सामाजिक विज्ञान के नोट्स कैसे बनाये ?? एसएसटी नोट्स कैसे बनाएं? कक्षा 10 एसएसटी | अमित सर #कक्षा10बोर्ड
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पिछली कक्षा का विवरण|धात्विक ऑक्साइड की अम्ल के साथ अभिक्रिया|अधात्विक ऑक्साइड और क्षार|अम्ल एवं क्षारक परस्पर कैसे अभिक्रिया करते हैं|अम्ल तथा क्षारकों में समानताए|जलीय विलयन में अम्ल या क्षारक का क्या होता हैं|जल के साथ अम्लों तथा क्षारकों का व्यवहार
पिछली कक्षा का विवरण|धात्विक ऑक्साइड की अम्ल के साथ अभिक्रिया|अधात्विक ऑक्साइड और क्षार|अम्ल एवं क्षारक परस्पर कैसे अभिक्रिया करते हैं|अम्ल तथा क्षारकों में समानताए|जलीय विलयन में अम्ल या क्षारक का क्या होता हैं|जल के साथ अम्लों तथा क्षारकों का व्यवहार
मेरे बड़े भाई साहब मुझसे पाँच साल बड़े थे, लेकिन केवल तीन दरजे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था, जब मैंने शुरू किया, लेकिन तालीम जैसे महत्त्वपूर्ण मामले में वह जल्दबाजी से काम लेना पसंद नहीं करते थे, इस भवन की बुनियाद खूब मज़बूत डालना चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुखता न हो तो मकान कैसे पायेदार बने। मैं छोटा था, वह बड़े थे। मेरी उम्र नौ साल की थी, वे चौदह साल के थे। उन्हें मेरी निगरानी का पूरा और जन्मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इस बात में थी कि मैं उनके हुक्म को कानून समझू। वह स्वभाव के बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कॉपी पर, कभी किताब के हाशियों पर, चिड़ियो, कुत्तों, बिल्लियों की डालते थे। कभी एक ही शायरी को बार-बार सुंदर अक्षरों में नकल करते थे। कभी ऐसी शब्द-रचना करते जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य। जैसे एक बार उनकी कॉपी पर मैंने इबारत देखी-स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाईयो, भाई-भाई, श्रीयुत् राधेश्याम--इनके बाद आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई हल निकालूँ, लेकिन असफल रहा ओर उनसे पूछने का साहस न हुआ। वे नवीं कक्षा में थे, मैं पाँचवी में। उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह और बड़ी बात थी। 'तालीम' शब्द है
मेरे बड़े भाई साहब मुझसे पाँच साल बड़े थे, लेकिन केवल तीन दरजे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था, जब मैंने शुरू किया, लेकिन तालीम जैसे महत्त्वपूर्ण मामले में वह जल्दबाजी से काम लेना पसंद नहीं करते थे, इस भवन की बुनियाद खूब मज़बूत डालना चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुखता न हो तो मकान कैसे पायेदार बने। मैं छोटा था, वह बड़े थे। मेरी उम्र नौ साल की थी, वे चौदह साल के थे। उन्हें मेरी निगरानी का पूरा और जन्मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इस बात में थी कि मैं उनके हुक्म को कानून समझू। वह स्वभाव के बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कॉपी पर, कभी किताब के हाशियों पर, चिड़ियो, कुत्तों, बिल्लियों की डालते थे। कभी एक ही शायरी को बार-बार सुंदर अक्षरों में नकल करते थे। कभी ऐसी शब्द-रचना करते जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य। जैसे एक बार उनकी कॉपी पर मैंने इबारत देखी-स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाईयो, भाई-भाई, श्रीयुत् राधेश्याम--इनके बाद आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई हल निकालूँ, लेकिन असफल रहा ओर उनसे पूछने का साहस न हुआ। वे नवीं कक्षा में थे, मैं पाँचवी में। उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह और बड़ी बात थी। 'सामंजस्य' शब्द का समानार्थी है।
मेरे बड़े भाई साहब मुझसे पाँच साल बड़े थे, लेकिन केवल तीन दरजे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था, जब मैंने शुरू किया, लेकिन तालीम जैसे महत्त्वपूर्ण मामले में वह जल्दबाजी से काम लेना पसंद नहीं करते थे, इस भवन की बुनियाद खूब मज़बूत डालना चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुखता न हो तो मकान कैसे पायेदार बने। मैं छोटा था, वह बड़े थे। मेरी उम्र नौ साल की थी, वे चौदह साल के थे। उन्हें मेरी निगरानी का पूरा और जन्मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इस बात में थी कि मैं उनके हुक्म को कानून समझू। वह स्वभाव के बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कॉपी पर, कभी किताब के हाशियों पर, चिड़ियो, कुत्तों, बिल्लियों की डालते थे। कभी एक ही शायरी को बार-बार सुंदर अक्षरों में नकल करते थे। कभी ऐसी शब्द-रचना करते जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य। जैसे एक बार उनकी कॉपी पर मैंने इबारत देखी-स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाईयो, भाई-भाई, श्रीयुत् राधेश्याम--इनके बाद आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई हल निकालूँ, लेकिन असफल रहा ओर उनसे पूछने का साहस न हुआ। वे नवीं कक्षा में थे, मैं पाँचवी में। उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह और बड़ी बात थी। बड़ा भाई किस अधिकार से लेखक पर निगरानी रखता है?
