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अपने दैनिक जीवन में किए जाने वाले उन पाँच क्रियाकलापों की सूची बनाइए जिनमें प्राकृतिक संसाधनों क...

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गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। मनुष्य अपने विकास के लिए क्या करता है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। किस शब्द में "इक' प्रत्यय का प्रयोग नहीं हो सकता है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। निम्नलिखित में से कौन-सा संज्ञा शब्द नहीं है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। मानव की कुशलता, लगन और समर्पण पर क्या निर्भर करता है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। गांधीजी ने किस पर जोर दिया?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। गद्यांश के अनुसार कौन-सा विकास का ध्येय नहीं है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। गद्यांश के अनुसार कहा जा सकता है कि

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। भारत स्वर्णे युग दूर-दूर तक इसलिए दिखाई नहीं देता, क्योंकि

पर्यावरण प्रदूषण आज विश्वव्यापी समस्या है। वर्तमान एवं आने वाले दशकों में पृथ्वी की सम्पदा पर अधिक दबाव होगा। इस समस्या का मूल कारण है जनसंख्या की तीव्र गति से वृद्धि, प्रदूषण एवं उपलब्ध साधनों का अधिकतम प्रयोग। सहस्राब्दियों तक मनुष्य ने प्राकृतिक साधनों के साथ अपनी संगति को कायम रखा है। मानवीय सभ्यता और प्राकृतिक वैभव की युगल-बन्दी चलती रही। मनुष्य तो प्रकृति का आराधक था। प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य का उसने सुख लिया, उसके छलछलाते स्नेह से अपने को आप्लावित किया और उसके सुर से सुर मिलाकर जीवन के संगीत की रचना की, परन्तु आश्चर्य है कि आज मनुष्य अपनी लालसा, गुणात्मक जीवन और भौतिक सुख-सुविधा के लिए प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन व्यवस्थित रूप से नहीं करते हुए संरक्षण करने के बदले प्रकृति का निजी स्वार्थ हेतु विध्वन्स करने में लग गया है। आज विनाश की जो पटकथा लिखी जा रही है, उसके पीछे लालच, लूट-खसोट और लिप्सा की दृष्टि उत्तरदायी है। आज गुमराह इन्सान प्रकृति के पाँचों तत्त्वों से छेड़खानी कर रहा है। प्रकृति न तो पाषाणी है और न मूकदर्शिनी। उसे बदला लेना आता है। प्रकृति की त्यौरियाँ और तेवर बता रहे हैं कि वह बदला लेने पर आमादा है। दोनों तरफ मोर्चे खुल चुके हैं जाने कब क्या हो जाए। वन-विनाश, अन्धाधुन्ध प्रदूषण, संसाधनों का अनर्गल शोषण, नाभिकीय अस्त्रों की मूर्खतापूर्ण अन्धी दौड़ और औद्योगिक या प्रौद्योगिक उन्नति के नाम पर प्रकृति से अधिक छेड़छाड़ एवं हवा, पानी और मिट्टी जैसे प्राकृतिक साधनों के दुरुपयोग ने मनुष्य जाति को ही नहीं, सम्पूर्ण जीव-जड़ को विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है। प्राकृतिक संसाधनों के दुरुपयोग से किसका नुकसान सम्भव है?