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CHEMISTRY
वर्ग-1: द्रव्य अमोनिया से क्रिया |लिथियम...

वर्ग-1: द्रव्य अमोनिया से क्रिया |लिथियम |क्षार धातुओ के कुछ यौगिक |लिथियम द्वारा विभिन्न व्यवहार प्रदर्शित करना |विकर्ण संबंध |Summary

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द्रव NH3 से क्रिया|क्षार धातु के कुछ यौगिक |लिथियम का असंगत व्यवहार|Summary

द्रव NH3 से क्रिया|क्षार धातु के कुछ यौगिक|प्रश्न

लिथियम का अपसामान्य व्यवहार |लिथियम का मेग्नेशियम के साथ विकर्ण संबंध |OMR|Summary

परिचय|क्षार धातुओं के साथ समानताएँ|हैलोजन के साथ समानताएँ|हाइड्रोजन के समस्थानिक|उपलब्धता|बनाने की विधियाँ|प्रयोगशाला विधि|जल से|धातुओं पर जल की क्रिया द्वारा|धातु हाइड्राईडो की जल के साथ क्रिया द्वारा|जल के विद्युत अपघटन द्वारा|धातुओं पर क्षारों की क्रिया द्वारा|बॉस की विधि द्वारा|भौतिक गुण|OMR|Summary

बेरीलियम का असंगत व्यवहार |AI के साथ Be का विकर्ण संबंध और उसके गुणधर्म |कैल्शियम के यौगिक |कैल्शियम के गुणधर्म और उपयोग |अभ्यास प्रश्न |Summary

परिचय|समूह के प्रथम तत्व का अपसामान्य व्यवहार का कारण|विकर्ण संबंध|समूह 1 या IA-क्षार धातुएँ|उपलब्धता|इलेक्ट्रोनिक विन्यास|क्षार धातुओं के परमाणुक एव भौतिक गुण|OMR|Summary

साम्यावस्था का परिचय|भौतिक परिवर्तनों में साम्य|साम्यावस्था की गतिशील प्रकृति प्रदर्शित करने वाले प्रयोग|भौतिक प्रक्रमों में साम्यावस्था के सामान्य अभिलक्षण|रासायनिक साम्यावस्था|द्रव्य-अनुपाती क्रिया का नियम|रासायनिक साम्यावस्था का नियम| K_c & K_p में संबंध एवं K_c & K_p की इकाई|साम्य स्थिरांक एवं साम्य स्थिरांक के अभिलक्षण|साम्य स्थिरांक के अनुप्रयोग|OMR|Summary

निम्नलिखित पद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मानव के लिए विचार तथा अनुभव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उदात्त है व इसका अथवा उसका नहीं है जातिगत अथवा देशगत नहीं है, वह सबका है, सारे विश्व का है। समस्त ज्ञान, विज्ञान और सभ्यता, सारी मानवता की विरासत है। पूर्व और पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के भेद, अक्षांश और देशान्तर का भेद तथा जलवायु और भौगोलिक सीमा के भेद सर्वथा निराधार हैं। सम्प्रदाय, समुदाय और जाति के नाम पर आदशौं, मूल्यों की स्थापना करना, संकीर्णता के वातावरण में मानवता के दम घोंटना-सा है। जो कुछ भी उपलब्धि है, वह चाहे जिस भू-भाग की उपज हो। महापुरुष विरोधी नहीं होते, एक-दूसरे के पूरक होते हैं। महापुरुष में अपने देश की विशेषता होती है। विवेकशील मनुष्य नम्रतापूर्वक महापुरुषों से शिक्षा ग्रहरण कर अपने जीवन को प्रकाशित करने का प्रयत्न करता है। समस्त मानवता उसके प्रति कृतज्ञ है। किन्तु अब हमें उनसे आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि ज्ञान की इतिश्री नहीं होती। संसार एक खुली पाठशाला है, जीवन एक खुली पुस्तक है, विकास की क्रिया के मूल में मानव की पूर्ण बनने की अपनी प्रेरणा है। विकास के लिए समन्वय का भाव होना परम आवश्यक है। यदि हम विभिन्न विचारधाराओं एवं उनके जन्मदाता महापुरुषों का पूर्ण खण्डन करें तो विकास अवरुद्ध हो जायेगा। किसी धर्म विशेष या मान्यता के खूटे के साथ संकीर्ण भाव से बंधकर तथा परम्पराओं और रूढ़ियों से जकड़े हुए हम आगे नहीं बढ़ सकते। मानव को मानव रूप में सम्मानित करके ही हम जातीयता, प्रान्तीयता, क्षुद्र राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता के भेद को तोड़ सकते हैं। आज मानव, मानव से दूर हटता जा रहा है। वह भूल चुका है कि देश, धर्म और जाति के भिन्न होते हुए भी हम सर्वप्रथम मानव हैं और समान हैं तथा सभी की भावनाएं और लक्ष्य एक ही हैं। सत्ताधारी मनुष्य दूसरों को कुचलकर सुख- सुवध ाओं पर एकाधिकार कर लेना चाहता है लेकिन एक आकाश के नीचे रहने वाले इन्सान तो सब एक हैं भले ही कोई कुदाल लेकर श्रमिका का कार्य करता हो, कोई कलम लेकर दफ्तर का, किन्तु लक्ष्य एक है- समाज का अभ्युदय। मानव का नाता श्रेष्ठ नाता है। नौकर कहकर पुकारना मानो मानव का अपमान है। सहयोगी, सहायक अथवा सस्नेह उसके नाम से सम्बोधित करना मधुर है। जेल और फांसी का विध र मानवता का कलंक है। एक सीमा एक दण्ड भी आवश्यक होता है, लेकिन दण्ड का आतंक समाज को पंगु बना देता है। हमें अपराध वृत्ति का शमन करके अपराधी को शिष्ट एवं सभ्य मानव बनाना चाहिए। दया मानवता का सार है। दया छोड़कर सत्य भी सत्य नहीं है। दया प्रेरित असत्य भी व्यावहारिक सत्य नहीं है। दया धर्म मानवधर्म हैं। . प्रस्तुत गद्यांश मुख्यतः किस भावना से ओतप्रोत है?