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PHYSICS
विशिष्ट ऊष्मा|विभिन्न प्रक्रमों के लिए व...

विशिष्ट ऊष्मा|विभिन्न प्रक्रमों के लिए विशिष्ट ऊष्मा|मेयर का सूत्र|Adiabatic Exponent|प्रश्न-अभ्यास|मिश्रण के नियम|माध्य मुक्त पथ

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आदर्श गेस की गतिज ऊर्जा |ऊर्जा के समविभाजन का नियम |गैस की विशिष्ट ऊष्मा (कप एवं Cv )|स्वतंत्रता की कोटि पदों में विशिष्ट ऊष्मा |गैसीय मिश्रण |ऊष्मीयगतिकी के प्रथम नियम से संबंधित भोतिक रशियाँ

गिब्स ऊर्जा |प्रश्न |ऊष्मागतिकी का तृतीय नियम |ऊष्माशोषी अभिक्रिया |ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया |अभिक्रिया ऊष्मा को प्रभावित करने वाले कारक |अभिक्रिया की ऊष्मा के प्रकार |प्रश्न |दहन की ऊष्मा |प्रश्न |उदासिनीकरण की ऊष्मा |बंध ऊर्जा / बंध वियोजन ऊर्जा |प्रश्न |O

ऊष्मा धारिता / मोलर ऊष्मा धारिता / विशिष्ट ऊष्मा धारिता |1 मोल आदर्श गैस ले लिए Cp व Cv में संबंध |उत्क्रमणीय प्रक्रम (लगभग स्थैतिक)|अनुत्क्रमनीय प्रक्रम |विभिन्न प्रक्रमों मे कार्य |चक्रीय प्रक्रम के दौरान |समदाबीय प्रक्रम |OMR

Revision |ऊष्मा |कैलोरी |ऊष्मा का यांत्रिकी तुल्यांक |विशिष्ट ऊष्मा |ऊष्मा धारिता |वस्तु का जल तुल्यांक |अवस्था में परिवर्तन |प्रश्न |OMR|Summary

प्रश्न |ऊष्मा उत्पन्न होने के कारण |जूल का ऊष्मा नियम |प्रतिरोधों का श्रेणी संयोजन |प्रतिरोधों का समान्तर संयोजन

वास्तविक संख्याओं के लिए घातांक नियम |अभ्यास प्रश्न Part-1 |अभ्यास प्रश्न Part-2|OMR

हमारा जीवन जिन मानवीय सिद्धांतों, अनुभवों और सांस्कृतिक संस्कारों के संबल से समस्त सृष्टि के लिए महत्त्वपूर्ण बना है, परोपकार की भावना उन्हीं में एक है। मानव को दूसरे मानव के प्रति वैसा ही संवेदनात्मक उत्तरदायित्व निभाना चाहिए, जैसे वह स्वयं के प्रति निभाता है। जीवन को केवल परोपकार, पर सेवा और निःस्वार्थ प्रेम के लिए ही वास्तविक समझना चाहिए क्योंकि नश्वर शरीर जब नष्ट हो जाएगा तो उसके बाद हमारा कुछ भी इस दुनिया के जीवों की स्मृति में नही रहेगा। हम जग जीवों की स्मृति में सदा-सदा के लिए तभी बने रह सकते हैं, जब हम अपने नश्वर शरीर को वैचारिक, बौद्धिक और आत्मिक चेतना से पूर्ण कर निःस्वार्थ भाव से स्वयं को जीव सेवा में समर्पित करेंगे। हमें स्थिरता से और शांतिपूर्वक यह विचार करते रहना चाहिए कि हमारे जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य और एकमात्र लक्ष्य हमारे द्वारा किया जाने वाला त्याग है। त्याग योग्य व्यक्तित्व प्राप्त करने के लिए गहन तप की आवश्यकता है। त्याग का भाव किसी मनुष्य में साधारण होते हुए नही जन्म लेता। इसके लिए मनुष्य को जीवन-जगत और इसके जीवों के संबंध में असाधारण वैचारिक रचनात्मकता अपनाकर निरंतर योग, ध्यान, तप व साधना करनी होगी। उसे इस स्थिति से विचरते हुए विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभवों से लैस होना होगा। आवश्यकता होने पर उसे जीवों की वास्तविक सेवा करनी होगी। जब ऐसी विशेष मानवीय परिस्थितियों उत्पन्न होंगी, तब ही मानव में त्याग भाव आकार ग्रहण करेगा। 'आध्यात्मिक शब्द का निर्माण किस उपसर्ग की सहायता से हुआ है?