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संसाधनों का विकास|सतत पोषणीय विकास|रियो-...

संसाधनों का विकास|सतत पोषणीय विकास|रियो-डी-जेनेरो (पृथ्वी सम्मेलन)|एजेंडा 21|संसाधन नियोजन|भारत में संसाधन नियोजन|संसाधन नियोजन की प्रक्रिया|संसाधन और उपनिवेश|संसाधनों का संरक्षण|OMR

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संसाधनों का विकास|सतत पोषणीय विकास|रियो सम्मेलन, पृथ्वी सम्मेलन|संसाधन नियोजन|औपनिवेशिक इतिहास|संसाधनों का संरक्षण

संसाधनों विकास|सतत पोषणीय विकास|एजेंडा 21 |OMR|संसाधन नियोजन |औपनिवेशिक इतिहास|संसाधनों का संरक्षण

संसाधन |संसाधनो के प्रकार |सममय्याप्त के आधार पर |स्वामित्व के आधार पर |विकास के स्तर के आधार पर |संसाधनो का विकास |सतत पोषणीय विकास |संसाधन नियोजन |औपनिवेशिक इतिहास |संसाधनो का संरक्षण |भू संसाधन |भू उपयोग के प्रकार |भू निमनिकरण |मिट्टी के प्रकार|मृदा अपरदन

संसाधन|संसाधनों के प्रकार|सममययाप्त के आधार पर|स्वामित्व के आधार पर|विकास के स्तर के आधार पर|Summary|OMR

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। गद्यांश के अनुसार कौन-सा विकास का ध्येय नहीं है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। मनुष्य अपने विकास के लिए क्या करता है?