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Class 12
PHYSICS
किसी LC परिपथ में 20 mH का एक प्रेरक तथ...

किसी LC परिपथ में 20 mH का एक प्रेरक तथा `50 muF` का एक संधारित्र है जिस पर प्रारम्भिक आवेश 10 mC है | परिपथ का प्रतिरोध नगण्य है | मान लीजिए कि वह क्षण जिस पर परिपथ बंध किया जाता है t = 0 है |
(a) प्रारम्भ में कुल कितनी ऊर्जा संचित है ? क्या यह LC दोलनों की अवधि में संरक्षित है ?
(b) परिपथ की मूल आवृत्ति क्या है ?
(c) किस समय पर संचित ऊर्जा-
(i) पूरी तरह से वैघुत है (अर्थात वह संधारित्र में संचित है ) ?
(ii)पूरी तरह से चुम्बकीय है (अर्थात प्रेरक में संचित है ) ?
(d) किन समय पर सम्पूर्ण ऊर्जा प्रेरक एवं संधारित्र के मध्य समान रूप से विभाजित है ?
(e) यदि एक प्रतिरोध को परिपथ में लगाया जाए तो कितनी ऊर्जा अंततः ऊष्मा के रूप में क्षयित होगी ?

लिखित उत्तर

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दिया है-प्रेरकत्व `(L) = 20 mH = 20 xx 10^(-3) H`
संधारित्र की धारिता` (C ) = 50 muF = 50 xx 10^(-6) F`
प्रारम्भ में, संधारित्र पर आवेश `(Q(i)) = 10 mC = 10 xx 10^(-3)C`
(a) प्रारम्भ में , संधारित्र में कुल संचित ऊर्जा `(E) = (q^(2))/(2C) `
`therefore E_(1)=(Q_(i)^(2))/(2C)=((10xx10^(-3))^(2))/(2xx50xx10^(-6))=(10^(-4))/(10^(-4))`
अथवा `E_(i) = 1 J`
हाँ, यह ऊर्जा LC दोलनों की अवधि में संरक्षित रहती है
(b) अनुनाद आवृत्ति अथवा स्वाभाविक आवृत्ति ज्ञात करने हेतु-
`f_(r)=(1)/(2pisqrt(LC))=(1)/(2xx3.14xxsqrt(20xx10^(-3)xx50xx10^(-6)))`
`=(7xx10^(3))/(44)=159.2Hz`
परिपथ की स्वभाबिक आवृत्ति,
`omega=2piv=2pixx159.2`
`=999.78 ~~1000 = 10^(3)` रेडियन/सेकण्ड
(c) (i) माना किसी क्षण संचित ऊर्जा पूर्ण रूप से वैघुत हो जाती है |
संधारित्र पर आवेश `(Q) = Q_(0) cot omegat`
`Q = Q_(0) cos (2pi)/(T)*t" "...(i)`
Q अधिकतम होता है चूँकि यह `Q_(0)` के बराबर है, केवल तब यदि
`cos (2pi)/(T) = pm 1 = cos npi` या `t = (nT)/(2)`, जहाँ `n = 0, 1, 2, 3`, ....
`therefore " "t = 0, (T)/(2), T, (3T)/(2), ...`
अतः परिपथ में संचित ऊर्जा पूर्णतः वहुत है जोकि `t = 0, (T)/(2), T, (3T)/(2), ...` समय पर संचित होगी |
(ii) माना किसी खस्न संचित ऊर्जा पूर्णतः चुम्बकीय है |
चूँकि संधारित्र में वैघुत ऊर्जा शून्य होती है
q = 0
`Q = Q_(0) cos ""(pit)/(T) = 0" "` [समीकरण (i) से]
`therefore cos"" (2pi)/(T)t = 0 = cos ""(npi)/(2)` अथवा `t = (nT)/(4),`
जहाँ n = 0, 1, 2, 3,...
यह तभी सम्भव है जब `t = (T)/(4), (3T)/(4), (5T)/(4),...` है
अतः संचित ऊर्जा पूर्णतः चुम्बकीय है (ऊर्जा एक प्रेरित्र में संचित है ) जबकि `t = (T)/(4), (3T)/(4), (5T)/(4), ...` है |
(d) संधारित्र तथा प्रेरित्र के बीच ऊर्जा के समान वितरण का अर्थ है कि संधारित्र में संचित ऊर्जा
` = (1)/(2) xx` अधिकतम ऊर्जा
`(Q^(2))/(2C)=(1)/(2)*(Q_(0)^(2))/(2C)`
`Q = (Q_(0))/(sqrt(2))" "...(ii)`
`Q = Q_(0) cos omegat = Q_(0) cos"" (2pi)/(T)*t` से,
`(Q_(0))/(sqrt(2))=Q_(0)cos""(2pit)/(T)" "`[समीकरण (ii) से]
`(1)/(sqrt(2)) = cos "" (2pit)/(T)`
अथवा `cos (2n +1) (pi)/(2) = cos (2pit)/(T)`
`((2n +1)pi)/(4) = (2pit)/(T)`
`t = (T)/(8) (2n +1) " "(n = 0, 1, 2, 3, ...)`
अतः ऊर्जा का आधा अंश संधारित्र में तथा आधा अंश प्रेरित्र में होगा जबकि-
`t = (T)/(8), (3T)/(8), (5T)/(8), ...`
(e ) जैसे ही प्रतिरोधक को परिपथ में लगाया जाता है तब सम्पूर्ण ऊर्जा उष्मन मणि व्यय हो जाती है | व्यय ऊर्जा = 1 J तथा दोलनों का आयाम अवमंदित होने लगता है तथा अंत में दोलन लुप्त हो जाते है क्योकि सम्पूर्ण ऊर्जा ऊष्मा के रूप में व्यय हो जाती है |
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