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भारत में वन और वन्य जीव का संरक्षण|वन्य ...

भारत में वन और वन्य जीव का संरक्षण|वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम, 1972|बाघ परियोजना|बाघों की संख्या के कम होने के प्रमुख कारण|वनों का वर्गीकरण|आरक्षित वन|संरक्षित वन|अवर्गीकृत वन|समुदाय और वन संरक्षण|बीच बचाओ आंदोलन|चिपको आंदोलन|OMR

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भारत में वन और वन्य जीवन का संरक्षण|वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम,1972|OMR

वनों का वर्गीकरण|आरक्षित वन|सरक्षित वन|अवगीकृत वन|समुदाय और वन संरक्षण|चिपको आंदोलन|OMR

कम होते संसाधनों के सामाजिक प्रभाव|वन्यजीव संरक्षण|संरक्षण के लाभ|सरकार द्वारा वनों का वर्गीकरण|समुदाय और संरक्षण|OMR

कम होते संसाधनों के सामाजिक प्रभाव|वन्यजीव संरक्षण|संरक्षण के लाभ|सरकार द्वारा वनों का वर्गीकरण|समुदाय और संरक्षण|OMR

संसाधन--मिट्टी के प्रकार|वनस्पति और प्राणी |अंतर्राष्ट्रिय प्राकृतिक संरक्षण |जैव विविधता कम होने के कारण |वनों की कटाई के परिणाम |भारत में वन्य और वन्य जीव संरक्षण

प्राकृतिक वनस्पति |वन का महत्व |वन्य जीव |OMR

वन्य समाज और उपनिवेशवाद |वनों का विनाश के कारण |व्यवसायिक वानिकी की शुरुआत |वन अधिनियम लागू होने के बाद |नए व्यापार नए रोज़गार

विद्यालय समाज की एक ऐसी संस्था है, जिसके कुछ सुनिश्चित एवं सुनिर्धारित लक्ष्य होते हैं, जबकि समुदाय का तात्पर्य ऐसे समूह से है जिसमें एक प्रकार के लोग होते हैं। यह एकत्व आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक या नागरिक गुणों में हो सकता है। कई समुदाय अपने लिए अलग विद्यालय की स्थापना भी कर लेते हैं। अपनी औपचारिक भूमिकाओं के अलावा अन्य भूमिकाओं के निर्वहन में भी विद्यालय समुदाय की सहायता करता है। इसके लिए आवश्यकता पड़ने पर समुदाय के क्रिया-कलापों में वह हस्तक्षेप भी करता है। उदाहरणस्वरूप प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा, स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारियों को अभिभावकों तक पहुँचाने में भी विद्यालय यथासम्भव समुदाय की सहायता करता है एवं आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप भी करता है। अभिभावक एवं विद्यालय एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं। अभिभावक समुदाय की आवश्यकताओं से परिचित होते हैं तथा विद्यालय को भी इनसे अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर बीच की व्यवहार्य कड़ी का काम करते हैं। उदाहरणस्वरूप समुदाय की आवश्यकताओं के अनुरूप अभिभावकगण प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा इत्यादि में सहायता के लिए विद्यालय से अनुरोध करते हैं। इस तरह वे विद्यालय एवं समुदाय के बीच की व्यवहार्य कड़ी हैं। समुदाय के साथ निकट से जुड़ कर कार्य करने की स्थिति में विद्यालय अधिक प्रभावशाली हो जाता है। समुदाय और विद्यालय को जोड़ने में समाज के लोगों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। समुदाय के क्रिया-कलापों में विद्यालय की भागीदारी होती है। यही कारण है कि विद्यालयों के लिए पाठ्यवस्तु इतना लचीला बनाया जाता है कि उसमें समाज के विभिन्न समुदायों की विशेषताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती हैं। पर्यावरण को स्वच्छ रखने की शिक्षा देने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय परिसर को स्वच्छ रखा जाए। जल संरक्षण की शिक्षा देने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय परिसर में भी इनके संरक्षण के नियमों का पालन होता हो। इस तरह समुदाय की वास्तविकताओं को प्रायोगिक रूप से विद्यालय परिसर में प्रयोग कर उसे 8 अधिगम अनुभवों में रूपान्तरित किया जा सकता है। समुदाय और विद्यालय को जोड़ने में किसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है?