`alpha`-कणों के प्रकीर्णन सम्बन्धी रदरफोर्ड के प्रयोग का प्रायोगिक प्रबंध निम्न चित्र में प्रदर्शित किया गया है | रेडियोएक्टिव पदार्थ रेडॉन या पॉलीनियम को सीसे के बॉक्स A में रखा जाता है | इस बॉक्स के छिद्र O में से `alpha`-कण तीव्र वेग से गुजरने के बाद `alpha`-कण संकीर्ण किरण पुंज के रूप में पतली स्वर्ण पन्नी G पर आपतित होता है | स्वर्ण पन्नी की मोटाई लगभग `10^(-6)` सेमी होती है | प्रकीर्णित `alpha`-कणों को एक पर्दे S पर डाला जाता है जिस पर जिंक सल्फाइड की तह चढ़ी होती है | `alpha`-कण इस पर्दे से टकराकर प्रस्फुरण को एक सूक्ष्मदर्शी M की सहायता से देखा जा सकता है |

प्रेक्षण -(1) अधिकांश `alpha`-कण पन्नी को पार करके सीधे निकल जाते है |
(2) कुछ `alpha`-कण छोटे कोण से विक्षेपित हो जाते है |
(3) कुछ `alpha`-कण (1000 में से 1) `90^(@)` से अधिक कोण पर प्रकीर्णित हो जाते है |
(4) कुछ `alpha`-कण वापस लौट जाते है |
निष्कर्ष-(1) चूँकि अधिकांश `alpha`-कण पन्नी को पारकर सीधे निकल जाते है, परमाणु का अधिकांश भाग खोखला होता है |
(2) धनावेशित `alpha`-कण प्रक्षेपित होते है | अतः परमाणु के अन्दर धनावेशित कण होना चाहिए |
(3) कुछ `alpha`-कण अधिक कोण से प्रकीर्णित होते है तथा कुछ `alpha`-कण वापस लौट जाते है | यह तभी सम्भव है जबकि सम्पूर्ण धनावेश एक ही सीमित स्थान में केंद्रित हो |
प्रयोग का महत्व- रदरफोर्ड के प्रयोग से इस बात की जानकारी हुई कि परमाणु का सम्पूर्ण धनावेश एक ही सीमित स्थान में जिसे नाभिक कहते है, केंद्रित होता है |