सिद्ध कीजिए कि एक समांतर चतुर्भुज में सम्मुख भुजाएँ बराबर होती हैं। | 9 | एनसीईआरटी प्रमेय | गणित | एनसीईआरटी | ...
सिद्ध कीजिए कि एक समांतर चतुर्भुज में सम्मुख भुजाएँ बराबर होती हैं। | 9 | एनसीईआरटी प्रमेय | गणित | एनसीईआरटी | ...
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The two parallel sides of a trapezium are 27cm and 13cm, respectively. If the height of the trapezium is 7cm, then what is the area in m^2 ? यदि एक समलंब चतुर्भुज के दो समांतर भुजाए क्रमशः 27 सेमी और 13 सेमी हैं। यदि समलम्ब चतुर्भुज की ऊंचाई 7 सेमी है, तो इसका क्षेत्रफल ज्ञात करें ( m^2 में)
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के ज़रिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं- अरे, सीखने का कितना खुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं, वगैरह। मगर अब ये खुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अक्सर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजें मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज़ को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए 'दो' समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज़ के 'दो' होने का क्या मतलब है? बच्चों के सीखने के तरीके में सबसे अधिक क्या महत्त्वपूर्ण है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के ज़रिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं- अरे, सीखने का कितना खुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं, वगैरह। मगर अब ये खुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अक्सर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजें मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज़ को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए 'दो' समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज़ के 'दो' होने का क्या मतलब है? गद्यांश में किसके ढर्रा बन जाने की बात की गई है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के ज़रिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं- अरे, सीखने का कितना खुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं, वगैरह। मगर अब ये खुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अक्सर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजें मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज़ को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए 'दो' समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज़ के 'दो' होने का क्या मतलब है? अक्सर लोग क्या सोचते हैं?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के ज़रिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं- अरे, सीखने का कितना खुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं, वगैरह। मगर अब ये खुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अक्सर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजें मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज़ को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए 'दो' समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज़ के 'दो' होने का क्या मतलब है? गद्यांश के अनुसार
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के ज़रिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं- अरे, सीखने का कितना खुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं, वगैरह। मगर अब ये खुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अक्सर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजें मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज़ को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए 'दो' समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज़ के 'दो' होने का क्या मतलब है? बच्चों के लिए क्या मुश्किल है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के ज़रिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं- अरे, सीखने का कितना खुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं, वगैरह। मगर अब ये खुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अक्सर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजें मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज़ को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए 'दो' समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज़ के 'दो' होने का क्या मतलब है? 'गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है' का आशय है
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के ज़रिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं- अरे, सीखने का कितना खुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं, वगैरह। मगर अब ये खुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अक्सर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजें मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज़ को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए 'दो' समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज़ के 'दो' होने का क्या मतलब है? 'अमूर्त का विलोम है
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के ज़रिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं- अरे, सीखने का कितना खुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं, वगैरह। मगर अब ये खुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अक्सर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजें मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज़ को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए 'दो' समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज़ के 'दो' होने का क्या मतलब है? "हालात' का समानार्थी है
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