भूमंडलीकृत विश्व का बनना|सिल्क रूट|भोजन की यात्रा|बीमारी, व्यापार और जीत|OMR
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उन्नीसवी शताब्दी (1815-1914)|वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण|कॉर्न लॉ हटने के प्रभाव|तकनीक की भूमिका|मीट का व्यापार|उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध और उपनिवेशवाद|OMR
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ऑस्टवाल्ड का तनुता नियम|अम्ल व क्षार का आयनन या वियोजन|आयनन की मात्रा|क्षार को जल में वियोजन|अम्ल व क्षारों के प्रबलता|बहु-प्रोटोनिक अम्ल व बहु-प्रोटोनिक क्षारक|जल का आयनन या जल का आयनिक गुणनफल|pH मान की अवधारणा|pH स्केल|pH, pOH तथा pK_w में सम्बन्ध|लवणों का जल-अपघटन और विलयन का pH|OMR|Summary
भाषा 'जातीय जीवन और उसकी संस्कृति की सर्वप्रधान रक्षिका है, वह उसके शील का दर्पण है, वह उसके विकास का वैभव है। भाषा जीती, और सब जीत लिया। फिर कुछ भी जीतने के लिए शेष नहीं रह जाता। विजितों का अस्तित्व मिट चलता है। विजितों के मुँह से निकली हुई विजयीजनों की भाषा उनकी दासता की सबसे बड़ी चिन्हानी है। पराई भाषा चरित्र की दृढ़ता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नकल करने का स्वभाव बना करके उत्कृष्ट गुणों और प्रतिभा से नमस्कार करा देती है। इसीलिए, जो देश दुर्भाग्य से पराधीन हो जाते हैं, वे उस समय तक, जब तक कि वे अपना सब कुछ नहीं खो देते, अपनी भाषा की रक्षा के लिए सदा लोहा लेते रहना अपना कर्तव्य समझते हैं। अनेक यूरोपीय देशों के इतिहास भाषा-संग्राम की घटनाओं से भरे पड़े हैं। प्राचीन रोम साम्राज्य से लेकर अब तक के रूस, जर्मन, इटैलियन, आस्ट्रियन, फ्रेंच और ब्रिटिश सभी साम्राज्यों ने अपने अधीन देशों की भाषा पर अपनी विजय-वैजयंती फहरायी। भाषा-विजयी का यह काम सहज से नहीं हो गया। भाषा-समरस्थली के एक-एक इंच स्थान के लिए बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ हुई। देश की स्वाधीनता के लिए मर मिटने वाले अनेक वीर-पुंगवों के समयों में इस विचार का स्थान सदा ऊँचा रहा है कि देश की भौगोलिक सीमा की अपेक्षा मातृभाषा की सीमा की रक्षा की अधिक आवश्यकता है। वे अनुभव करते थे कि भाषा बची रहेगी तो देश का अस्तित्व और उसकी आत्मा बची रहेगी, अन्यथा फिर कहीं उसका कुछ भी पता न लगेगा। लेखक के अनुसार जातीय जीवन की रक्षिका कौन है?
A person goes on a journey. He travelled 16 hours in all. He covered the first half of the distance @ 40 km/h and the other half @ 60 km/h. Find the total distance covered by him. एक आदमी यात्रा पर निकलता है | उसने कुल 16 घंटों की यात्रा की | दूरी का पहला आधा भाग उसने 40 km/h और दूसरा आधा भाग 60 km/h की गति से तय किया | उसने कुल कितनी दूरी तय की ?
सम्मिश्र संख्याओ की ज्यामिति |आर्गेण्ड तल मे वृत का समीकरण |परवलय का मानक और सामान्य समीकरण |महत्वपूर्ण उदाहरण |OMR
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति में बहुत-सी अच्छी बातें होते हुए भी वह मूलतः अधिकार प्रधान, भोग प्रधान है, उसमें अपने सुख की प्रवृति प्रधान है। इसलिए यहाँ प्रधान जोर शरीर-सुख-भोग तथा उसके निमित अगणित साधन जुटाने की ओर है। जबकि भारतीय संस्कृति अनेक बुराइयों के होते हुए भी मुख्यतः धर्म प्रधान, कर्तव्य प्रधान, त्याग और तपस्या प्रवृति-मूलक संस्कृति है। विश्व-मानव या विश्व-मानवता एवं संस्कृति का निर्माण तभी सम्भव है जब मनुष्य अपने शरीर का विचार इस सीमा तक न करे कि उस प्रयत्न में वह आत्मा, वह प्राण ज्योति ही तिरोहित हो जाए जिससे मानव, मानव है। स्पष्टतः भारतीय संस्कृति में, अहिंसक जीवन निर्माण की, दूसरों के लिए जीने की सम्भावनाएँ अधिक होने से गाँधी जी की श्रद्धा थी कि भारतीय संस्कृति ही हमारे जीवन का दीप है और वही विश्व-संस्कृति या विश्व-मानवता की आध रिशिला बन सकती है। मानव, मानव नहीं रह जाता जब
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति में बहुत-सी अच्छी बातें होते हुए भी वह मूलतः अधिकार प्रधान, भोग प्रधान है, उसमें अपने सुख की प्रवृत्ति प्रधान है। इसलिए यहाँ प्रधान शरीर-सुख-भोग तथा उसके निमित्त अगणित साधन जुटाने को और है जबकि भारतीय संस्कृति अनेक बुराइयों के होते हुए भी मुख्यतः धर्म प्रधान, कर्तव्य प्रधान, त्याग और तपस्या प्रवृत्ति-मूलक संस्कृति है। विश्व-मानव या विश्व-मानवता एवं संस्कृति का निर्माण तभी सम्भव है जब मनुष्य अपने शरीर का विचार इस सीमा तक न करे कि उस प्रयत्न में वह आत्मा, वह प्राण ज्योति ही तिरोहित हो जाए जिससे मानव, मानव है। स्पष्टतः भारतीय संस्कृति में, अहिंसक जीवन निर्माण की, दूसरों के लिए जीने की सम्भावनाएँ अधिक होने से गाँधी जी को श्रद्धा थी कि भारतीय संस्कृति ही हमारे जीवन का दीप है और वही विश्व-संस्कृति या विश्व-मानवता की आध रिशिला बन सकती है। मानव, मानव नहीं रह जाता जब।
जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। नव उदारवाद का प्रभाव हो सकता है
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