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पद्यांश- (भक्ति नीति, स्वदेश प्रेम, भारत...

पद्यांश- (भक्ति नीति, स्वदेश प्रेम, भारत माता का मंदिर यह)

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दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 1 भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है? नर के नमश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है? वेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है, मेरे प्यारे देश! नहीं तू पत्थर है, पानी है। जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं? किसको नमन करूँ मैं भारत! किसको नमन करूँ मैं? तू वह, नर है जिसे बहुत ऊँचा चढ़कर पाया था, तू वह, जो सन्देश भूमि का अम्बर से लाया था, तू वह जिसका ध्यान आज भी मन सुरभित करता है। थकी हुई आत्मा में उड़ने की उमंग भरता है। गन्ध-निकेतन इस अदृश्य उपवन को नमन करूँ मैं। किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं। भारत की विशेषता है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 1 भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है? नर के नमश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है? वेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है, मेरे प्यारे देश! नहीं तू पत्थर है, पानी है। जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं? किसको नमन करूँ मैं भारत! किसको नमन करूँ मैं? तू वह, नर है जिसे बहुत ऊँचा चढ़कर पाया था, तू वह, जो सन्देश भूमि का अम्बर से लाया था, तू वह जिसका ध्यान आज भी मन सुरभित करता है। थकी हुई आत्मा में उड़ने की उमंग भरता है। गन्ध-निकेतन इस अदृश्य उपवन को नमन करूँ मैं। किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं। 'थकी हुई आत्मा में उड़ने की उमंग भरता है' इस पंक्ति का आशय है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 1 भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है? नर के नमश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है? वेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है, मेरे प्यारे देश! नहीं तू पत्थर है, पानी है। जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं? किसको नमन करूँ मैं भारत! किसको नमन करूँ मैं? तू वह, नर है जिसे बहुत ऊँचा चढ़कर पाया था, तू वह, जो सन्देश भूमि का अम्बर से लाया था, तू वह जिसका ध्यान आज भी मन सुरभित करता है। थकी हुई आत्मा में उड़ने की उमंग भरता है। गन्ध-निकेतन इस अदृश्य उपवन को नमन करूँ मैं। किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं। 'तू वह, जो सन्देश भूमि का अम्बर से लाया था' इस पंक्ति में अलंकार है।

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 1 भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है? नर के नमश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है? वेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है, मेरे प्यारे देश! नहीं तू पत्थर है, पानी है। जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं? किसको नमन करूँ मैं भारत! किसको नमन करूँ मैं? तू वह, नर है जिसे बहुत ऊँचा चढ़कर पाया था, तू वह, जो सन्देश भूमि का अम्बर से लाया था, तू वह जिसका ध्यान आज भी मन सुरभित करता है। थकी हुई आत्मा में उड़ने की उमंग भरता है। गन्ध-निकेतन इस अदृश्य उपवन को नमन करूँ मैं। किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं। कविता में 'पानी' का भावार्थ है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 1 भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है? नर के नमश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है? वेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है, मेरे प्यारे देश! नहीं तू पत्थर है, पानी है। जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं? किसको नमन करूँ मैं भारत! किसको नमन करूँ मैं? तू वह, नर है जिसे बहुत ऊँचा चढ़कर पाया था, तू वह, जो सन्देश भूमि का अम्बर से लाया था, तू वह जिसका ध्यान आज भी मन सुरभित करता है। थकी हुई आत्मा में उड़ने की उमंग भरता है। गन्ध-निकेतन इस अदृश्य उपवन को नमन करूँ मैं। किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं। कवि किसको नमन करना चाहता है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 1 भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है? नर के नमश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है? वेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है, मेरे प्यारे देश! नहीं तू पत्थर है, पानी है। जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं? किसको नमन करूँ मैं भारत! किसको नमन करूँ मैं? तू वह, नर है जिसे बहुत ऊँचा चढ़कर पाया था, तू वह, जो सन्देश भूमि का अम्बर से लाया था, तू वह जिसका ध्यान आज भी मन सुरभित करता है। थकी हुई आत्मा में उड़ने की उमंग भरता है। गन्ध-निकेतन इस अदृश्य उपवन को नमन करूँ मैं। किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं। 'त्रिभुज' शब्द में समास है

एक ही दीया, स्नेह से भरा, प्रेम का प्रकाश, प्रेम से धरा, झिलमिला हवा को तिलमिला रहा ज्योति का निशान जो हिला रहा मुस्करा रहा है अंधकार पर। यह मजार है किसी शहीद का, दर्शनीय था जो चाँद ईद का, देश का सपूत था, गुमान था सत्य का स्वरूप नौजवान था जो चला किया सदा दुधार पर। 'हवा' का पर्यायवाची शब्द नहीं है

एक ही दीया, स्नेह से भरा, प्रेम का प्रकाश, प्रेम से धरा, झिलमिला हवा को तिलमिला रहा ज्योति का निशान जो हिला रहा मुस्करा रहा है अंधकार पर। यह मजार है किसी शहीद का, दर्शनीय था जो चाँद ईद का, देश का सपूत था, गुमान था सत्य का स्वरूप नौजवान था जो चला किया सदा दुधार पर। 'दर्शनीय' शब्द में प्रत्यय है