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PHYSICS
चलकुंडली धारामापी ( वेस्टन धारामापी )...

चलकुंडली धारामापी ( वेस्टन धारामापी ) का वर्णन निम्न बिंदुओं के अंतर्गत कीजिए ।
क्रिया सिद्धांत तथा धारा के लिए सूत्र की स्थापना ।

लिखित उत्तर

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क्रिया सिद्धांत - जब एक धारावाही कुंडली को किसी एकसमान चुंबकीय क्षेत्र में स्वतंत्रतापूर्वक इस प्रकार लटकाते है कि इसका तल चुंबकीय क्षेत्र के समांतर रहे , तो कुंडली पर अधिकतम विक्षेपक बलयुग्म लगता है जो निम्नलिखित होता है -
`tau = n IAB` ....(1)
जहाँ n कुंडली में फेरों की संख्या ,I कुंडली में प्रवाहित धारा,A कुंडली का क्षेत्रफल तथा B चुंबकीय क्षेत्र है । इस बलयुग्म के कारण कुंडली घूमती है जिससे निलंबन तार में ऐंठन उत्पन्न हो जाती है तथा जब ऐंठन बलयुग्म का आघूर्ण , विक्षेपक बलयुग्म के आघूर्ण के बराबर हो जाता है तो संतुलन स्थिति प्राप्त होती है और कुंडली ठहर जाती है । यदि संतुलन स्थिति में निलंबन तार का ऐंठन कोण `phi`हो , तो संतुलन अवस्था में
विक्षेपक बलयुग्म का आघूर्ण = ऐंठन बलयुग्म का आघूर्ण
`nIAB = C phi`
या `I = C/(nAB) phi ` ...(2)
यदि निलंबित में बहने वाली धारा का सूत्र है जिससे यह स्पष्ट है कि कुंडली में प्रवाहित धारा ऐंठन कोण के अनुक्रमानुपाती होती है , क्योंकि
`C/(nAB) = K = ` नियतांक ...(3)
जहाँ C निलंबन तार कि ऐंठन दृढ़ता है तथा नयतांक K को धारामापी का दक्षता नियतांक या धारामापी नियतांक कहते है ।
`:. I propto phi`
अर्थात धारामापी में प्रवाहित धारा , कुंडली के विक्षेप के अनुक्रमानुपाती होती है । यही निलंबित कुंडली धारामापी का सिद्धांत है ।
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