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मूल राशियाँ|व्युत्पन्न राशियाँ|मात्रक|मा...

मूल राशियाँ|व्युत्पन्न राशियाँ|मात्रक|मात्रकों की प्रणाली (पद्धति)|MKS पद्धति तथा FPS पद्धति|SI के मूल तथा पूरक मात्रकों की परिभाषाएँ|1 मीटर, 1 किलोग्राम, 1 सेकंड, 1 एम्पियर, 1 केल्विन|पूरक राशियाँ|1 रेडियन|1 स्टेरेडियन|SI पद्धाति की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं|रेडियन से अंश|Summary

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व्युत्पन्न राशियाँ|मात्रक|मात्रकों की प्रणाली|SI के मूल तथा पूरक मात्रकों की परिभाषाएँ

व्युत्पन्न राशियाँ|मात्रक|मात्रकों की प्रणाली|SI के मूल तथा पूरक मात्रकों की परिभाषाएँ

भौतिक राशियाँ |मूलभूत राशियाँ |पूरक राशियाँ |व्युत्पन्न राशियाँ |मात्रको की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली |SI पद्धति |प्रश्न |भौतिक राशियों की विमाएं |OMR|Summary

भौतिक राशियाँ |मूलभूत राशियाँ |SI पद्धति |प्रश्न |व्युत्पन्न राशियाँ |पूरक राशियाँ |मात्रको की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली |OMR|भौतिक राशियों की विमाएं |Summary

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में जीवन के तत्त्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके किया। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतन्त्र शिक्षा पद्धति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी। बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था 'पब्बज्जा' तथा दूसरा उपसम्पदा पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी। दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी 1 1। पारिवारिक जीवन 2। ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी न हो 3। अशुद्ध आचरण 4। झूठ बोलना 5। मादक द्रव्यों का सेवन 6। असमय भोजन 7। नृत्य-गायन 8। पुष्प माला, इत्र, गहने आदि का प्रयोग 9। उच्च आसन का प्रयोग 10। सोना एवं चाँदी की प्राप्ति बौद्ध शिक्षा पद्धति के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में जीवन के तत्त्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके किया। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतन्त्र शिक्षा पद्धति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी। बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था 'पब्बज्जा' तथा दूसरा उपसम्पदा पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी। दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी 1 1। पारिवारिक जीवन 2। ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी न हो 3। अशुद्ध आचरण 4। झूठ बोलना 5। मादक द्रव्यों का सेवन 6। असमय भोजन 7। नृत्य-गायन 8। पुष्प माला, इत्र, गहने आदि का प्रयोग 9। उच्च आसन का प्रयोग 10। सोना एवं चाँदी की प्राप्ति बौद्ध शिक्षा पद्धति में शिक्षा देने हेतु निम्नलिखित में से किसे माध्यम बनाया जाता था?

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में जीवन के तत्त्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके किया। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतन्त्र शिक्षा पद्धति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी। बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था 'पब्बज्जा' तथा दूसरा उपसम्पदा पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी। दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी 1 1। पारिवारिक जीवन 2। ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी न हो 3। अशुद्ध आचरण 4। झूठ बोलना 5। मादक द्रव्यों का सेवन 6। असमय भोजन 7। नृत्य-गायन 8। पुष्प माला, इत्र, गहने आदि का प्रयोग 9। उच्च आसन का प्रयोग 10। सोना एवं चाँदी की प्राप्ति बौद्ध शिक्षा पद्धति में किसे आध्यात्मिक जन्म माना जाता था?

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में जीवन के तत्त्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके किया। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतन्त्र शिक्षा पद्धति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी। बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था 'पब्बज्जा' तथा दूसरा उपसम्पदा पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी। दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी 1 1। पारिवारिक जीवन 2। ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी न हो 3। अशुद्ध आचरण 4। झूठ बोलना 5। मादक द्रव्यों का सेवन 6। असमय भोजन 7। नृत्य-गायन 8। पुष्प माला, इत्र, गहने आदि का प्रयोग 9। उच्च आसन का प्रयोग 10। सोना एवं चाँदी की प्राप्ति प्रस्तुत गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से क्या हो सकता है?

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में जीवन के तत्त्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके किया। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतन्त्र शिक्षा पद्धति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी। बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था 'पब्बज्जा' तथा दूसरा उपसम्पदा पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी। दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी 1 1। पारिवारिक जीवन 2। ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी न हो 3। अशुद्ध आचरण 4। झूठ बोलना 5। मादक द्रव्यों का सेवन 6। असमय भोजन 7। नृत्य-गायन 8। पुष्प माला, इत्र, गहने आदि का प्रयोग 9। उच्च आसन का प्रयोग 10। सोना एवं चाँदी की प्राप्ति संरक्षक की अनुमति किसके लिए आवश्यक थी?