जाएगा। इसीलिए यह बहुत आवश्यक है कि आत्मा जिस बात को करने की प्रवृत्ति दे, उसे बिना स्वार्थन सोचे, झटपट कर डालना चाहिए। इस संसार में जितने बड़े-बड़े लोग हुए हैं, सभी ने अपने कर्तव्य को सबसे श्रेष्ठ माना है क्योंकि जितने कर्म उन्होंने किए उन सबने अपने कर्तव्य पर ध्यान देकर न्याय का बर्ताव किया। जिन जातियों में यह गुण पाया जाता है। वे ही संसार में उन्नति करती हैं और संसार में उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। जो लोग स्वार्थी होकर अपने कर्तव्य पर ध्यान नहीं देते, वे संसार में लज्जित होते हैं और सब लोग उनसे घृणा करते हैं। कर्तव्य पालन और सत्यता में बड़ा घनिष्ठ संबंध है। जो मनुष्य अपना कर्तव्य पालन करता है वह अपने कामों और वचनों में सत्यता का बर्ताव भी रखता है। सत्यता ही एक ऐसी वस्तु है जिसमें इस संसार में मनुष्य अपने कार्यों में सफलता पा सकता है क्योंकि संसार में कोई काम झूठ बोलने से नहीं चल सकता। झूठ की उत्पति पाप, कुटिलता और कायरता से होती है। झूठ बोलना कई रूपों में दीख पड़ता है, जैसे चुप रहना, किसी बात को बढ़ा कर कहना, किसी बात को छिपाना, झूठ-मूठ दूसरों की हां में हां मिलाना आदि। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो मुंह देखी बातें बनाया करते हैं, पर करते वहीं हैं जो उन्हें रुचता हैं। ऐसे लोग मन में समझते हैं कि कैसे सब को मूर्ख बनाकर हमने अपना काम कर लिया, पर वास्तव में वे अपने को ही मूर्ख बनाते हैं और अंत में उनकी पोल खुल जाने पर समाज के लोग उनसे घृणा करते हैं। धर्म पालन करने में बाधा डालती है

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये गद्यांश धर्म पालन करने के मार्ग में सबसे अधिक बाधा चित की चंचलता, उद्देश्य की अस्थिरता और मन की निर्बलता से पड़ती है। मनुष्य के कर्तव्य मार्ग में एक ओर तो आत्मा के बुरे-भले कामों का ज्ञान और दूसरी ओर आलस्य और स्वार्थपरता रहती है। बस, मनुष्य इन्हीं दोनों के बीच में पड़ा रहा है। अंत में यदि उस का मन पक्का हुआ तो वह आत्मा की आज्ञा मानकर अपना धर्म पालन करता है पर यदि उसका मन दुविधा में पड़ा रहा है तो स्वार्थपरता उसे निश्चित ही परेगी और उसका चरित्र घृणा के योग्य हो जाएगा। इसीलिए यह बहुत आवश्यक है कि आत्मा जिस बात को करने की प्रवृत्ति दे, उसे बिना स्वार्थन सोचे, झटपट कर डालना चाहिए। इस संसार में जितने बड़े-बड़े लोग हुए हैं, सभी ने अपने कर्तव्य को सबसे श्रेष्ठ माना है क्योंकि जितने कर्म उन्होंने किए उन सबने अपने कर्तव्य पर ध्यान देकर न्याय का बर्ताव किया। जिन जातियों में यह गुण पाया जाता है। वे ही संसार में उन्नति करती हैं और संसार में उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। जो लोग स्वार्थी होकर अपने कर्तव्य पर ध्यान नहीं देते, वे संसार में लज्जित होते हैं और सब लोग उनसे घृणा करते हैं। कर्तव्य पालन और सत्यता में बड़ा घनिष्ठ संबंध है। जो मनुष्य अपना कर्तव्य पालन करता है वह अपने कामों और वचनों में सत्यता का बर्ताव भी रखता है। सत्यता ही एक ऐसी वस्तु है जिसमें इस संसार में मनुष्य अपने कार्यों में सफलता पा सकता है क्योंकि संसार में कोई काम झूठ बोलने से नहीं चल सकता। झूठ की उत्पति पाप, कुटिलता और कायरता से होती है। झूठ बोलना कई रूपों में दीख पड़ता है, जैसे चुप रहना, किसी बात को बढ़ा कर कहना, किसी बात को छिपाना, झूठ-मूठ दूसरों की हां में हां मिलाना आदि। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो मुंह देखी बातें बनाया करते हैं, पर करते वहीं हैं जो उन्हें रुचता हैं। ऐसे लोग मन में समझते हैं कि कैसे सब को मूर्ख बनाकर हमने अपना काम कर लिया, पर वास्तव में वे अपने को ही मूर्ख बनाते हैं और अंत में उनकी पोल खुल जाने पर समाज के लोग उनसे घृणा करते हैं। संसार के बड़े-बड़े लोगों ने सबसे श्रेष्ठ माना है