The total number of students in section A and B of a class is 110. The number of students in section A is 10 more than that of section B. The average score of the students in B, in a test, is 20% more than that of students in A. If the average score of all the students in the class is 72, then what is the average score of the students in A? किसी कक्षा के खंड A और खंड B के छात्रों की कुल संख्या 110 है | खंड A में छात्रों की संख्या खंड 9 के छात्रों की संख्या से 10 अधिक है| किसी परीक्षा में B के छात्रों का औसत प्राप्तंक A के छात्रों के औसत प्राप्तंक से 20% अधिक है | यदि सभी छात्रों का औसत प्राप्तांक 72 है, तो A के छात्रों का औसत प्राप्तांक ज्ञात करें |
मेरे बड़े भाई साहब मुझसे पाँच साल बड़े थे, लेकिन केवल तीन दरजे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था, जब मैंने शुरू किया, लेकिन तालीम जैसे महत्त्वपूर्ण मामले में वह जल्दबाजी से काम लेना पसंद नहीं करते थे, इस भवन की बुनियाद खूब मज़बूत डालना चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुखता न हो तो मकान कैसे पायेदार बने। मैं छोटा था, वह बड़े थे। मेरी उम्र नौ साल की थी, वे चौदह साल के थे। उन्हें मेरी निगरानी का पूरा और जन्मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इस बात में थी कि मैं उनके हुक्म को कानून समझू। वह स्वभाव के बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कॉपी पर, कभी किताब के हाशियों पर, चिड़ियो, कुत्तों, बिल्लियों की डालते थे। कभी एक ही शायरी को बार-बार सुंदर अक्षरों में नकल करते थे। कभी ऐसी शब्द-रचना करते जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य। जैसे एक बार उनकी कॉपी पर मैंने इबारत देखी-स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाईयो, भाई-भाई, श्रीयुत् राधेश्याम--इनके बाद आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई हल निकालूँ, लेकिन असफल रहा ओर उनसे पूछने का साहस न हुआ। वे नवीं कक्षा में थे, मैं पाँचवी में। उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह और बड़ी बात थी। उम्र में पांच साल का और पढ़ाई में दो कक्षाओं का अंतर बताता है कि
मेरे बड़े भाई साहब मुझसे पाँच साल बड़े थे, लेकिन केवल तीन दरजे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था, जब मैंने शुरू किया, लेकिन तालीम जैसे महत्त्वपूर्ण मामले में वह जल्दबाजी से काम लेना पसंद नहीं करते थे, इस भवन की बुनियाद खूब मज़बूत डालना चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुखता न हो तो मकान कैसे पायेदार बने। मैं छोटा था, वह बड़े थे। मेरी उम्र नौ साल की थी, वे चौदह साल के थे। उन्हें मेरी निगरानी का पूरा और जन्मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इस बात में थी कि मैं उनके हुक्म को कानून समझू। वह स्वभाव के बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कॉपी पर, कभी किताब के हाशियों पर, चिड़ियो, कुत्तों, बिल्लियों की डालते थे। कभी एक ही शायरी को बार-बार सुंदर अक्षरों में नकल करते थे। कभी ऐसी शब्द-रचना करते जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य। जैसे एक बार उनकी कॉपी पर मैंने इबारत देखी-स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाईयो, भाई-भाई, श्रीयुत् राधेश्याम--इनके बाद आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई हल निकालूँ, लेकिन असफल रहा ओर उनसे पूछने का साहस न हुआ। वे नवीं कक्षा में थे, मैं पाँचवी में। उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह और बड़ी बात थी। "मेरे भाई साहब मुझसे पांच साल बड़े थे, लेकिन केवल तीन दरजे आगे" इस वाक्य का प्रकार है
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